अलीगढ़ के इस ताले की नहीं दूसरी चाभी: इसकी दुनिया में है बादशाहत कायम, अब स्मार्ट ताला निर्माण की ओर तालानगरी
अलीगढ़ में बनने वाले लोहा और स्टील आधारित पैड लॉक व पिन सिलिंडर लॉक किसी दूसरी चाभी से नहीं खुलता। इसे सिर्फ काटना पड़ेगा। इसी तरह डिंपल ताले के रूप में पहचाना जाने वाला छेद वाली चाभी का ताला ऐसा है, जिसकी दूसरी चाभी नहीं बनाई जा सकती।
विस्तार
तालानगरी अलीगढ़। यह नाम देश-दुनिया में किसी पहचान का मोहताज नहीं। अपना अलीगढ़ ताला और तालीम के लिए देश दुनिया में विख्यात है। स्मार्ट होते अलीगढ़ के ताले भी समय के साथ स्मार्ट होते जा रहे हैं। दुनिया में इन तालों ने अपनी एक पहचान बनाई है। खास बात है कि तकनीक के दौर में यहां बनने वाले लोहा और स्टील आधारित पैड लॉक व पिन सिलिंडर लॉक किसी दूसरी चाभी से नहीं खुलता। इसे सिर्फ काटना पड़ेगा। इसी तरह डिंपल ताले के रूप में पहचाना जाने वाला छेद वाली चाभी का ताला ऐसा है, जिसकी दूसरी चाभी नहीं बनाई जा सकती। इसी तरह से पैड लॉक, पिस्टन लॉक और मैकेनिज्म आधारित लॉक दुनिया में कहीं नहीं बनता। पहली जुलाई से इन तालों के उत्पादन पर बीआईएस मानक की बाध्यता को भी ताला कारोबार ने स्वीकार लिया है। इस मानक के लागू होने से भारत में विदेशी तालों का आयात कम होगा और अलीगढ़ के ताला कारोबार को पंख लगेंगे।
ये है इतिहास
नुमाइश मैदान के पास रेलवे लाइन के सहारे सन् 1900 के आसपास से संचालित जॉनसन कंपनी का ताला सबसे पहले बाजार में आया। उसकी नकल कर यहां घर-घर ताले बनाए जाने लगे। उस दौर में इंच में साइज नाप कर ताले हाथ से कील ठोककर बनाए जाते थे। चूंकि उस समय अलीगढ़ के कारीगर हाथ से ताले बनाते थे। इसलिए उनके साइज और डिजाइन में एकरूपता नहीं होती थी। मसलन किसी ने एक इंच के दस तालों का ऑर्डर दिया तो सभी दस ताले एक इंच के नहीं बन पाते थे। मगर धीरे-धीरे इन्हीं तालों ने स्थानीय बाजार में अपनी पैठ बना ली। कहने को कंप्यूटराइज्ड व इलेक्ट्रानिक डिवाइस से संचालित ताले बाजार में आ चुके हैं। देर से ही सही, मगर अलीगढ़ की ताला इंडस्ट्री ने तकनीक आधारित माल बनाकर उस दौड़ में शामिल कर लिया है।
राजकोट-जाम नगर को टक्कर देना शुरू
तालानगरी में वैसे तो बहुत से ताले बनते हैं। मगर पैड लॉक, पिन सिलिंडर लॉक और डिंपल लॉक ऐसा है, जिसने भारत और उन दूसरे मुल्कों में गहरी पैठ बना रखी है। लोहा और स्टील आधारित पैड लॉक व पिन सिलिंडर लॉक किसी दूसरी चाभी से नहीं खुलता। सिर्फ काटना पड़ेगा। इसी तरह डिंपल ताले के रूप में पहचाना जाने वाला छेद वाली चाभी का ताला ऐसा है, जिसकी दूसरी चाभी नहीं बनाई जा सकती। अगर चाभी खो गई तो ताला भी खराब समझो। उसे भी काटना ही पड़ेगा। अधिकतम 400 से ग्राम वजन का यह ताला बाजार में 500 रुपये तक में बिकता है। किसी जमाने में अलीगढ़ के ताला कारोबार को डाई देने वाली गुजरात के राजकोट ने यहां से कारीगर ले जाकर अपने यहां ताले बनाना शुरू किया और सीएनसी मशीनों व पीवीडी की मदद से तकनीक आधारित ताले बनाए। जिससे अलीगढ़ के बाजार को प्रतिस्पर्धा मिली। मगर अब अलीगढ़ के ताला उद्योग ने भी राजकोट को टक्कर देना शुरू कर दिया है।
डोर लॉक, कवर्ड व मॉर्टिस लॉक हमारी पहचान है। पूरी ताला इंडस्ट्री बीआईएस मानक लागू कर रही है, जिससे विदेशी माल का आयात कम होगा और अलीगढ़ की साख मजबूत होगी।-धनतीज वाड्रा, प्रमुख निर्यातक।
यह बिल्कुल सही है कि कुछ साल पहले राजकोट ने अपने यहां ताला बनाकर देश दुनिया में अलीगढ़ के उद्योग के लिए प्रतिस्पर्धा पैदा की। मगर देर से सही हमने वह तकनीक विकसित कर ली है। राजकोट को हम पीछे छोड़ने लगे हैं।-राजकुमार अग्रवाल, प्रमुख निर्यातक।
ये भी जानें
- 10 हजार ताला कारखाने उद्योग विभाग में हैं पंजीकृत
- 6 हजार ताला कारखाने जीएसटी में पंजीकृत और देते टैक्स
- 2 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का अनुमानित सालाना टर्नओवर
- 500 करोड़ रुपये करीब से ज्यादा कीमत के ताले का निर्यात
इस तरह बदला अलीगढ़ के तालों का प्रकार
शुरुआती दौर में साइज के अनुसार फुटा ताला, फिर नंबर लॉक, गोल ताला, नीचे से चाभी लगने वाला ताला, सूटकेस लॉक बने। बाद में मोर्टिस लॉक (डोर हैंडल), पैड लॉक, पिन सिलिंडर लॉक, शटर लॉक, मैकेनिज्म आधारित लॉक सहित 42 प्रकार के ताले आज यहां की पहचान हैं।
ये भी ताले बनते हैं अलीगढ़ में
वीआईपी सूटकेस का ताला, सभी प्रकार के कुंडी में लगने वाले ताले, सभी प्रकार के गेट, शटर, चैनल में लगने वाले मॉर्टिस ताले, सभी प्रकार के दरवाजों में लगने वाले ताले, बजाज, एलएमएल, होंडा के दोपहिया वाहनों में लगने ताले, भारतीय बाजार में निर्मित होने वाले फ्रीज में लगने वाले ताले, सभी प्रकार के स्टील फर्नीचर में लगने वाले कवर्ड ताले, फियेट व एंबेस्डर कार में लगने ताले भी यहां बनाए जाते हैं।