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जमाखोरी का खेल, महंगा कर रहा सरसों का तेल
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ऑयल स्पेलर में सरसों के तेल के साथ खल निकालते अमित कुमार।
- फोटो : CITY OFFICE
सरसों की जमाखोरी की वजह से सरसों का तेल महंगा होता जा रहा है। खास बात यह है कि मंडी में सरसों पहुंच ही नहीं रही है। बमुश्किल मंडी में सरसों पहुंचती है तो नीलामी से इसकी बिक्री होती है। फसल महंगी बिक रही है तो तेल भी महंगा होता जा रहा है। 2019-20 में 3200 रुपये क्विंटल बिकने वाली सरसों अब 7300 रुपये तक बिक रही है । यही कारण है कि 80 रुपये किलो वाला सरसों का तेल दो साल में 180 रुपये किलो तक पहुंच गया है।
धनीपुर मंडी में जानकारी की गई तो पता चला कि साल में बमुश्किल 15 से 20 क्विंटल सरसों आवक होती है। सरसों खरीदने का क्रय केंद्र नहीं है। इसलिए इसका समर्थन मूल्य भी नहीं है। जो फसल आती है उसे नीलामी से बेचते हैं। विगत दिनों पहले 7300 रुपये क्विंटल तक सरसों की नीलामी लग चुकी है। शुक्रवार को सरसों 6800 रुपये क्विंटल के हिसाब से बिकी। इस पर जीएसटी और मंडी शुल्क अलग से लगता है। यही वजह है कि सरसों की आवक मंडी में कम हो रही है। क्योंकि किसानों से व्यापारियों ने सीधे फसल खरीदना प्रारंभ कर दिया है। यहां मंडी शुल्क से 100-200 सौ रुपये अधिक देकर फसल खरीदी जाती है तो जीएसटी और मंडी शुल्क बच जाता है। वहीं किसानों को हाथोंहाथ रकम मिलती है तो सहूलियत के लिए वह भी सीधे फसल बेच देते हैं । ऐसे में थोड़ी बहुत फसल मंडी में पहुंचती है तो नीलामी में उसकी बोली अधिक लग जाती है। यहां नीलामी में फसल अधिक महंगी बिकती है तो बाजार में भी वही भाव स्थिर हो जाते हैं। अभी विगत दिनों होली पर 4300 रुपये क्विंटल सरसों की फसल बिकी थी। बाजार में डिमांड नहीं है। फसल की पैदावार अच्छी है और क्षेत्रफल भी अच्छा खासा है। फिर भी सरसों के भाव बढ़ते ही जा रहे हैं। कुल मिलाकर कुछ व्यापारियों ने फसल की जमाखोरी कर ली तो बाजार में सरसों पहुंच नहीं रही है। कम फसल आवक के चलते सरसों का तेल महंगी बिक रही है।
सरसों का तेल महंगा होने का यह है गणित
शहर के प्रतिष्ठित कारोबारी ने बताया कि मंडियों में 6800 से लेकर 7100 रुपये क्विंटल के हिसाब से सरसों की फसल बिक रही है। इस पर छह प्रतिशत जीएसटी और एक प्रतिशत मंडी शुल्क अलग से लगता है। अगर एक क्विंटल सरसों की फसल का तेल निकाला जाए तो 33 किलो तेल निकलता है। दो किलो खल जल जाती है। ऐसे में 65 किलो खल बचती है। थोक के रेट में 160 रुपये किलो तेल बिक रहा है। इस हिसाब से 33 किलो तेल की कीमत 5280 रुपये बनती है। वहीं 65 किलो खल 30 रुपये किलो के हिसाब से 1950 रुपये का बिक रहा है। पेराई 250 रुपये क्विंटल है। जबकि लोडिंग-अनलोडिंग में पांच रुपये किलो का चार्ज लग जाता है। ट्रांसपोर्ट का खर्च अलग से है। यही वजह है कि बाजार में सरसों का तेल महंगा बिक रहा है। कोरोना संक्रमण से पहले 2020 में यही फसल 3200 रुपये क्विंटल बिक रही थी। फुटकर में तो सरसों का तेल 180 रुपये किलो तक बिक रहा है।
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पिछले साल कमजोर फसल थी महंगाई का कारण
जानकारों ने बताया कि पिछले साल फसल का दाना कमजोर हो गया था। ऐसे में एक क्विंटल सरसों में बमुश्किल 15 किलो तेल निकला था। कम फसल होने की वजह से मांग बढ़ी। सरसों का तेल भी कम निकला तो महंगाई हो गई। लेकिन इस बार ऐसा नहीं है।
