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Agra News: ब्रज की माटी में जीवंत हुई महाभारत कालीन परंपरा, धूमधाम से ब्याहे गए टेसू-झांझी
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बाह: टेसू-झांझी की परंपरा- जरार में निकाली गई टेसू की बारात
बाह। महाभारत कालीन लोक परंपरा को जीवंत करते हुए रविवार की रात बाह, जरार, बिजौली और जैतपुर में टेसू की बारात धूमधाम से निकाली गई। विजय दशमी से शरद पूर्णिमा तक चलने वाले इस 5 दिवसीय उत्सव के दौरान ब्रज की गलियों में पारंपरिक गीतों की गूंज रही। बरात में युवा ढोल-नगाड़ों की थाप पर जमकर झूमे।
रविवार को शरद पूर्णिमा पर विवाह और अंतिम विदाई की रस्में निभाई गईं। जरार चौराहे से लेकर मंडप तक लड़कों ने थाली-चम्मच बजाकर बरात निकाली, वहीं लड़कियां झांझी को विवाह मंडप में लेकर पहुंचीं। ढोलक की थाप पर सात फेरे पूरे होने से पहले ही लड़कों ने टेसू का सिर धड़ से अलग कर दिया, जिसके बाद लड़कियों ने सिर पर झांझी रखकर उसे अंतिम विदाई दी। स्थानीय निवासी रामदत्त बघेल, भूपेंद्र भदौरिया और संजय पांडेय ने बताया कि इस परंपरा को बचाने में बड़े भी सहयोग कर रहे हैं। हालांकि, माया देवी, रेनू भदौरिया और रीता भदौरिया ने चिंता जताई कि 90 के दशक की तुलना में अब मोबाइल और टीवी संस्कृति के कारण इस लोक विधा में गिरावट आई है, जिससे नई पीढ़ी वीडियो गेम की तरफ आकर्षित हो रही है।
पौराणिक मान्यताओं से जुड़ा है संदर्भ
इस लोक परंपरा के जानकार डॉ. शिवशंकर कटारे ने बताया कि यह परंपरा भीम के पौत्र बर्बरीक (घटोत्कच के पुत्र) से जुड़ी है। बर्बरीक ने अपनी प्रेमिका गड़बड़ा (झांझी) को विवाह का वचन दिया था, लेकिन महाभारत युद्ध में कृष्ण ने उनका सिर काट दिया था। बाद में बर्बरीक की इच्छा पूरी करने के लिए शरद पूर्णिमा के दिन उनका सांकेतिक विवाह और अंतिम संस्कार किया गया, तभी से यह पौराणिक परंपरा चली आ रही है।
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रविवार को शरद पूर्णिमा पर विवाह और अंतिम विदाई की रस्में निभाई गईं। जरार चौराहे से लेकर मंडप तक लड़कों ने थाली-चम्मच बजाकर बरात निकाली, वहीं लड़कियां झांझी को विवाह मंडप में लेकर पहुंचीं। ढोलक की थाप पर सात फेरे पूरे होने से पहले ही लड़कों ने टेसू का सिर धड़ से अलग कर दिया, जिसके बाद लड़कियों ने सिर पर झांझी रखकर उसे अंतिम विदाई दी। स्थानीय निवासी रामदत्त बघेल, भूपेंद्र भदौरिया और संजय पांडेय ने बताया कि इस परंपरा को बचाने में बड़े भी सहयोग कर रहे हैं। हालांकि, माया देवी, रेनू भदौरिया और रीता भदौरिया ने चिंता जताई कि 90 के दशक की तुलना में अब मोबाइल और टीवी संस्कृति के कारण इस लोक विधा में गिरावट आई है, जिससे नई पीढ़ी वीडियो गेम की तरफ आकर्षित हो रही है।
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पौराणिक मान्यताओं से जुड़ा है संदर्भ
इस लोक परंपरा के जानकार डॉ. शिवशंकर कटारे ने बताया कि यह परंपरा भीम के पौत्र बर्बरीक (घटोत्कच के पुत्र) से जुड़ी है। बर्बरीक ने अपनी प्रेमिका गड़बड़ा (झांझी) को विवाह का वचन दिया था, लेकिन महाभारत युद्ध में कृष्ण ने उनका सिर काट दिया था। बाद में बर्बरीक की इच्छा पूरी करने के लिए शरद पूर्णिमा के दिन उनका सांकेतिक विवाह और अंतिम संस्कार किया गया, तभी से यह पौराणिक परंपरा चली आ रही है।
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