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गवाह मुकरे पर विवाहिता को जिंदा जलाने में तीन को उम्रकैद
Tue, 21 Dec 2021 01:04 AM IST
राजेश सिंह
क्राइम डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़
क्राइम डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़
Published by: राजेश सिंह
Updated Tue, 21 Dec 2021 01:04 AM IST
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चंडीगढ़ कोर्ट, हाईकोर्ट, अदालत, न्यायालय
- फोटो : file photo
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महानगर के कोतवाली क्षेत्र के भुजपुरा में तीन नाबालिग बच्चों की मां को ससुराल में मिट्टी का तेल छिड़कर जलाकर मारने की घटना में पति, सास व ससुर को उम्रकैद की सजा से दंडित किया गया है। यह फैसला एडीजे-17 मनोज कुमार सिद्धू की अदालत से सुनाया गया है। खास बात है कि मामले में मृत महिला के भाई आदि सगे संबंधी गवाही से टूट गए, जिसे लेकर अदालत ने तल्ख टिप्पणी की है और नाबालिग बच्चों की देखरेख की व्यवस्था कराने के लिए जिलाधिकारी को निर्देश दिए हैं।
अभियोजन पक्ष के अधिवक्ता एडीजीसी सुधांशु अग्रवाल के अनुसार 5 मार्च 2019 को शाहजमाल के इस्माइल द्वारा कोतवाली में तहरीर दी गई, जिसमें कहा गया कि उसकी बेटी हसमत की शादी 2011 में भुजपुरा के शफीक संग हुई। शादी के बाद दंपती पर तीन बच्चों में दो बेटे व एक बेटी हैं। पिछले दस माह से इनमें दहेज को लेकर विवाद चल रहा था। अब 5 मार्च की शाम सात बजे उसे मिट्टी का तेल छिड़कर जलाया गया है। हसमत को इलाज के लिए जेएन मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया है। इस तहरीर पर पुलिस ने पति शफीक, सास नूरन व ससुर जमील पर मुकदमा दर्ज कर लिया।
दौरान-ए-इलाज महिला की मौत हो गई तो मुकदमे में हत्या की धाराएं बढ़ाकर आरोपियों को जेल भेजा और चार्जशीट दायर की गई। न्यायालय में सत्र परीक्षण के दौरान मामले में वादी पक्ष के गवाहों में से मृतक महिला के भाई व अन्य सगे संबंधी गवाही से टूट गए, जबकि मोहल्ले के दो गवाहों ने गवाही दी। साथ में न्यायालय में मृत महिला का मृत्यु पूर्व बयान भी रखा गया। इस पर न्यायालय ने मृत्यु पूर्व बयान को आधार मानकर कहा कि महिला को मारने के उद्देश्य से जलाया गया, जिससे उसकी मौत हुई।
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इस आधार पर आरोपियों को उम्रकैद व 60-60 हजार रुपये जुर्माने से दंडित किया जाता है। साथ में जुर्माना राशि में से 90 फीसदी धनराशि मृत महिला के तीन नाबालिग बच्चों में बराबर-बराबर राष्ट्रीयकृत बैंक में सावधि जमा योजना में निवेश की जाए। जिसे वे बालिग होने पर प्राप्त कर सकें। जुर्माना अदा न करने पर आरोपियों से नियमानुसार वसूली की जाए।
जिलाधिकारी बच्चों की देखभाल को नियत करें संरक्षक
इस दौरान बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने दलील दी कि महिला की मौत के बाद उसके तीन बच्चे उन्हीं के पास हैं। आरोपियों के जेल जाने पर उनके जीवन का क्या होगा। इस पर अदालत ने जिलाधिकारी को निर्देश दिए हैं कि बच्चों का स्थानीय सक्षम प्राधिकारी को संरक्षक नियत किया जाए। जो उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, देखभाल व गरिमापूर्ण जीवन जीने के संबंध में राज्य की लोक कल्याणकारी नीति के अनुसार क्रियान्वयन करे। संरक्षक का दायित्व होगा कि बच्चों के बालिग होने तक उनकी हर संभव सहायता उपलब्ध कराए।