कुछ जमाखोरों ने सरसों के तेल को महंगा करने का खेल रचा है। कहीं कोई तेजी नहीं है, मांग भी नहीं है। केवल फसल जमाखोरी के चलते फसल मंडी नहीं पहुंच रही है। थोड़ी बहुत पहुंचती है तो नीलामी महंगी हो जाती है। प्रशासन को जमाखोरों पर शिकंजा कसना होगा।
-अमित कुमार उर्फ कालू, कृष्णा मस्डट ऑयल स्पेलर, जलाली।
एक महीने पहले 140 रुपये किलो सरसों का तेल बिक रहा था। रिफाइंड 130 रुपये लीटर और डालडा 115 रुपये किलो बिका। जबकि अब 180 रुपये किलो सरसों का तेल, रिफाइंड 150 रुपये लीटर और डालडा 140 रुपये किलो बिक रहा है। दिन व दिन बढ़ रही महंगाई से लोग परेशान हैं। यह समस्या कई ग्राहकों ने मेरे सामने भी रखी है।
- आशीष अग्रवाल कोठी, फकीर चंद प्रदीप कुमार, पीली कोठी, महावीरगंज।
- फरवरी में जरूरत पड़ने पर फसल बेची थी। उस दौरान 4100 रुपये क्विंटल का भाव लगा था। अचानक फसल महंगी होने के खेल का पता नहीं है। लेकिन अगर मालूम होता कि सरसों का भाव बढ़ने वाला है तो कुछ दिन और फसल को रोककर रखता। किसान तो मजबूरी में अफसोस ही कर पाता है।
- संजीव कुमार गौड़, किसान, नहल अतरौली।
सरसों के तेल महंगा होने का कारण जमाखोरी है। किसान तो कर्ज लेकर खेती करता है। मजबूरन उसे औने पौने दाम में फसल बेचनी पड़ती है। इसके बाद यह फसल कहां स्टॉक हो रही है। इसके बारे में प्रशासन को पड़ताल करनी चाहिए। मुनाफाखोरों की करतूत तभी सामने आएगी। मेहनत करने वाला किसान सस्ते में फसल बेच रहा है। जबकि मुनाफाखोर मुनाफा कमा रहे हैं। पता नहीं देश का क्या होगा।
- नरेंद्र चौधरी, किसान, जगतपुर।
मंडी में पूरे सालभर में बमुश्किल 15 से 20 क्विंटल ही सरसों आती है। क्रय केंद्र नहीं है। इसीलिए सरसों की नीलामी करा दी जाती है। शुक्रवार को 6800 रुपये क्विंटल सरसों बिकी है। फसल मंडी क्यों नहीं आ रही है। इसका कारण पता नहीं है। लेकिन सरसों का भाव दिन व दिन बढ़ता जा रहा है। यह जांच का विषय है।
अशोक सोलंकी, सचिव धनीपुर मंडी समिति।
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धनीपुर मंडी में जानकारी की गई तो पता चला कि साल में बमुश्किल 15 से 20 क्विंटल सरसों आवक होती है। सरसों खरीदने का क्रय केंद्र नहीं है। इसलिए इसका समर्थन मूल्य भी नहीं है। जो फसल आती है उसे नीलामी से बेचते हैं। विगत दिनों पहले 7300 रुपये क्विंटल तक सरसों की नीलामी लग चुकी है। शुक्रवार को सरसों 6800 रुपये क्विंटल के हिसाब से बिकी। इस पर जीएसटी और मंडी शुल्क अलग से लगता है। यही वजह है कि सरसों की आवक मंडी में कम हो रही है। क्योंकि किसानों से व्यापारियों ने सीधे फसल खरीदना प्रारंभ कर दिया है। यहां मंडी शुल्क से 100-200 सौ रुपये अधिक देकर फसल खरीदी जाती है तो जीएसटी और मंडी शुल्क बच जाता है। वहीं किसानों को हाथोंहाथ रकम मिलती है तो सहूलियत के लिए वह भी सीधे फसल बेच देते हैं । ऐसे में थोड़ी बहुत फसल मंडी में पहुंचती है तो नीलामी में उसकी बोली अधिक लग जाती है। यहां नीलामी में फसल अधिक महंगी बिकती है तो बाजार में भी वही भाव स्थिर हो जाते हैं। अभी विगत दिनों होली पर 4300 रुपये क्विंटल सरसों की फसल बिकी थी। बाजार में डिमांड नहीं है। फसल की पैदावार अच्छी है और क्षेत्रफल भी अच्छा खासा है। फिर भी सरसों के भाव बढ़ते ही जा रहे हैं। कुल मिलाकर कुछ व्यापारियों ने फसल की जमाखोरी कर ली तो बाजार में सरसों पहुंच नहीं रही है। कम फसल आवक के चलते सरसों का तेल महंगी बिक रही है।
