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ट्रांसजेंडर बच्चों को मिलने लगी नई पहचान
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 30 Sep 2016 12:58 AM IST
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गुणों के आधार पर लड़का-लड़की बनाए जा रहे ट्रांसजेंडर
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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ट्रांसजेंडर बच्चों के लिंग निर्धारण का अनुपात अब देश में भी तेजी से बढ़ रहा है। डाक्टर बच्चों के 80 फीसदी गुणों के आधार पर लड़के या लड़की का लिंग निर्धारण कर रहे हैं। हालांकि लिंग निर्धारण के बाद मानसिक सपोर्ट में दिक्कतें आ रही हैं।
इंडियन एसोसिएशन ऑफ पीडियाट्रिक सर्जन (आईएपीएस) की 42वीं नेशनल कांफ्रेंस में इस पर चर्चा हुई। पुणे के डा. दसमीत सिंह के मुताबिक तीन माह से दस वर्ष तक के बच्चों का लिंग निर्धारण कराया जा रहा है। भारत में लिंग निर्धारण के बाद मानसिक सपोर्ट की दिक्कत आ रही है। सामाजिक स्वीकारता नहीं है। जिन बच्चों का लिंग विकसित नहीं होता। घरवाले उसकी पहचान छुपाए रखते हैं। लिंग निर्धारण भी चुपके से कराया जाता है और बाद में भी इसको छुपाया जाता है।
गुरुवार शाम को डा. एचएस असोपा ने कांफ्रेंस का उद्घाटन किया । कांफ्रेंस में दूसरे दिन बच्चों की यूरोलॉजी, कैंसर और लेप्रोस्कॉपी सर्जरी पर चर्चा की गई। एम्स के डा. संदीप अग्रवाल ने किडनी के कैंसर पर की गई स्टडी पर प्रकाश डाला।
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उन्होंने बताया कि अब किडनी में कैंसर होने पर पूरे हिस्से को निकालने की जरूरत नहीं है। रेडियोथिरेपी और कीमियोथिरेपी से केवल खराब हिस्से को निकाला जा सकता है। किडनी का बचा हिस्सा भी सपोर्ट देता है।
साउथ अफ्रीका के एलिस्टर मिलर ने बताया कि बच्चों में लीवर की इंजरी होने पर बिना आपरेशन किए बिना इलाज किया जा सकता है। हैदराबाद के पीडियाट्रिक सर्जन डा. चंद्रशेखर ने बताया कि जांच से गर्भ में ही बच्चों की 80 फीसदी एबनॉर्मिलिटी पता चल जाती है।
इस पर खुद गर्भपात का निर्णय नहीं लेना चाहिए। डाक्टर से सलाह लेने के बाद कोई निर्णय लेना चाहिए। कांफ्रेंस में वर्ल्ड फेडरेशन के अध्यक्ष डा. डीके गुप्ता, आईएपीएस के अध्यक्ष डा. किशोर पंजवानी, डा. संजय कुलश्रेष्ठ, डा. राजेश गुप्ता, डा. पुनीत श्रीवास्तव, डा. विक्रम अग्रवाल आदि मौजूद रहे।
इंडियन एसोसिएशन ऑफ पीडियाट्रिक सर्जन (आईएपीएस) की 42वीं नेशनल कांफ्रेंस में इस पर चर्चा हुई। पुणे के डा. दसमीत सिंह के मुताबिक तीन माह से दस वर्ष तक के बच्चों का लिंग निर्धारण कराया जा रहा है। भारत में लिंग निर्धारण के बाद मानसिक सपोर्ट की दिक्कत आ रही है। सामाजिक स्वीकारता नहीं है। जिन बच्चों का लिंग विकसित नहीं होता। घरवाले उसकी पहचान छुपाए रखते हैं। लिंग निर्धारण भी चुपके से कराया जाता है और बाद में भी इसको छुपाया जाता है।
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गुरुवार शाम को डा. एचएस असोपा ने कांफ्रेंस का उद्घाटन किया । कांफ्रेंस में दूसरे दिन बच्चों की यूरोलॉजी, कैंसर और लेप्रोस्कॉपी सर्जरी पर चर्चा की गई। एम्स के डा. संदीप अग्रवाल ने किडनी के कैंसर पर की गई स्टडी पर प्रकाश डाला।
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उन्होंने बताया कि अब किडनी में कैंसर होने पर पूरे हिस्से को निकालने की जरूरत नहीं है। रेडियोथिरेपी और कीमियोथिरेपी से केवल खराब हिस्से को निकाला जा सकता है। किडनी का बचा हिस्सा भी सपोर्ट देता है।
साउथ अफ्रीका के एलिस्टर मिलर ने बताया कि बच्चों में लीवर की इंजरी होने पर बिना आपरेशन किए बिना इलाज किया जा सकता है। हैदराबाद के पीडियाट्रिक सर्जन डा. चंद्रशेखर ने बताया कि जांच से गर्भ में ही बच्चों की 80 फीसदी एबनॉर्मिलिटी पता चल जाती है।
इस पर खुद गर्भपात का निर्णय नहीं लेना चाहिए। डाक्टर से सलाह लेने के बाद कोई निर्णय लेना चाहिए। कांफ्रेंस में वर्ल्ड फेडरेशन के अध्यक्ष डा. डीके गुप्ता, आईएपीएस के अध्यक्ष डा. किशोर पंजवानी, डा. संजय कुलश्रेष्ठ, डा. राजेश गुप्ता, डा. पुनीत श्रीवास्तव, डा. विक्रम अग्रवाल आदि मौजूद रहे।