मांगा गया था मृत्यु दंड
अभियोजन पक्ष के अधिवक्ता सुधांशु अग्रवाल के अनुसार घटना चूंकि गंभीर प्रकार की थी। इसलिए इस मामले में उनके द्वारा अदालत से मृत्युदंड का अनुरोध किया गया था। न्यायालय ने मामले में गंभीर सजा सुनाते हुए उम्रकैद से दंडित किया है। साथ में बच्चों की देखरेख के लिए संरक्षक नियत करने के निर्देश दिए हैं।
ये है न्यायालय की टिप्पणी
‘गवाहों के द्वारा अभियुक्तगण के पक्ष में बयान देना इस बात को दर्शित करता है कि वर्तमान समय में एक सामान्य प्रवृत्ति अभियुक्तों को बचाने की हो गई है। ऐसा आचरण संभवत: व्यक्तिगत, सामाजिक दबाव अथवा आर्थिक समझौते के कारण सामान्यत: देखने को मिलता है। यह सामाजिक विडंबना ही है कि 21वीं में भी महिलाओं को तेल डालकर आग लगाकर जलाने के प्रयास किए जा रहे हैं, जबकि सभ्य समाज में इस प्रकार के कृत्यों की अपेक्षा नहीं की जा सकती। और इससे भी अधिक पीड़ादायक स्थिति यह है कि एक पीड़ित के साथ जब इस प्रकार का आचरण उसके परिवार के सदस्यों द्वारा किया जा रहा हो और इस पीड़ित के सगे रिश्तेदार-नातेदार अभियुक्तों के पक्ष में न्यायालय के समक्ष आकर गवाही देते हों और अभियुक्त को बचाने का प्रयास करते हों तो सिर्फ यही कहा जा सकता है कि वर्तमान समय में हमारी सामाजिक संकल्पनाएं नैतिक मूल्यों के पुनर्मूल्यांकन करने की है। किसी पीड़ित को उसके ससुरालियों द्वारा मिट्टी का तेल छिड़कर आग लगाकर जला दिया जाए और उस पीड़ित का सगा भाई न्यायालय में अभियुक्त को बचाने का प्रयास करे। यह तथ्य वर्तमान समाज में हमारे रिश्तों की तारतम्यता के स्तर को भी दर्शित करता है कि वास्तव में वर्तमान समाज किस दिशा की ओर जा रहा है। भले ही पीड़ित के भाई पर कोई दबाव हो, लेकिन यह तथ्य इस बात को दर्शित करने के लिए पर्याप्त है कि वास्तव में जो नैतिक मूल्य हैं, उनका अवमूल्यन हो रहा है और चिंतन का विषय है। ऐसे में न्यायालय के मत में तटस्थ गवाह, जिनका पीड़ित से कोई संबंध नहीं है, उनके विषय में उल्लेख करना समीचीन होगा कि न्याय प्रशासन में पीड़ित हित की रक्षार्थ बिना प्रभावित हुए साक्ष्य दिया जाना सराहनीय कदम है।’
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अभियोजन पक्ष के अधिवक्ता एडीजीसी सुधांशु अग्रवाल के अनुसार 5 मार्च 2019 को शाहजमाल के इस्माइल द्वारा कोतवाली में तहरीर दी गई, जिसमें कहा गया कि उसकी बेटी हसमत की शादी 2011 में भुजपुरा के शफीक संग हुई। शादी के बाद दंपती पर तीन बच्चों में दो बेटे व एक बेटी हैं। पिछले दस माह से इनमें दहेज को लेकर विवाद चल रहा था। अब 5 मार्च की शाम सात बजे उसे मिट्टी का तेल छिड़कर जलाया गया है। हसमत को इलाज के लिए जेएन मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया है। इस तहरीर पर पुलिस ने पति शफीक, सास नूरन व ससुर जमील पर मुकदमा दर्ज कर लिया।
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दौरान-ए-इलाज महिला की मौत हो गई तो मुकदमे में हत्या की धाराएं बढ़ाकर आरोपियों को जेल भेजा और चार्जशीट दायर की गई। न्यायालय में सत्र परीक्षण के दौरान मामले में वादी पक्ष के गवाहों में से मृतक महिला के भाई व अन्य सगे संबंधी गवाही से टूट गए, जबकि मोहल्ले के दो गवाहों ने गवाही दी। साथ में न्यायालय में मृत महिला का मृत्यु पूर्व बयान भी रखा गया। इस पर न्यायालय ने मृत्यु पूर्व बयान को आधार मानकर कहा कि महिला को मारने के उद्देश्य से जलाया गया, जिससे उसकी मौत हुई।