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सरसों का तेल महंगा होने का यह है गणित
शहर के प्रतिष्ठित कारोबारी ने बताया कि मंडियों में 6800 से लेकर 7100 रुपये क्विंटल के हिसाब से सरसों की फसल बिक रही है। इस पर छह प्रतिशत जीएसटी और एक प्रतिशत मंडी शुल्क अलग से लगता है। अगर एक क्विंटल सरसों की फसल का तेल निकाला जाए तो 33 किलो तेल निकलता है। दो किलो खल जल जाती है। ऐसे में 65 किलो खल बचती है। थोक के रेट में 160 रुपये किलो तेल बिक रहा है। इस हिसाब से 33 किलो तेल की कीमत 5280 रुपये बनती है। वहीं 65 किलो खल 30 रुपये किलो के हिसाब से 1950 रुपये का बिक रहा है। पेराई 250 रुपये क्विंटल है। जबकि लोडिंग-अनलोडिंग में पांच रुपये किलो का चार्ज लग जाता है। ट्रांसपोर्ट का खर्च अलग से है। यही वजह है कि बाजार में सरसों का तेल महंगा बिक रहा है। कोरोना संक्रमण से पहले 2020 में यही फसल 3200 रुपये क्विंटल बिक रही थी। फुटकर में तो सरसों का तेल 180 रुपये किलो तक बिक रहा है।
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पिछले साल कमजोर फसल थी महंगाई का कारण
जानकारों ने बताया कि पिछले साल फसल का दाना कमजोर हो गया था। ऐसे में एक क्विंटल सरसों में बमुश्किल 15 किलो तेल निकला था। कम फसल होने की वजह से मांग बढ़ी। सरसों का तेल भी कम निकला तो महंगाई हो गई। लेकिन इस बार ऐसा नहीं है।
कुछ जमाखोरों ने सरसों के तेल को महंगा करने का खेल रचा है। कहीं कोई तेजी नहीं है, मांग भी नहीं है। केवल फसल जमाखोरी के चलते फसल मंडी नहीं पहुंच रही है। थोड़ी बहुत पहुंचती है तो नीलामी महंगी हो जाती है। प्रशासन को जमाखोरों पर शिकंजा कसना होगा।
-अमित कुमार उर्फ कालू, कृष्णा मस्डट ऑयल स्पेलर, जलाली।
एक महीने पहले 140 रुपये किलो सरसों का तेल बिक रहा था। रिफाइंड 130 रुपये लीटर और डालडा 115 रुपये किलो बिका। जबकि अब 180 रुपये किलो सरसों का तेल, रिफाइंड 150 रुपये लीटर और डालडा 140 रुपये किलो बिक रहा है। दिन व दिन बढ़ रही महंगाई से लोग परेशान हैं। यह समस्या कई ग्राहकों ने मेरे सामने भी रखी है।
- आशीष अग्रवाल कोठी, फकीर चंद प्रदीप कुमार, पीली कोठी, महावीरगंज।
- फरवरी में जरूरत पड़ने पर फसल बेची थी। उस दौरान 4100 रुपये क्विंटल का भाव लगा था। अचानक फसल महंगी होने के खेल का पता नहीं है। लेकिन अगर मालूम होता कि सरसों का भाव बढ़ने वाला है तो कुछ दिन और फसल को रोककर रखता। किसान तो मजबूरी में अफसोस ही कर पाता है।
- संजीव कुमार गौड़, किसान, नहल अतरौली।
सरसों के तेल महंगा होने का कारण जमाखोरी है। किसान तो कर्ज लेकर खेती करता है। मजबूरन उसे औने पौने दाम में फसल बेचनी पड़ती है। इसके बाद यह फसल कहां स्टॉक हो रही है। इसके बारे में प्रशासन को पड़ताल करनी चाहिए। मुनाफाखोरों की करतूत तभी सामने आएगी। मेहनत करने वाला किसान सस्ते में फसल बेच रहा है। जबकि मुनाफाखोर मुनाफा कमा रहे हैं। पता नहीं देश का क्या होगा।
- नरेंद्र चौधरी, किसान, जगतपुर।
मंडी में पूरे सालभर में बमुश्किल 15 से 20 क्विंटल ही सरसों आती है। क्रय केंद्र नहीं है। इसीलिए सरसों की नीलामी करा दी जाती है। शुक्रवार को 6800 रुपये क्विंटल सरसों बिकी है। फसल मंडी क्यों नहीं आ रही है। इसका कारण पता नहीं है। लेकिन सरसों का भाव दिन व दिन बढ़ता जा रहा है। यह जांच का विषय है।
अशोक सोलंकी, सचिव धनीपुर मंडी समिति।