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अतरौली: 12 बार कल्याण के परिवार मेें रही सीट
आशीष निगम
Updated Sat, 14 Jan 2017 02:17 AM IST
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- फोटो : Amar Ujala
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जिले की सबसे चर्चित विधानसभा सीट है अतरौली। इसी से जीतने के बाद कल्याण सिंह दो बार सूबे के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने कुल दस बार विधानसभा में इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। उनकी पुत्रवधू भी यहां से दो बार विधायक बनीं।
कल्याण सिंह एक बार इस सीट पर अनवार खां से चुनाव हारे भी। वर्तमान विधायक वीरेश यादव के पिता बाबू सिंह भी एक बार यहां से विधायक रहे।
आजादी के बाद वर्ष 1951 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में ये सीट अतरौली नार्थ के नाम से जानी जाती थी, जिसकोे 86 नंबर दिया गया था। पहली बार इंडियन नेशनल कांग्रेस के श्रीनिवास यहां से विधायक बने। उन्होंने सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार बाबू सिंह को हरा दिया था।
साल 1957 में नेकराम ने कांग्रेस को दोबारा से ये सीट जीत कर दी। श्रीनिवास गंगीरी विधानसभा में चले गये, वहां से चुनाव लड़ा। वर्ष 1962 के चुनाव में सोशलिस्ट पार्टी से बाबू सिंह विधायक बने। वर्ष 1967 में पहली बार कल्याण सिंह भारतीय जनसंघ से विधानसभा पहुंचे। साल 1969 में कल्याण सिंह दोबारा जनसंघ से विधायक बने और 1974 के विधानसभा चुनाव में भी यह सिलसिला जारी रहा। वर्ष 1977 में कल्याण सिंह जनता पार्टी से चुनाव जीत गए। साल 1980 में हुए चुनाव में अनवार खां इंडियन नेशनल कांग्रेस आई से कल्याण सिंह के सामने आए और वे चुनाव जीते।
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इसके बाद 1985, 1989, 1991, 1993 और 1996 कल्याण सिंह की लगातार पांच बार जीत हुई। इसके बाद भाजपा छोड़ राष्ट्रीय कांति पार्टी का गठन कर वर्ष 2002 में कल्याण सिंह फिर विधायक बने। इसके बाद वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में वह एटा से सांसद बने तो अतरौली में उपचुनाव हुआ जिसमें कल्याण सिंह की पुत्रवधू प्रेमलता वर्मा विधायक बनीं।
वर्ष 2007 भाजपा के टिकट पर प्रेमलता वर्मा दूसरी बार विधायक बनीं। वर्ष 2012 में वीरेश यादव ने कल्याण परिवार की जीत का सिलसिला तोड़ा।
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कल्याण सिंह एक बार इस सीट पर अनवार खां से चुनाव हारे भी। वर्तमान विधायक वीरेश यादव के पिता बाबू सिंह भी एक बार यहां से विधायक रहे।
आजादी के बाद वर्ष 1951 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में ये सीट अतरौली नार्थ के नाम से जानी जाती थी, जिसकोे 86 नंबर दिया गया था। पहली बार इंडियन नेशनल कांग्रेस के श्रीनिवास यहां से विधायक बने। उन्होंने सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार बाबू सिंह को हरा दिया था।
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साल 1957 में नेकराम ने कांग्रेस को दोबारा से ये सीट जीत कर दी। श्रीनिवास गंगीरी विधानसभा में चले गये, वहां से चुनाव लड़ा। वर्ष 1962 के चुनाव में सोशलिस्ट पार्टी से बाबू सिंह विधायक बने। वर्ष 1967 में पहली बार कल्याण सिंह भारतीय जनसंघ से विधानसभा पहुंचे। साल 1969 में कल्याण सिंह दोबारा जनसंघ से विधायक बने और 1974 के विधानसभा चुनाव में भी यह सिलसिला जारी रहा। वर्ष 1977 में कल्याण सिंह जनता पार्टी से चुनाव जीत गए। साल 1980 में हुए चुनाव में अनवार खां इंडियन नेशनल कांग्रेस आई से कल्याण सिंह के सामने आए और वे चुनाव जीते।
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इसके बाद 1985, 1989, 1991, 1993 और 1996 कल्याण सिंह की लगातार पांच बार जीत हुई। इसके बाद भाजपा छोड़ राष्ट्रीय कांति पार्टी का गठन कर वर्ष 2002 में कल्याण सिंह फिर विधायक बने। इसके बाद वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में वह एटा से सांसद बने तो अतरौली में उपचुनाव हुआ जिसमें कल्याण सिंह की पुत्रवधू प्रेमलता वर्मा विधायक बनीं।
वर्ष 2007 भाजपा के टिकट पर प्रेमलता वर्मा दूसरी बार विधायक बनीं। वर्ष 2012 में वीरेश यादव ने कल्याण परिवार की जीत का सिलसिला तोड़ा।