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सीमा पर छूटा सीसई: अलीगढ़ के आखिरी गांव का हाल-बेहाल, न बनी पक्की सड़क और न अस्पताल

Mon, 07 Sep 2026 10:29 AM IST
Chaman Kumar Sharma नितिन गुप्ता, अमर उजाला नेटवर्क, अलीगढ़
नितिन गुप्ता, अमर उजाला नेटवर्क, अलीगढ़ Published by: Chaman Kumar Sharma Updated Mon, 07 Sep 2026 10:29 AM IST
सार

ग्रामीण डालचंद्र ने बताया कि चुनाव के समय जनप्रतिनिधि वोट मांगने आते हैं, लेकिन जीतने के बाद गांव का रुख नहीं करते। पिछली बार सांसद सतीश गौतम के लिए उनके बेटे यहां प्रचार के लिए आए, लेकिन जीतने के बाद कोई प्रतिनिधि गांव लौटकर नहीं आया।

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condition of Sisai, the last village of Aligarh
सीसई में चटाई बनाते बच्चे, ग्रामीण विकास के दावों की पोल खोलता मार्ग - फोटो : संवाद

विस्तार

बुलंदशहर की सीमा से सटे इस गांव में पक्की सड़क के बजाय कीचड़ भरी गलियां हैं, कई घर आज भी कच्चे हैं और इलाज के लिए ग्रामीणों को अतरौली तक दौड़ लगानी पड़ती है। 300 घर और 800 की आबादी वाले सीसई में दिन-रात चटाई बनाने का काम होता है। हर महीने यहां से 10-12 ट्रक चटाई अलीगढ़ के अलावा आगरा, फतेहाबाद, शमशाबाद, इटावा, मैनपुरी, महाराष्ट्र और फर्रुखाबाद तक भेजी जाती है।

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इस काम से रोज 500 से 700 रुपये तक की कमाई हो जाती है। फिर भी यहां सरकारी योजनाओं और बुनियादी सुविधाओं की पहुंच अब भी सवाल बनी हुई है। सीमा पर छूटा यह विकास सिर्फ सड़क और अस्पताल की कहानी नहीं, बल्कि उन बच्चों की भी कहानी है जिनके हाथों में किताबों की जगह चटाई की पट्टियां उलझी हैं। गांव में 100 से अधिक बच्चे हैं, लेकिन प्राथमिक विद्यालय में नामांकन सिर्फ 25 बच्चों का है और एक दिन में अधिकतम 15 बच्चे ही पहुंचते हैं।
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सवाल पूछा तो ग्रामीण तंज कसते हैं कि विकास तो दूर यहां नालियां तक नहीं बनीं। हर बार वोट मांगने नेताओं के चेले-चपाटे आते हैं लेकिन कभी जनप्रतिनिधि ने यहां आकर इनकी पीड़ा नहीं सुनी। अफसर साल में कभी-कभार आते हैं। इन्हें ये भी नहीं पता कि अभी जिलाधिकारी कौन है?

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मुझे मिलाकर यहां तीन शिक्षक हैं। बच्चों को स्कूल तक लाने का प्रयास रहता है। हाजिरी कम होने पर घरों में जाकर संपर्क भी करते हैं। - मोहम्मद अब्बास, प्रधानाध्यपक प्राथमिक विद्यालय सीसई

मैं अपनी गाड़ी से मरीज अस्पताल भेजती हूं। सड़क बनी थी लेकिन यहां ट्रक आते हैं, इसलिए अब खड़ंजा दिख रहा है। शौचालय की किस्त जिन्हें मिली, उन्होंने उसे खर्च कर दिया। - सूरजवती, प्रशासक सीसई।
सीसई गांव में चटाई निर्माण की पारंपरिक कला को ग्रामीणों की आजीविका का माध्यम बनाने के लिए कौशल विकास, प्रशिक्षण और स्वरोजगार योजनाओं से जोड़ा जाएगा। सड़क, जल निकासी, आवास, पेंशन, उज्ज्वला, स्वास्थ्य और शिक्षा से संबंधित समस्याओं का समाधान कराया जाएगा। बच्चों का शत-प्रतिशत नामांकन और स्कूल में नियमित उपस्थिति सुनिश्चित कराई जाएगी।
उन्होंने बताया कि गांव में 70 वृद्धजनों, 11 निराश्रित महिलाओं एवं नौ दिव्यांगजनों को पेंशन दी जा रही है। हाल ही में 15 प्रधानमंत्री आवास स्वीकृत किए गए हैं। वर्ष 2017 से अब तक 48 आवास दिए गए हैं। 339 राशन कार्डधारक परिवारों को 1484 यूनिट निःशुल्क खाद्यान्न दिया जा रहा है। बीते पांच वर्ष में पांचवें वित्त आयोग से लगभग 45 लाख रुपये की धनराशि गांव के विकास में खर्च की गई है।-योगेंद्र कुमार, सीडीओ, अलीगढ़

32 बार खिंचवाए फोटो, नहीं मिला मकान
सीसई के 62 वर्षीय रघुवीर ने कहा कि प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए कम से कम 32 बार उनका फोटो लिया गया। कभी इधर तो कभी उधर से उनके घर और परिवार के फोटो खींचे गए, लेकिन अब तक मकान नहीं मिला। कई बार जिला मुख्यालय जाकर इसका जवाब भी लेने की कोशिश की, लेकिन किसी ने कोई सहायता नहीं की। आखिर में उन्होंने यह स्वीकार कर लिया कि सीसई की किस्मत नहीं बदलेगी।

कागज गए, सिलिंडर नहीं आया
रघुवीर की तरह गांव की 66 वर्षीय देवकी ने कहा कि साल भर पहले एक शिविर लगा, जिसमें उन्होंने अपने कागज दिए लेकिन आज तक उन्हें न पेंशन मिली और न मुफ्त सिलेंडर। देवकी के पास खड़ी 24 वर्षीय संतोषी ने बताया कि उनकी मां को भी कभी पेंशन नहीं मिली। उन्होंने खुद कई बार ऑनलाइन आवेदन किया, फिर भी लाभ नहीं मिला।

बुखार में भी अतरौली का सहारा
ग्रामीण सोरन सिंह कहते हैं कि गांव में अस्पताल नहीं है। बच्चे को बुखार तक आ जाए तो अतरौली लेकर जाना पड़ता है। रोडवेज बस स्टैंड नहीं होने से आपात स्थिति में वाहन किराए पर लेना पड़ता है। गर्भवती महिला की मासिक जांच तो दूर प्रसव के लिए अस्पताल ले जाने के लिए गांव वाले अपने साधन लेकर जाते हैं। उन्होंने छह ऐसे मामले गिनाए जिनमें देरी के चलते घर में ही प्रसव हो गया।

वोट के बाद गांव की जरूरत नहीं
ग्रामीण डालचंद्र ने बताया कि चुनाव के समय जनप्रतिनिधि वोट मांगने आते हैं, लेकिन जीतने के बाद गांव का रुख नहीं करते। पिछली बार सांसद सतीश गौतम के लिए उनके बेटे यहां प्रचार के लिए आए, लेकिन जीतने के बाद कोई प्रतिनिधि गांव लौटकर नहीं आया। इसी तरह यहां के स्थानीय विधायक संदीप सिंह प्रदेश में शिक्षा राज्य मंत्री हैं। उनके दादा कल्याण सिंह और पिता पूर्व सांसद राजवीर सिंह हैं। डालचंद्र के मुताबिक, पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के समय गांव में कई बार शिविर लगते थे, लेकिन अब उनके परिवार से वहां कोई नहीं आता।

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