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पुराने पन्नों से: कांग्रेस पर नेहरू का ऐसा वर्चस्व, कृपलानी ने छोड़ दी पार्टी और कम्युनिस्टों से मिलाया था हाथ

Thu, 18 Apr 2024 10:01 AM IST
धीरेन्द्र सिंह संजीव सिंह, आगरा
संजीव सिंह, आगरा Published by: धीरेन्द्र सिंह Updated Thu, 18 Apr 2024 10:01 AM IST
सार

जेबी कृपलानी जिनको कांग्रेस का स्तंभ माना जाता था। उस दौर में नेहरू ने कांग्रेस पर अपना वर्चस्व इस कदर कायम कर लिया, कि जेबी कृपलानी ने पार्टी छोड़ दी। इतना ही नहीं उन्होंने  कम्युनिस्टों से हाथ  मिला लिया था।
 

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Nehru had such dominance over Congress Kripalani left party and joined hands with communists
कांग्रेस पर नेहरू का वर्चस्व - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कभी कांग्रेस के स्तंभ रहे जेबी कृपलानी ने चुनाव के लिए कम्युनिस्टों से हाथ मिला लिया था। महात्मा गांधी के कट्टर समर्थक कृपलानी कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। स्वतंत्रता संग्राम में कांग्रेसी आंदोलन का हिस्सा भी बने। वह जवाहर लाल नेहरू के कड़े आलोचक थे। कांग्रेस पर नेहरू वर्चस्व के कारण ही उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी।
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1946 में जेबी कृपलानी कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। जीवटराम भगवानदास कृपलानी ने 1951 में कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने कुछ साथियों के साथ मिलकर 1952 में किसान मजदूर प्रजा पार्टी का गठन किया। वह इसके मुख्य कर्ता धर्ता बन गए। उस वक्त कांग्रेस ही प्रमुख पार्टी थी। कम्युनिस्ट पार्टी उस समय दूसरे नंबर की पार्टी थी। उस वक्त रूस में स्टालिन सत्ता में थे।
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स्टालिन नेहरू के बड़े आलोचक थे। स्टालिन के विचारों का असर भारतीय कम्युनिस्टों पर भी था। यही कारण था कि दुश्मन के दुश्मन दोस्त बन गए। अमर उजाला के 5 मार्च 1952 के अंक में प्रकाशित समाचार के अनुसार कम्युनिस्ट और कृपलानी साथ आ गए। कृपलानी और उस वक्त के कम्युनिस्ट पार्टी के महामंत्री अजय कुमार घोष के बीच लंबी वार्ता हुई। दोनों नेता एक मिश्रित कार्यक्रम पर चलने के लिए तैयार हो गए। इस कार्यक्रम को धारा सभाओं के अंदर और बाहर चलाने पर रजामंदी हुई।

इसलिए मिलाया था हाथ
आचार्य कृपलानी गांधीजी के सपने को पूरा करना चाहते थे। वह सपना था ग्राम स्वराज्य का। जब उन्होंने देखा कि कांग्रेस के साथ रहकर यह पूरा नहीं हो पाएगा तो उन्होंने कम्युनिस्टों के साथ हाथ मिला लिया। उनके साथ सिर्फ जनकल्याणकारी मुद्दों पर ही सहमति बनी थी।
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कांग्रेस और सरकार के संबंध को लेकर थे नेहरू से मतभेद
आचार्य कृपलानी 1946 में कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए। 1948 में नेहरू ने उनकी यह मांग मानने से इन्कार कर दिया था कि सभी निर्णयों में पार्टी का मत लिया जाना चाहिए। उनसे नेहरू ने कहा था कि पार्टी सिद्धांत और दिशा निर्देश तो बना सकती है, लेकिन रोजाना के कार्य में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता। इसके बाद नेहरू और कृपलानी के बीच मतभेद हो गए।
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