सीजेआई चंद्रचूड़ की सेवानिवृति से पहले: एएमयू अल्पसंख्यक दर्जे पर इसी सप्ताह आ सकता है फैसला, है इंतजार
एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे पर इसी सप्ताह फैसला आ सकता है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ 10 नवंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। ऐसी संभावना है कि डीवाई चंद्रचूड़ इस मामले पर फैसला सुना सकते हैं। सभी को फैसले का बेसब्री से इंतजार है।
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अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर जल्द सुप्रीमकोर्ट का फैसला इसी सप्ताह में आ सकता है। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद एक फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। 10 नवंबर को मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ सेवानिवृत्त हो रहे हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि इससे पहले सुरक्षित फैसला सुनाया जा सकता है।
डीएम विशाख जी. ने 4 नवंबर को एएमयू में कुलपति और कुलसचिव के साथ बैठक की। इस बैठक को भी संभावित फैसले से जोड़कर देखा जा रहा है। डीएम का कहना है कि लंबे समय से एएमयू, जिला पुलिस व प्रशासन के बीच बैठक नहीं हुई थी। इसी के चलते एएमयू, कानून व्यवस्था समेत कई अहम बिंदुओं पर चर्चा की गई है।
इधर, शहर में चर्चा यह भी है कि दिल्ली से आई खुफिया अधिकारियों की एक टीम ने भी यूनिवर्सिटी के आसपास मोहल्लों का दौरा किया है। फैसले को लेकर यूनिवर्सिटी परिसर में चर्चा शुरू हो गई है। अगर अल्पसंख्यक दर्जा रहेगा तो क्या होगा ? नहीं रहेगा तो यूनिवर्सिटी पर क्या फर्क पड़ेगा ? इससे यूनिवर्सिटी में हलचल मची है। यूनिवर्सिटी के शिक्षक, विद्यार्थी और कर्मचारी से लेकर दुनियाभर में रह रहे पूर्व विद्यार्थियों की नजरें सुप्रीमकोर्ट के फैसले पर लगी हैं।
हाईकोर्ट से मामला पहुंचा सुप्रीमकोर्ट
संविधान पीठ इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2006 के फैसले से उत्पन्न एक मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें कहा गया था कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने वर्ष 2019 में इस मामले को सात जजों की संविधान पीठ के पास भेज दिया था। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता, न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था।
आंतरिक विद्यार्थियों का आरक्षण
डॉ. मोहम्मद शाहिद ने बताया कि यूनिवर्सिटी में मुस्लिमों के नाम पर किसी भी तरह का कोई आरक्षण नहीं है। अलबत्ता 50 फीसदी आंतरिक विद्यार्थियों का प्रवेश में आरक्षण होता है। 50 फीसदी विद्यार्थियों में सभी धर्मों के लोग होते हैं। एएमयू में कभी भी 50 फीसदी मुस्लिमों का आरक्षण नहीं रहा है।
ऐसे हुई थी एएमयू की स्थापना
सर सैयद अहमद ने वर्ष 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद मुसलमानों को आधुनिक शिक्षा देने के लिए वर्ष 1875 में मदरसातुल उलूम की स्थापना के बाद आठ जनवरी 1877 को मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल (एमएओ) कॉलेज की स्थापना की थी। सर सैयद के निधन के बाद उनके समर्थकों ने 1920 में ब्रिटिश सरकार की मांग को पूरा करते हुए 30 लाख रुपये का भुगतान किया। इसके बाद 1920 के संसदीय अधिनियम के तहत अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का दर्जा दिलाया था।
हलफनामे को दी गई थी चुनौती
एएमयू की उर्दू एकेडमी के पूर्व निदेशक डॉ. राहत अबरार ने बताया कि वर्ष 1981 में एएमयू संस्थान के अल्पसंख्यक स्वरूप की बहाली के बाद वर्ष 2004 में मनमोहन सिंह की सरकार ने एक पत्र में कहा था कि यह अल्पसंख्यक संस्थान है, इसलिए दाखिला नीति में परिवर्तन कर सकता है। तत्कालीन केंद्र सरकार की अनुमति के बाद विश्वविद्यालय ने वर्ष 2004 में एमडी-एमएस के विद्यार्थियों के लिए प्रवेश नीति बदलकर आरक्षण दिया गया। यूनिवर्सिटी के खिलाफ पीड़ित डॉ. नरेश अग्रवाल व अन्य उच्च न्यायालय इलाहाबाद चले गए। एकल पीठ का फैसला विवि के खिलाफ आया। युगल पीठ का फैसला भी विवि के खिलाफ था। उसके बाद विवि ने उच्चतम न्यायालय की शरण ली, जहां आदेश दिया गया कि जब तक कोई सुबूत नहीं मिलता, तब तक यथा स्थिति बनी रहेगी, लेकिन भाजपा सरकार ने एएमयू पक्ष में दाखिल हलफनामे को चुनौती दी।