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जनसंख्या विस्फोट कर रहा शहर के ढांचे पर चोट
Updated Tue, 11 Jul 2017 01:07 AM IST
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जनसंख्या विस्फोट कर रहा शहर के ढांचे पर चोट
ब्यूरो, अमर उजाला अलीगढ़।
जनसंख्या के बोझ से पुराने शहर की आधारभूत व्यवस्थाएं चरमरा गई हैं। पुराने इलाके जैसे कनवरी गंज, जयगंज, अब्दुल करीम चौराहा, सराय हकीम, बारहद्वारी, घुड़िया बाग, ऊपर कोट, रेलवे रोड, खैर रोड आदि में इस समय जो सड़कें, सीवर, नालियां, गलियां आदि हैं, वह चार दशक पहले की आबादी को ध्यान में रखकर तैयार की गई थीं। 40-45 साल पहले अलीगढ़ शहर की आबादी करीब ढाई लाख थी, इस समय 12 लाख है। पुराने शहर का आधारभूत ढांचा वही है। उस पर बहुमंजिला इमारतों और यातायात का दबाव और बढ़ गया है। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह भी है कि लगातार फैल रहे शहर के नियोजित विकास के लिए बहुत ज्यादा ठोस प्रयास नहीं किए गए। जिससे स्थिति और भी खराब हुई।
क्या नुकसान हैं बढ़ रही जनसंख्या के
वरिष्ठ समाजशास्त्री डॉ. ज्ञानेंद्र मिश्रा कहते हैं कि बहुत ज्यादा जनसंख्या वृद्धि से उपलब्ध संसाधनों पर दबाव पड़ता है। सामाजिक जीवन स्तर की गुणवत्ता प्रभावित होती है। जरूरतें बढ़ जाती हैं। पूरा सामाजिक ताना बना प्रभावित होता है। उदाहरण के लिए सामान्य आय में दो बच्चों को अच्छी शिक्षा दी जा सकती है। लेकिन इसी सामान्य आय में पांच बच्चों को वह शिक्षा नहीं दी जा सकती।
नई लहर नया विश्वास...
परिवार नियोजन के लिए जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा देने के लिए स्वास्थ्य विभाग की ओर से ‘नई लहर, नया विश्वास, संपूर्ण जिम्मेदारी से परिवार विकास’ नाम से कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इसमें महिलाओं को परिवार नियोजन के तरीके और इससे होने वाले लाभों के विषय में जानकारी दी जा रही है। इसके अलावा विभिन्न स्थानों पर जागरूकता कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं।
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आंकड़े
- 1975 में मोहन लाल गौतम जिला अस्पताल में एक महीने में करीब 250 प्रसव होते थे। अब महीने में 800 होते हैं।
- 1975 में जिले की प्रजनन दर 4.5 थी। अब यह घटकर 2.3 रह गई है। मतलब यह है कि अब परिवार में कम बच्चे हैं।
जो है सबसे आसान, उसे नहीं अपना रहा इनसान
लगातार बढ़ रही जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए सरकार के स्तर से प्रयास किए गए हैं। स्वास्थ्य विभाग की अपर निदेशक डॉ. गीता प्रधान कहती हैं कि परिवार नियोजन के लिए पुरुष नसबंदी सबसे आसान तरीका है। इसमें कोई सर्जरी नहीं होती, न कोई टांका लगाया जाता है। छह मिनट की एक एक्टिविटी है। लेकिन इसको अपनाने वालों की संख्या सबसे कम है। यह पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता है। इसके अलावा जो अन्य तरीके हैं, वह महिला के लिए ही हैं। डॉ. प्रधान कहती हैं कि जिन महिलाओं में खून की कमी है हम उनकी नसबंदी नहीं करते हैं। गर्भ निरोधकों में अन्य तरीके डिंपा, कॉपर टी, पीपीआईसीडी हैं।
वर्जन
सबसे अच्छी बात यह है कि अब परिवार नियोजन को धर्म, जाति और ऐसी ही अन्य रूढ़ियों से ऊपर उठकर देखा जा रहा है। लोगों में इस संबंध में पहले की अपेक्षा जागरूकता आई है। यह अच्छा संकेत है।