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इस आधार पर आरोपियों को उम्रकैद व 60-60 हजार रुपये जुर्माने से दंडित किया जाता है। साथ में जुर्माना राशि में से 90 फीसदी धनराशि मृत महिला के तीन नाबालिग बच्चों में बराबर-बराबर राष्ट्रीयकृत बैंक में सावधि जमा योजना में निवेश की जाए। जिसे वे बालिग होने पर प्राप्त कर सकें। जुर्माना अदा न करने पर आरोपियों से नियमानुसार वसूली की जाए।
जिलाधिकारी बच्चों की देखभाल को नियत करें संरक्षक
इस दौरान बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने दलील दी कि महिला की मौत के बाद उसके तीन बच्चे उन्हीं के पास हैं। आरोपियों के जेल जाने पर उनके जीवन का क्या होगा। इस पर अदालत ने जिलाधिकारी को निर्देश दिए हैं कि बच्चों का स्थानीय सक्षम प्राधिकारी को संरक्षक नियत किया जाए। जो उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, देखभाल व गरिमापूर्ण जीवन जीने के संबंध में राज्य की लोक कल्याणकारी नीति के अनुसार क्रियान्वयन करे। संरक्षक का दायित्व होगा कि बच्चों के बालिग होने तक उनकी हर संभव सहायता उपलब्ध कराए।
मांगा गया था मृत्यु दंड
अभियोजन पक्ष के अधिवक्ता सुधांशु अग्रवाल के अनुसार घटना चूंकि गंभीर प्रकार की थी। इसलिए इस मामले में उनके द्वारा अदालत से मृत्युदंड का अनुरोध किया गया था। न्यायालय ने मामले में गंभीर सजा सुनाते हुए उम्रकैद से दंडित किया है। साथ में बच्चों की देखरेख के लिए संरक्षक नियत करने के निर्देश दिए हैं।
ये है न्यायालय की टिप्पणी
‘गवाहों के द्वारा अभियुक्तगण के पक्ष में बयान देना इस बात को दर्शित करता है कि वर्तमान समय में एक सामान्य प्रवृत्ति अभियुक्तों को बचाने की हो गई है। ऐसा आचरण संभवत: व्यक्तिगत, सामाजिक दबाव अथवा आर्थिक समझौते के कारण सामान्यत: देखने को मिलता है। यह सामाजिक विडंबना ही है कि 21वीं में भी महिलाओं को तेल डालकर आग लगाकर जलाने के प्रयास किए जा रहे हैं, जबकि सभ्य समाज में इस प्रकार के कृत्यों की अपेक्षा नहीं की जा सकती। और इससे भी अधिक पीड़ादायक स्थिति यह है कि एक पीड़ित के साथ जब इस प्रकार का आचरण उसके परिवार के सदस्यों द्वारा किया जा रहा हो और इस पीड़ित के सगे रिश्तेदार-नातेदार अभियुक्तों के पक्ष में न्यायालय के समक्ष आकर गवाही देते हों और अभियुक्त को बचाने का प्रयास करते हों तो सिर्फ यही कहा जा सकता है कि वर्तमान समय में हमारी सामाजिक संकल्पनाएं नैतिक मूल्यों के पुनर्मूल्यांकन करने की है। किसी पीड़ित को उसके ससुरालियों द्वारा मिट्टी का तेल छिड़कर आग लगाकर जला दिया जाए और उस पीड़ित का सगा भाई न्यायालय में अभियुक्त को बचाने का प्रयास करे। यह तथ्य वर्तमान समाज में हमारे रिश्तों की तारतम्यता के स्तर को भी दर्शित करता है कि वास्तव में वर्तमान समाज किस दिशा की ओर जा रहा है। भले ही पीड़ित के भाई पर कोई दबाव हो, लेकिन यह तथ्य इस बात को दर्शित करने के लिए पर्याप्त है कि वास्तव में जो नैतिक मूल्य हैं, उनका अवमूल्यन हो रहा है और चिंतन का विषय है। ऐसे में न्यायालय के मत में तटस्थ गवाह, जिनका पीड़ित से कोई संबंध नहीं है, उनके विषय में उल्लेख करना समीचीन होगा कि न्याय प्रशासन में पीड़ित हित की रक्षार्थ बिना प्रभावित हुए साक्ष्य दिया जाना सराहनीय कदम है।’