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नाविक विद्रोह के नायक नरेश चंद्र नहीं रहे
ब्यूरो, अमर उजाला आगरा
Updated Sat, 20 Dec 2014 10:51 AM IST
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स्वतंत्रता सेनानी नरेश चंद्र सेठ का पिछले दिनों हृदय गति रुक जाने से कानपुर में देहांत हो गया। उन्होंने 1942 के नाविक विद्रोह में सक्रिय रूप से भूमिका निभाकर अंग्रेजी हुकूमत के छक्के छुड़ा दिए थे। नरेश चंद्र ने साथियों के साथ मिलकर नौसेना के जहाज से न सिर्फ ब्रिटिश हुकूमत का झंडा उतार फेंका था, बल्कि भारतीय तिरंगा फहरा दिया था।
91 वर्षीय नरेश चंद्र सेठ मूलरूप से बुलंदशहर के रहने वाले थे। 10 अक्टूबर 1923 को जन्मे नरेश चंद्र की पढ़ाई-लिखाई वहीं पूरी हुई। 19 साल की उम्र में वह नौसेना में भर्ती हो गए। ब्रिटिश शासन के खिलाफ चल रहीं गतिविधियों में उनका छात्र जीवन से जुड़ाव था। नौसेना में शामिल होने के बाद उन्होंने जहाज पर तैनात अपने दूसरे साथियों को संगठित किया। परिणामस्वरूप 1942 में नरेश चंद्र ने नौसेना के जहाज से ब्रिटिश ध्वज को उतार फेंका। इसकी जगह भारतीय तिरंगा फहराकर अंग्रेज अधिकारियों के पसीने छुड़ा दिए। तभी से इन्हें नाविक विद्रोह के नायक के रूप में पहचाना जाने लगा था। इस घटना के बाद नरेश चंद्र को नौसेना से निकाल दिया गया।
वह आगरा में टेलीग्राफ विभाग में आ गए। खत्री गली, बाग मुजफ्फर खां में ही उन्होंने घर बनवा लिया। इसके बाद पूरा जीवन उन्होंने यहीं गुजारा। वर्ष 1983 में सेवानिवृत्त होनेे के बाद से यहीं रह रहे थे। पिछले दिनों 10 नवंबर को वह कानपुर में अपने बेटे अमित सेठ के पास गए थे। 13 दिसंबर को हृदय गति रुक जाने के कारण 91 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। वह पत्नी लक्ष्मी देवी सेठ के अलावा एक पुत्र और तीन पुत्रियों के भरेपूरे परिवार को बिलखता छोड़ गए हैं। शुक्रवार को कानपुर से लौटे नरेश चंद्र के दामाद अविनाश कुमार मेहरा ने उनके निधन की जानकारी दी।
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91 वर्षीय नरेश चंद्र सेठ मूलरूप से बुलंदशहर के रहने वाले थे। 10 अक्टूबर 1923 को जन्मे नरेश चंद्र की पढ़ाई-लिखाई वहीं पूरी हुई। 19 साल की उम्र में वह नौसेना में भर्ती हो गए। ब्रिटिश शासन के खिलाफ चल रहीं गतिविधियों में उनका छात्र जीवन से जुड़ाव था। नौसेना में शामिल होने के बाद उन्होंने जहाज पर तैनात अपने दूसरे साथियों को संगठित किया। परिणामस्वरूप 1942 में नरेश चंद्र ने नौसेना के जहाज से ब्रिटिश ध्वज को उतार फेंका। इसकी जगह भारतीय तिरंगा फहराकर अंग्रेज अधिकारियों के पसीने छुड़ा दिए। तभी से इन्हें नाविक विद्रोह के नायक के रूप में पहचाना जाने लगा था। इस घटना के बाद नरेश चंद्र को नौसेना से निकाल दिया गया।
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वह आगरा में टेलीग्राफ विभाग में आ गए। खत्री गली, बाग मुजफ्फर खां में ही उन्होंने घर बनवा लिया। इसके बाद पूरा जीवन उन्होंने यहीं गुजारा। वर्ष 1983 में सेवानिवृत्त होनेे के बाद से यहीं रह रहे थे। पिछले दिनों 10 नवंबर को वह कानपुर में अपने बेटे अमित सेठ के पास गए थे। 13 दिसंबर को हृदय गति रुक जाने के कारण 91 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। वह पत्नी लक्ष्मी देवी सेठ के अलावा एक पुत्र और तीन पुत्रियों के भरेपूरे परिवार को बिलखता छोड़ गए हैं। शुक्रवार को कानपुर से लौटे नरेश चंद्र के दामाद अविनाश कुमार मेहरा ने उनके निधन की जानकारी दी।
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