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138 साल पुरानी गवर्नमेंट प्रेस अब इतिहास के पन्नों में होगी

Sun, 01 Oct 2017 05:31 PM IST
Updated Sun, 01 Oct 2017 05:31 PM IST
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138 साल पुरानी गवर्नमेंट प्रेस अब इतिहास के पन्नों में होगी
138 साल पुरानी गवर्नमेंट प्रेस अब इतिहास के पन्नों में होगी
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ब्यूरो, अमर उजाला अलीगढ़।

138 साल पहले 1879 में स्थापित की गई अलीगढ़ की गवर्नमेंट प्रेस अब इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगी। केंद्र सरकार ने अब इसको बंद करने का फैसला ले लिया है। वहीं कर्मचारियों को बाकी बचे अन्य प्रेसों में समायोजित करने का फैसला लिया है। इस प्रेस को बंद किए जाने के फैसले के खिलाफ प्रेस वर्कर एसोसिएशन ने विरोध जताया है। इस संबंध में प्रेस परिसर में एसोसिएशन की एक बैठक हुई। जिसमें विरोध की आगामी रणनीति पर विचार किया गया।

20 सितंबर 2017 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने फैसला लिया कि देश में कुल 17 प्रिंटिंग प्रेस में से केवल पांच प्रिंटिंग प्रेसों को ही चालू रखा जाएगा। जिसमें दिल्ली में तीन, महाराष्ट्र में नासिक और कोलकाता में टेंपल स्ट्रीट पर बनीं प्रेस शामिल हैं। अलीगढ़ में गवर्नमेंट प्रेस को वर्ष 2012-13 में उत्पादन के आधार पर सभी प्रिंटिंग प्रेसों में प्रथम पुरस्कार मिला था। कर्मचारी नेता और एसोसिएशन के अध्यक्ष चंद्र शेखर चटर्जी का आरोप है कि सरकार की मंशा है कि अलीगढ़ में बंद की जा रही प्रेस की 468 एकड़ जमीन को निजी हाथों में सौंप दिया जाए। सरकार के इस फैसले के विरोध में कर्मचारी लामबंद हो रहे हैं। प्रेस परिसर में विरोध की रणनीति तैयार की गई। जिसके लिए बुधवार को परिसर में ही बैठक की गई। बैठक में मुख्य वक्ता जगदीश शर्मा, अध्यक्ष चंद्रशेखर चटर्जी, सुरेंद्र पाल सिंह, नीरज सिंह, सतीश बनर्जी आदि शामिल थे।
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‘सरकार के फैसले के खिलाफ विरोध की रणनीति पर विचार किया जा रहा है। सरकार सरकारी नौकरियों को समाप्त कर निजीकरण की प्रक्रिया को बढ़ावा देने में जुटी है’
- चंद्रशेखर चटर्जी, अध्यक्ष, प्रेस वर्कर एसोसिएशन
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कांग्रेस की स्थापना से भी पुरानी है प्रेस की इमारत
अलीगढ़। इस प्रिंटिंग प्रेस की इमारत की बात करें तो यह इंडियन नेेशनल कांग्रेस की स्थापना (1885) से भी पुरानी है। इस इमारत में प्रवेश करते ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस समय भवन निर्माण की शैली क्या रही होगी? उस समय बिजली नहीं थी तो दिन के प्रकाश और क्रास वेंटीलेशन की व्यवस्था भवन में साफ देखी जा सकती है। लिफ्ट नहीं थी, इसलिए सीढ़िया इस प्रकार की बनी थी कि कोई वृद्ध भी चढ़ सके। भवन पर यूरोपियन भवन निर्माण की शैली पूरी तरह हावी है। अब यह इमारत हेरिटेज बिल्डिंग में शामिल है। अलीगढ़ मुस्लिम विवि के कई शोधार्थी इस पर शोध कर चुके हैं। साथ ही उस समय रहे अंग्रेज अफसरों के वंशज भी कई बार अलीगढ़ आकर इमारत को देख चुके हैं। इस तरह इस इमारत ने राष्ट्रीय आंदोलन के उद्भव से लेकर उफान और बाद में स्वतंत्रता दिवस की सुबह को भी देखा है।
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