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एएमयू की जामा मस्जिद में भी ताजमहल जैसी कैलीग्राफी
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मुगल बादशाह शाहजहां द्वारा बनवाए गए ताजमहल और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में इसके संस्थापक सर सैयद अहमद खान द्वारा बनवाई गई जामा मस्जिद के बीच क्या कोई संबंध हो सकता है?
यह बात हैरान कर देने वाली है। लेकिन हकीकत यह है कि 250 साल के समय के अंतर के बाद भी इन दोनों इमारतों को समानता का एक धागा आपस में जोड़ता है। ताजमहल के चारों गेट पर पवित्र उपदेशों की जो कैलीग्राफी (कलात्मक लिखावट) की गई है, उसी कलाकार द्वारा कभी पत्थरों पर बनाई गई कैलीग्राफी के कुछ पत्थर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की जामा मस्जिद के गेट पर मौजूद है।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के एडवांस स्टडी डिपार्टमेंट ऑफ हिस्ट्री और अलीगढ़ गजट के मुताबिक शाहजहां की एक बेगम अकबराबादी जिनको एजा उन निशा, के नाम से भी जाना जाता है, उनको 1650 में दिल्ली के दरियागंज के पास एक मस्जिद निर्माण की जिम्मेदारी दी गई। इस मस्जिद निर्माण में अब्दुल हक नाम के कैलीग्राफी नक्काश ने पत्थरों पर अपने काम को अंजाम दिया। यह वही अब्दुल हक था जिसे ताजमहल में उसके काम से खुश होकर शाहजहां ने अमानत खान का टाइटल दिया था।
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1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश सैनिकों ने दरियागंज की इस मस्जिद को तबाह कर दिया लेकिन इसके अवशेष एक स्थानीय व्यापारी के पास सुरक्षित रहे। इन अवशेषों को साहिबजादा सुलेमान जहां बहादुर ने खरीदा। सर सैयद अहमद खान इस बात से वाकिफ थे। अलीगढ़ में जामा मस्जिद के निर्माण के दौरान उन्होंने साहिबजादा सुलेमान जहां से ये पत्थर हासिल किए और जामा मस्जिद में लगवाए। आज भी यह पत्थर अपनी शानदार कैलीग्राफी के नमूने का मुजाहिरा कर रहे हैं।
अब्दुल हक शाहजहां के समय में एक बहुत बड़े अफसर थे। बेगम अकबराबादी के जेरे इंतजाम मस्जिद का निर्माण दिल्ली में कराए जाने का भी जिक्र मिलता है। यह भी सही है कि 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश सैनिकों ने दिल्ली में मस्जिदों और मंदिरों के साथ-साथ अन्य निर्माणों को भी ध्वस्त किया। इस तरह कोई हैरानी नहीं कि उस निर्माण की कैलीग्राफी का एक पत्थर यहां लाया गया हो, क्योंकि सर सैयद इन सभी के जानकार थे।
-प्रोफेसर इरफान हबीब, प्रसिद्ध इतिहासकार
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यह बात हैरान कर देने वाली है। लेकिन हकीकत यह है कि 250 साल के समय के अंतर के बाद भी इन दोनों इमारतों को समानता का एक धागा आपस में जोड़ता है। ताजमहल के चारों गेट पर पवित्र उपदेशों की जो कैलीग्राफी (कलात्मक लिखावट) की गई है, उसी कलाकार द्वारा कभी पत्थरों पर बनाई गई कैलीग्राफी के कुछ पत्थर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की जामा मस्जिद के गेट पर मौजूद है।
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अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के एडवांस स्टडी डिपार्टमेंट ऑफ हिस्ट्री और अलीगढ़ गजट के मुताबिक शाहजहां की एक बेगम अकबराबादी जिनको एजा उन निशा, के नाम से भी जाना जाता है, उनको 1650 में दिल्ली के दरियागंज के पास एक मस्जिद निर्माण की जिम्मेदारी दी गई। इस मस्जिद निर्माण में अब्दुल हक नाम के कैलीग्राफी नक्काश ने पत्थरों पर अपने काम को अंजाम दिया। यह वही अब्दुल हक था जिसे ताजमहल में उसके काम से खुश होकर शाहजहां ने अमानत खान का टाइटल दिया था।
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1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश सैनिकों ने दरियागंज की इस मस्जिद को तबाह कर दिया लेकिन इसके अवशेष एक स्थानीय व्यापारी के पास सुरक्षित रहे। इन अवशेषों को साहिबजादा सुलेमान जहां बहादुर ने खरीदा। सर सैयद अहमद खान इस बात से वाकिफ थे। अलीगढ़ में जामा मस्जिद के निर्माण के दौरान उन्होंने साहिबजादा सुलेमान जहां से ये पत्थर हासिल किए और जामा मस्जिद में लगवाए। आज भी यह पत्थर अपनी शानदार कैलीग्राफी के नमूने का मुजाहिरा कर रहे हैं।
अब्दुल हक शाहजहां के समय में एक बहुत बड़े अफसर थे। बेगम अकबराबादी के जेरे इंतजाम मस्जिद का निर्माण दिल्ली में कराए जाने का भी जिक्र मिलता है। यह भी सही है कि 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश सैनिकों ने दिल्ली में मस्जिदों और मंदिरों के साथ-साथ अन्य निर्माणों को भी ध्वस्त किया। इस तरह कोई हैरानी नहीं कि उस निर्माण की कैलीग्राफी का एक पत्थर यहां लाया गया हो, क्योंकि सर सैयद इन सभी के जानकार थे।
-प्रोफेसर इरफान हबीब, प्रसिद्ध इतिहासकार