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एएमयू में दलितों को आरक्षण नहीं मिलने के लिए कौन जिम्मेदार

Mon, 11 Jul 2016 01:42 AM IST
कौशल कुमार ओझा
कौशल कुमार ओझा Updated Mon, 11 Jul 2016 01:42 AM IST
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After reservation at AMU responsible for Dalits
एएमयू - फोटो : अलीगढ़/ब्यूरो
आजादी के बाद आज तक अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में अनुसूचित जाति, जनजाति तथा पिछड़े वर्ग को आरक्षण का अधिकार नहीं मिला। इसके लिए जिम्मेदार कौन है। इन वर्गों के लोगों का क्या अपराध है कि उनको उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा है।
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यह सवाल दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक प्रो. राजकुमार फलवारिया एवं दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के डॉ. ईश्वर शरण विश्वकर्मा ने अपनी पुस्तक ‘राष्ट्रीय आरक्षण नीति एवं अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय’ में उठाया है। इस पुस्तक को संवैधानिक अधिकारों का संघर्ष के रूप में पेश किया गया है। नई दिल्ली के पटेल चेस्ट में पिछले महीने भाजपा के करीब 50 सांसद एवं विधायकों के साथ-साथ आरएसएस के वरिष्ठ पदाधिकारियों की मौजूदगी में इस पुस्तक का विमोचन कर एएमयू में दलितों एवं पिछड़ों को आरक्षण दिलाने का शंखनाद किया गया। लेखकों ने पुस्तक के सारांश एवं निष्कर्ष में कहा है कि विश्वविद्यालय कोई अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है।
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इसको एससी, एसटी एवं पिछड़े वर्ग को अविलंब आरक्षण प्रदान करना चाहिए। सन 1920 में विश्वविद्यालय के प्रारंभ होने पर से पूर्व ही सरकार ने बहुत स्पष्ट शब्दों में साफ कर दिया था कि यह विश्वविद्यालय सरकार द्वारा संचालित विश्वविद्यालय रहेगा। संविधान सभा में डॉ. अंबेडकर सहित सभी ने इस विश्वविद्यालय को राष्ट्रीय महत्व का केंद्रीय विश्वविद्यालय ही स्वीकार किया तथा संविधान की संघीय सूची 1 में रखा गया। 1951 में मौलाना आजाद, 1965 में मोहम्मद करीब छागला जैसे शिक्षा मंत्रियों ने स्पष्ट किया था कि यह विश्वविद्यालय अल्पसंख्यक विश्वविद्यालय नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय (1968) में संविधान पीठ के पांचों न्यायाधीशों ने भी सर्वसम्माति से स्पष्ट किया था कि यह विश्वविद्यालय अल्पसंख्यक संस्था नहीं है।
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1981 में कांग्रेस ने असंवैधानिक ढंग से एएमयू एक्ट में कुछ संशोधन किए थे और अपने मुस्लिम मतदाताओं को प्रसन्न करने का प्रयास किया था, यह गलत था। जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी एवं मोरारजी देसाई ने कभी इसके अल्पसंख्यक स्वरूप का समर्थन नहीं किया। एएमयू बचाओ मंच के समन्वयक डॉ. मानवेंद्र प्रताप सिंह भी कार्यक्रम में मौजूद थे।

उन्होंने बताया कि पुस्तक के लेखक प्रो. राज कुमार फलवारिया राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक, दलित चिंतक एवं विचारक हैं, जबकि डॉ. ईश्वर शरण  विश्वकर्मा भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषsद के सदस्य और इतिहासविद् हैं। 103 पेज की पुस्तक 17 अध्यायों में विभक्त है। प्राक्कथन डॉ. बीआर अंबेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय, डॉ. अंबेडकरनगर (महू), जिला इंदौर (मध्य प्रदेश) के कुलपति डॉ. आरएस कुरील की है।
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