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यूपी चुनाव 2022: 'भोंपू, बिल्ला, स्टीकर लूटने का दौर चला गया साहब, अब यादों रह गया चुनाव प्रचार'

Tue, 18 Jan 2022 02:13 PM IST
मुकेश कुमार अमर उजाला ब्यूरो, आगरा
अमर उजाला ब्यूरो, आगरा Published by: मुकेश कुमार Updated Tue, 18 Jan 2022 02:13 PM IST
सार

बुजुर्गों का कहना है कि बदलते दौर में चुनाव प्रचार का हाईटेक तरीका अपना रहे सभी छोटे-बड़े राजनीतिक दल भी अब छोटी झंडियों से दूर हो चुके हैं। 

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UP Election 2022 agra old men shared election memories
आगरा चुनाव - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बदलते दौर में प्रचार का हाईटेक तरीका अपना रहे सभी छोटे-बड़े राजनीतिक दल भी अब छोटी झंडियों से दूर हो चुके हैं। यही कारण है कि चुनावी मौसम शुरू होने के साथ आगरा की सेठ गली और लुहार लगी में लगने वाले राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं की भीड़ अब दिखाई नहीं देती है। पृथ्वीनाथ फाटक के रहने वाले 80 साल के करीमचंद बताते हैं कि तीन दशक पहले पीपल के पेड़ के नीचे चुनावी बिसातें तैयार होती थीं।

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ब्रज विहार कॉलोनी के रहने वाले होशियार सिंह बताते हैं कि पार्टियों का बिल्ला पाने के लिए 70-80 के दशक में बच्चों में खूब होड़ लगती थी। सभी राजनीतिक दलों के बिल्ले सभी बच्चों के पास होते थे। गांव से लेकर शहरों की छोटी बच्चियों के हाथों से चुनावी समर में छोटी झंडियां भी गायब हो चुकी हैं।
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खत्म हुआ कारोबार
लुहार गली के व्यापारी सीताराम अग्रवाल ने कहा कि 50 साल से चुनाव प्रचार सामग्री का काम किया है, पर अब कारोबार खत्म हो चुका है। पिछले 20 सालों में बेहद कमी आई है। पहले बिल्ले, झंडे, टोपियों, स्टीकर, बिंदियां, इन सबकी मांग भी बहुत थी। उस दौर में चुनावों में पांच-पांच लाख रुपये के आर्डर मिलते थे।

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पटकों, टोपियों के अलावा कुछ नहीं
व्यापारी मनोज सिंघल ने बताया कि जब से टीवी आया, चुनाव प्रचार सामग्री आधी रह गई। मोबाइल, खासकर स्मार्ट फोन आने के बाद तो पूरी प्रचार सामग्री खत्म हो गई। अब पटकों, टोपियों के अलावा कुछ नहीं है। आयोग के प्रतिबंध लगे तो लोगों में चुनाव को लेकर क्रेज भी खत्म हो गया।

उसूलों की होती थी लड़ाई
दयालबाग के दामोदर दयाल बंसल ने कहा कि चुनावों का वो दौर अलग हुआ करता था। उसूलों पर लड़ाई होती थी। चुनावों में विकास हमेशा मुद्दा रहा। स्टीकर, बिल्ले दिखाई नहीं देते हैं अब। पहले चुनाव त्योहार लगता था। उल्लास और उमंग दिखती थी।  

पहले दिखती थीं टोलियां
अलबतिया बालाजीपुरम निवासी शोभा चतुर्वेदी ने कहा कि महिलाएं पहले कम मतदान करने जाती थीं। उनके पास साधन नहीं थे। आज कहीं तक पहुंचने के सभी साधन उपलब्ध हैं। उस दौर में महिलाओं की टोलियां एक साथ मतदान करने निकलती थीं। अब कम दिखाई देता है। 

चौपाल-गलियों में नहीं दिखता चुनावी बुखार
गांव की चौपाल हो या शहर की गलियां। चुनावी बुखार जो पहले शहर में दिखता था, वह अब दिखाई नहीं देता है। खंदारी के रहने वाले 75 साल के नंदलाल का कहना है कि अब माहौल ही नहीं लगता कि चुनाव है। व्हाट्सएप, टीवी, इंटरनेट ने हमें काफी कुछ दिया तो हमारा काफी कुछ छीना भी है। 

नंदलाल कहते हैं कि पहले बस्तियों की गलियों में चाय की चुस्कियों के साथ चुनावी चर्चा का दौर चलता था। अब लोगों को एक-दूसरे से मिलने की फुर्सत ही नहीं है। टीवी पर घरों में लोग सभी कुछ देख लेते हैं। 

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