{"_id":"6abecff0f0a4cd930703208f","slug":"generations-changed-styles-evolved-yet-the-allure-of-krishna-leela-remains-intact-aligarh-news-c-2-gur1004-1080000-2026-10-02","type":"story","status":"publish","title_hn":"Aligarh News: पीढ़ियां बदलीं, अंदाज बदला, कृष्णलीला का आकर्षण बरकरार","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Aligarh News: पीढ़ियां बदलीं, अंदाज बदला, कृष्णलीला का आकर्षण बरकरार
Fri, 02 Oct 2026 02:56 AM IST
अलीगढ़ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अलीगढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, अलीगढ़
Updated Fri, 02 Oct 2026 02:56 AM IST
विज्ञापन
समय बदला, मंचन का अंदाज बदला और कृष्णलीला की कई पीढ़ियां भी बदल गईं, लेकिन कान्हा की लीलाओं को देखने का उत्साह आज भी बरकरार है। शहर में रामलीला के साथ करीब पांच दशक पुरानी श्रीकृष्णलीला की परंपरा भी लोगों को अपनी ओर खींचती है। इस बार श्रीकृष्णलीला का आयोजन नौ से 23 अक्तूबर तक होगा।
श्रीकृष्णलीला संस्थान के संस्थापक प्रेम प्रकाश माहेश्वरी और पूर्व महापौर आशुतोष वार्ष्णेय के अनुसार इसकी शुरुआत 1970 के दशक के शुरुआती वर्षों में हुई थी। रामलीला से जुड़े कुछ लोगों के अलग होने के बाद दशहरे के आसपास कृष्णलीला का मंचन शुरू किया गया।
आगरा रोड स्थित चिरंजीलाल कन्या इंटर कॉलेज परिसर में पहली बार मंचन हुआ। शुरुआत में आर्थिक संसाधनों की कमी थी और लोगों से चार आने, आठ आने तक चंदा जुटाया जाता था। कलाकारों के अभिनय और भव्य प्रस्तुतियों ने धीरे-धीरे दर्शकों को आकर्षित किया। मथुरा रोड और आसपास के गांवों से भी लोग कृष्णलीला देखने पहुंचने लगे।
विज्ञापन
शास्त्रीय परंपरा ने कृष्णलीला को दी अलग पहचान
श्रीकृष्ण लीला को भव्य स्वरूप देने में पद्मश्री पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य की मंडली की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनकी मंडली ने मंचन में शास्त्रीय परंपराओं को प्रमुखता दी। मंच पर पूजन विधि, व्यास पीठ और पारंपरिक प्रस्तुति आज भी कृष्णलीला की खास पहचान मानी जाती है। पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के बाद उनके पुत्र पंडित कुंज बिहारी शर्मा मंडली की परंपरा को आगे बढ़ाते रहे हैं।
रात में श्रीकृष्ण, सुबह चैतन्य महाप्रभु लीला
श्रीकृष्ण लीला महोत्सव की खासियत सिर्फ रात का मंचन नहीं है। सुबह चैतन्य महाप्रभु की लीला भी प्रस्तुत की जाती रही है। सुबह शुरू होने वाला यह मंचन भक्ति और भाव से भर देता है। कलाकारों के भावपूर्ण अभिनय के दौरान दर्शकों का भावविभोर होना और भक्ति में झूमना इस आयोजन के खास दृश्य रहे हैं।
विज्ञापन
श्रीकृष्णलीला संस्थान के संस्थापक प्रेम प्रकाश माहेश्वरी और पूर्व महापौर आशुतोष वार्ष्णेय के अनुसार इसकी शुरुआत 1970 के दशक के शुरुआती वर्षों में हुई थी। रामलीला से जुड़े कुछ लोगों के अलग होने के बाद दशहरे के आसपास कृष्णलीला का मंचन शुरू किया गया।
विज्ञापन
आगरा रोड स्थित चिरंजीलाल कन्या इंटर कॉलेज परिसर में पहली बार मंचन हुआ। शुरुआत में आर्थिक संसाधनों की कमी थी और लोगों से चार आने, आठ आने तक चंदा जुटाया जाता था। कलाकारों के अभिनय और भव्य प्रस्तुतियों ने धीरे-धीरे दर्शकों को आकर्षित किया। मथुरा रोड और आसपास के गांवों से भी लोग कृष्णलीला देखने पहुंचने लगे।
विज्ञापन
शास्त्रीय परंपरा ने कृष्णलीला को दी अलग पहचान
श्रीकृष्ण लीला को भव्य स्वरूप देने में पद्मश्री पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य की मंडली की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनकी मंडली ने मंचन में शास्त्रीय परंपराओं को प्रमुखता दी। मंच पर पूजन विधि, व्यास पीठ और पारंपरिक प्रस्तुति आज भी कृष्णलीला की खास पहचान मानी जाती है। पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के बाद उनके पुत्र पंडित कुंज बिहारी शर्मा मंडली की परंपरा को आगे बढ़ाते रहे हैं।
रात में श्रीकृष्ण, सुबह चैतन्य महाप्रभु लीला
श्रीकृष्ण लीला महोत्सव की खासियत सिर्फ रात का मंचन नहीं है। सुबह चैतन्य महाप्रभु की लीला भी प्रस्तुत की जाती रही है। सुबह शुरू होने वाला यह मंचन भक्ति और भाव से भर देता है। कलाकारों के भावपूर्ण अभिनय के दौरान दर्शकों का भावविभोर होना और भक्ति में झूमना इस आयोजन के खास दृश्य रहे हैं।