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आयोध्या मामले पर पुनर्विचार याचिका संवैधानिक पर बोर्ड का फैसला दुर्भाग्यपूर्ण
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अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के विधि संकाय के पूर्व डीन व मुस्लिम पर्सनल लॉ एंड ज्यूडिशरी पुस्तक के लेखक प्रो. मोहम्मद शब्बीर का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर पुनर्विचार याचिका दाखिला करना संवैधानिक अधिकार है। लेकिन ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का यह फैसला दुर्भाग्यपूर्ण है।
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मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य रह चुके प्रो. शब्बीर ने अमर उजाला से विशेष बातचीत में कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का फैसला ऐतिहासिक है। भारत ही नहीं बल्कि दुनियाभर के लोगों की इस पर नजर थी। यह फैसला इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया है। न्यायालय ने विवादित जमीन पर ट्रस्ट के जरिये मंदिर बनाने और मस्जिद निर्माण के लिए अयोध्या में 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया है। प्रो. शब्बीर का कहना है कि फैसले के बाद मुस्लिम समुदाय दो हिस्सोें में बंट गया है।
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एक धड़े का मानना है कि लंबे समय से चले आ रहे विवाद का अंत हो गया। इससे हिंदू-मुस्लिम के बीच के झगड़े का कारण खत्म हो गया।। इसमें मैं भी शामिल हूं। फैसले की कानूनियत एवं नैतिकता पर नुक्ताचीनी न करें। लेकिन दूसरे धड़े को एतराज है।
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उनका कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय यह मानता है कि मस्जिद को गैर कानूनी तरीके से गिराया गया था। गलत तरीके से मूर्तियां रखी गई थीं। न्यायालय यह भी मानता है कि मुसलमान वहां नमाज पढ़ते थे। ये लोग कानून की रोशनी में इंसाफ की मांग कर रहे हैं। इसलिए पांच एकड़ जमीन लेने को तैयार नहीं हैं।
प्रो. शब्बीर कहते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय ने फैसले में संविधान के अनुच्छेद 142 का प्रयोग किया है ताकि हिंदू मुस्लिम के बीच का वैमनस्यता खत्म हो जाए और सांप्रदायिक सद्भाव बना रहे। हिंदुओं से करीब दोगुना 5 एकड़ जमीन (सूटेबल एवं प्रॉमिनेंट स्थान पर) मस्जिद के लिए देने का आदेश दिया गया है, जबकि मुसलमानों ने इसके लिए कोई मांग नहीं की थी। प्रो. शब्बीर का कहना है कि पुनर्विचार याचिका दाखिला करना संवैधानिक अधिकार है। लेकिन यह सर्वोच्च न्यायालय का सर्वमान्य फैसला है। मुझे नहीं लगता कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अपने मकसद में कामयाब हो पाएगा।