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दिल में ‘दीन’, दिमाग में ‘दुनिया’
अमर उजाला ब्यूरो/आशीष निगम
Updated Sun, 31 Jan 2016 01:29 AM IST
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मदरसों में दीनी तालीम के साथ आधुनिक शिक्षा भी बहुत तेजी से जगह बना रही है। कमिश्नरी रोड पर स्थित मदरसतुल उलूम अल इस्लामिया मदरसे ने दीनी तालीम के साथ बच्चों को लाइब्रेरी और इंटरनेट की आधुनिक दुनिया से भी जोड़ा है। यहां पढ़ने वाले बच्चे डाक्टर, मास्टर और वैज्ञानिक बन कर देश सेवा करना चाहते हैं।
दारूल उलूम नदवतुल उलमा लखनऊ से सम्बद्ध इस मदरसे में प्राइमरी स्कूल और छात्रावास भी मौजूद है। अब इसके ठीक सामने आईटीआई स्थापित हो रहा है, जिसमें एक मसजिद की तामीर भी हो रही है। आईटीआई खोलने का उद्देश्य युवाओं को हाथ के हुनर से लैस कर उन्हें रोजगार दिलाना है। मदरसा केवल निजी दान पर आधारित है।
इसको अल्पसंख्यक कल्याण विभाग और मदरसा बोर्ड से कोई आर्थिक मदद नहीं मिलती है। इससे भी खास बात ये है कि यहां के प्रिंसिपल तारिक अयूबी इसे मदरसा बोर्ड से जोड़ना ही नहीं चाहते क्योंकि उनका स्पष्ट कहना है कि मदरसा बोर्ड से वित्तीय सहायता मिलने के बाद ‘तालीम’ की बर्बादी हो जाती है जैसा कि आज कई मदरसों में हो चुका है।
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सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार शिक्षित मुसलमानों में 95 फीसदी स्कूलों में पढ़ रहे हैं। केवल पांच फीसदी ही मदरसों में हैं। मेरा सवाल है कि जब 95 फीसदी को मुख्य धारा की शिक्षा के बाद रोजगार नहीं मिल रहा है तो मदरसों की दीनी तालीम पर सवाल क्यों उठ रहे हैं..? जबकि हकीकत में मदरसों में दीनी तालीम देने वाले उस्ताद ढूंढे नहीं मिल रहे हैं। निकाह से जनाजे तक की मजहबी रस्में रवायतें और जरूरतें कैसे पूरी होंगी।
-तारिक अयूबी, प्रिंसिपल।
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दारूल उलूम नदवतुल उलमा लखनऊ से सम्बद्ध इस मदरसे में प्राइमरी स्कूल और छात्रावास भी मौजूद है। अब इसके ठीक सामने आईटीआई स्थापित हो रहा है, जिसमें एक मसजिद की तामीर भी हो रही है। आईटीआई खोलने का उद्देश्य युवाओं को हाथ के हुनर से लैस कर उन्हें रोजगार दिलाना है। मदरसा केवल निजी दान पर आधारित है।
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इसको अल्पसंख्यक कल्याण विभाग और मदरसा बोर्ड से कोई आर्थिक मदद नहीं मिलती है। इससे भी खास बात ये है कि यहां के प्रिंसिपल तारिक अयूबी इसे मदरसा बोर्ड से जोड़ना ही नहीं चाहते क्योंकि उनका स्पष्ट कहना है कि मदरसा बोर्ड से वित्तीय सहायता मिलने के बाद ‘तालीम’ की बर्बादी हो जाती है जैसा कि आज कई मदरसों में हो चुका है।
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सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार शिक्षित मुसलमानों में 95 फीसदी स्कूलों में पढ़ रहे हैं। केवल पांच फीसदी ही मदरसों में हैं। मेरा सवाल है कि जब 95 फीसदी को मुख्य धारा की शिक्षा के बाद रोजगार नहीं मिल रहा है तो मदरसों की दीनी तालीम पर सवाल क्यों उठ रहे हैं..? जबकि हकीकत में मदरसों में दीनी तालीम देने वाले उस्ताद ढूंढे नहीं मिल रहे हैं। निकाह से जनाजे तक की मजहबी रस्में रवायतें और जरूरतें कैसे पूरी होंगी।
-तारिक अयूबी, प्रिंसिपल।