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वृंदावन कुंभ 2021: ढलती उम्र भी संत मदनमोहन दास के लिए नहीं है साधना में बाधक
Sat, 20 Feb 2021 12:12 PM IST
मुकेश कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वृंदावन (मथुरा)
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वृंदावन (मथुरा)
Published by: मुकेश कुमार
Updated Sat, 20 Feb 2021 12:12 PM IST
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वृंदावन कुंभ में संत मोहन दास
- फोटो : अमर उजाला
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कहते हैं कि कुंभ साधना और तप के लिए बने हैं। यहां आने वाले साधु घोर तप और साधना कर मनुष्य और विश्वकल्याण की कामना करते हैं। वृंदावन कुंभ में भी ऐसे कई साधु और संत आए हैं, जो यहां साधना और तप कर रहे हैं। ऐसे ही 85 वर्षीय महंत मदनमोहन दास हैं।
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निंबार्क संप्रदाय से जुड़े संत मदनमोहन दास की वर्ष 1998 में वृंदावन में लगे कुंभ के दौरान महंताई की रस्म हुई थी। इसके बाद वह हर कुंभ में यहां आकर घोर साधना कर रहे हैं। उनकी इस साधना में बढ़ती उम्र के साथ ढलती काया आड़े ना आए, इसके लिए वह योगासन भी करते हैं।
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वृंदावन कुंभ के दौरान हर दिन घंटों ध्यान लगाए रखते हैं। युगल उपासाना में अष्टयाम सेवा में किसी प्रकार का विघभन न हो, इसका पूरा ध्यान रखते हैं। कई बार रात में सोते भी नहीं। उन्होंने कहा कि इस पावन धरा पर सोने के लिए नहीं आए हैं।
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यहां तो जितना भजन इस काया से हो जाए, उतना कम है। हम बड़े भाग्यशाली हैं जो वृंदावन की इस भूमि में आकर ठाकुरजी का नाम लेने का अवसर प्राप्त हुआ है, नहीं तो बड़े-बड़े देवता वृंदावन की धरा के लिए तरसे हैं।
यमुना स्नान के बाद ठाकुरजी की सेवा से करते हैं सुबह की शुरुआत
वृंदावन कुंभ में तत्ववेताचार्य जी खालसा में उनकी हर सुबह यमुना स्नान के बाद ठाकुरजी की सेवा से होती है। मदनमोहन दास कहते हैं कि सुबह चार बजे से उनकी राधा कृष्ण की युगल उपासना शुरू होती है। इसके बाद आठ पहर की उपासना के बाद विश्राम दिया जाता है। इसमें प्रमुख शृंगार आरती, राजभोग आरती, संध्या और शयन आरती हैं। इसके साथ चार पहर की उपासना भी है।
15 वर्ष की आयु में हो गए संत
मूल रूप से राजस्थान के पाली के रहने वाले मदनमोहन 15 वर्ष की आयु में ही संत हो गए। उन्होंने बताया कि जब 15 वर्ष के थे, तभी उन्हें संन्यास लेने की इच्छा जागृत हुई। इसके बाद घर छोड़कर साधु हो गए। निंबार्क संप्रदाय की दीक्षा लेने के बाद इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
वृंदावन कुंभ में तत्ववेताचार्य जी खालसा में उनकी हर सुबह यमुना स्नान के बाद ठाकुरजी की सेवा से होती है। मदनमोहन दास कहते हैं कि सुबह चार बजे से उनकी राधा कृष्ण की युगल उपासना शुरू होती है। इसके बाद आठ पहर की उपासना के बाद विश्राम दिया जाता है। इसमें प्रमुख शृंगार आरती, राजभोग आरती, संध्या और शयन आरती हैं। इसके साथ चार पहर की उपासना भी है।
15 वर्ष की आयु में हो गए संत
मूल रूप से राजस्थान के पाली के रहने वाले मदनमोहन 15 वर्ष की आयु में ही संत हो गए। उन्होंने बताया कि जब 15 वर्ष के थे, तभी उन्हें संन्यास लेने की इच्छा जागृत हुई। इसके बाद घर छोड़कर साधु हो गए। निंबार्क संप्रदाय की दीक्षा लेने के बाद इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।