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100 साल से गंगाजली बनाकर सद्भाव का पैगाम दे रहे मुस्लिम कारीगर

Tue, 22 Feb 2022 10:44 PM IST
Agra Bureau आगरा ब्यूरो
Updated Tue, 22 Feb 2022 10:44 PM IST
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Muslim artisans giving message of harmony by making Gangajali for 100 years
कांवड़ तैयार करते कारीगर। - फोटो : KASGANJ
सोरोंजी(कासगंज)। 100 साल से कादरवाड़ी के आठ मुस्लिम परिवारों के 25 कारीगर कांच की गंगाजली बनाकर सद्भाव का संदेश दे रहे हैं। इसी गंगाजली में गंगाजल भर कांवड़िए कांवड़ में रखकर जलाभिषेक के लिए ले जाते हैं। प्रतिवर्ष औसतन 10 लाख गंगाजली बिक जाती हैं। प्रतिदिन 800 से 1000 तक गंगाजली तैयार होती है।
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वर्तमान में कादरवाड़ी में कई भट्टियां धधक रही हैं। कारीगर दिन रात काम करके गंगाजली तैयार करने में लगे हुए हैं। कारीगरों के मुताबिक गंगाजली बनाने का काम दीपावली से शुरू होता है और महाशिवरात्रि तक चलता है। तीर्थनगरी के कासगंज गेट, चंदनचौक, हरि की पैड़ी, लहरा में कांवड़ मेला लगता है। जहां कादरवाड़ी के कारीगरों की गंगाजली की बिक्री होती है। राजस्थान, मध्यप्रदेश आदि प्रदेश के सुदूरवर्ती क्षेत्रों के कांवड़िए तीर्थनगरी के लहरा घाट से गंगाजल भरकर अपने क्षेत्रों के शिवालयों तक पैदल यात्रा कर महाशिवरात्रि पर्व पर भोले का गंगाजल से अभिषेक करते हैं। कांवड़िए लहरा घाट से जिन कांच की गंगाजली में गंगाजल भर कर ले जाते हैं। वह कांच की गंगाजली कादरवाड़ी के मुस्लिम कारीगर दिन रात तपती भट्टियों के आगे काम करने के बाद तैयार करते हैं। संवाद
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फिरोजाबाद से आता है कच्चा माल
गंगाजली बनाने में जुटे कादरवाड़ी के मुस्लिम परिवार कांच के फिरोजाबाद शहर तक अपने हुनर के लिए जाने जाते हैं। वह फिरोजाबाद से कच्चा कांच लाते हैं और फिर कादरवाड़ी में धधकती भट्टियों में कच्चे कांच को आकार देकर गंगाजली के रूप में ढालते हैं।
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चार माह ही होता है यह काम
कारीगर फारुख और असलम बोले, गंगाजली निर्माण का काम 100 साल से कर रहे हैं। यह काम सिर्फ चार महीने ही होता है। हर वर्ष आठ से 10 लाख गंगाजली की बिक्री हो जाती है। शेष आठ महीने खेतों में मेहनत मजदूरी करनी पड़ती है या शहर में जाकर काम। कोयले की तपती भट्ठियों पर प्रतिदिन 8-10 घंटे काम करना होता है। एक भट्ठी पर प्रतिदिन 800 से 1000 गंगाजली तैयार होती हैं।

दूसरे स्थानों पर भी जाती है गंगाजली
गंगाजली के थोक विक्रेता रवि पाराशर बोले, गंगाजली निर्माण के लिए कच्चा माल कारीगरों को दिया जाता है। गंगाजली सोरोंजी, लहरा, कछला के अलावा रामपुर, रामघाट आदि स्थानों के लोग भी ले जाते हैं। कारोबारी चेतन अग्रवाल बोले, कांच की गंगाजली कांवड़ियों की पहली पसंद है। हालांकि अब विकल्प के तौर पर प्लास्टिक की गंगाजली का चलन बढ़ा है।
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