- फैज मोहम्मद, स्वास्थ्य विभाग के पूर्व सदस्य
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ब्यूरो, अमर उजाला अलीगढ़।
जनसंख्या के बोझ से पुराने शहर की आधारभूत व्यवस्थाएं चरमरा गई हैं। पुराने इलाके जैसे कनवरी गंज, जयगंज, अब्दुल करीम चौराहा, सराय हकीम, बारहद्वारी, घुड़िया बाग, ऊपर कोट, रेलवे रोड, खैर रोड आदि में इस समय जो सड़कें, सीवर, नालियां, गलियां आदि हैं, वह चार दशक पहले की आबादी को ध्यान में रखकर तैयार की गई थीं। 40-45 साल पहले अलीगढ़ शहर की आबादी करीब ढाई लाख थी, इस समय 12 लाख है। पुराने शहर का आधारभूत ढांचा वही है। उस पर बहुमंजिला इमारतों और यातायात का दबाव और बढ़ गया है। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह भी है कि लगातार फैल रहे शहर के नियोजित विकास के लिए बहुत ज्यादा ठोस प्रयास नहीं किए गए। जिससे स्थिति और भी खराब हुई।
क्या नुकसान हैं बढ़ रही जनसंख्या के
वरिष्ठ समाजशास्त्री डॉ. ज्ञानेंद्र मिश्रा कहते हैं कि बहुत ज्यादा जनसंख्या वृद्धि से उपलब्ध संसाधनों पर दबाव पड़ता है। सामाजिक जीवन स्तर की गुणवत्ता प्रभावित होती है। जरूरतें बढ़ जाती हैं। पूरा सामाजिक ताना बना प्रभावित होता है। उदाहरण के लिए सामान्य आय में दो बच्चों को अच्छी शिक्षा दी जा सकती है। लेकिन इसी सामान्य आय में पांच बच्चों को वह शिक्षा नहीं दी जा सकती।
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नई लहर नया विश्वास...
परिवार नियोजन के लिए जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा देने के लिए स्वास्थ्य विभाग की ओर से ‘नई लहर, नया विश्वास, संपूर्ण जिम्मेदारी से परिवार विकास’ नाम से कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इसमें महिलाओं को परिवार नियोजन के तरीके और इससे होने वाले लाभों के विषय में जानकारी दी जा रही है। इसके अलावा विभिन्न स्थानों पर जागरूकता कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं।
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आंकड़े
- 1975 में मोहन लाल गौतम जिला अस्पताल में एक महीने में करीब 250 प्रसव होते थे। अब महीने में 800 होते हैं।
- 1975 में जिले की प्रजनन दर 4.5 थी। अब यह घटकर 2.3 रह गई है। मतलब यह है कि अब परिवार में कम बच्चे हैं।
जो है सबसे आसान, उसे नहीं अपना रहा इनसान
लगातार बढ़ रही जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए सरकार के स्तर से प्रयास किए गए हैं। स्वास्थ्य विभाग की अपर निदेशक डॉ. गीता प्रधान कहती हैं कि परिवार नियोजन के लिए पुरुष नसबंदी सबसे आसान तरीका है। इसमें कोई सर्जरी नहीं होती, न कोई टांका लगाया जाता है। छह मिनट की एक एक्टिविटी है। लेकिन इसको अपनाने वालों की संख्या सबसे कम है। यह पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता है। इसके अलावा जो अन्य तरीके हैं, वह महिला के लिए ही हैं। डॉ. प्रधान कहती हैं कि जिन महिलाओं में खून की कमी है हम उनकी नसबंदी नहीं करते हैं। गर्भ निरोधकों में अन्य तरीके डिंपा, कॉपर टी, पीपीआईसीडी हैं।
वर्जन
सबसे अच्छी बात यह है कि अब परिवार नियोजन को धर्म, जाति और ऐसी ही अन्य रूढ़ियों से ऊपर उठकर देखा जा रहा है। लोगों में इस संबंध में पहले की अपेक्षा जागरूकता आई है। यह अच्छा संकेत है।
- फैज मोहम्मद, स्वास्थ्य विभाग के पूर्व सदस्य