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चेहरों पर भय, बोले-अब वहां भूख से लड़ाई
ब्यूरो, अमर उजाला
Updated Thu, 30 Apr 2015 02:07 AM IST
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नेपाल के हालात बहुत खराब हैं। काठमांडू तबाह हो चुका है। लोग भूख-प्यास से बिलख रहे हैं। पानी की बोतल तक 100 से तीन सौ रुपये तक में मिल रही है। लेकिन लोगों के पास पैसा नहीं है। काठमांडू एयरपोर्ट पर भी जबरदस्त भीड़ है तो सड़क मार्ग से भी नेपाल छोड़ने वालों की संख्या कम नहीं है। वहां के लोगों को बचाने के लिए हरेक भारतवासी को मदद करनी चाहिए। देश के हजारों लोग अब भी फंसे हैं। त्रासदी का दर्द लेकर नेपाल से आगरा पहुंचे लोगों ने तबाही की कभी न भूला देने वाली दास्तां सुनाई तो सभी की रूह कांप उठी।
नेपाल में आए विनाशकारी भूकंप के बाद से शहर की भी नींदें उड़ी हुई हैं। रिश्तेदारों के वहां फंसे होने से सैकड़ों परिवारों में कोहराम मचा है। वहीं, जो लोग रोजी रोटी की तलाश में नेपाल गए थे वह अपने साथ दर्द का दरिया लेकर लौट रहे हैं। त्रासदी का खौफ उनके चेहरे पर साफ है। कई दिन जिंदगी की जद्दोजहद के बाद अपनों के बीच पहुंचे तो आंखों में आंसू नहीं रुके। बुधवार को 88 लोग नेपाल बार्डर से गोरखपुर डिपो की बस से आगरा पहुंचे हैं। इनमें 11 राजस्थान के, चार दिल्ली के और एक गुजरात का व्यक्ति है।
बुधवार दोपहर को गोरखपुर डिपो की बस 88 लोगों को लेकर आगरा पहुंची। इसमें धनौली, अजीज, टपरा और शहर के अन्य इलाकों के करीब 70 लोग थे। वहीं 11 लोग धौलपुर, चार दिल्ली और एक गुजरात के थे। सभी को यमुनापार में मंडी समिति परिसर में ठहराया गया। एडीएम वित्त एवं राजस्व राजकुमार और एसडीएम एत्मादपुर के नेतृत्व में पहुंची टीम ने राजस्थान, दिल्ली और गुजरात के लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था की। सभी को किराया देकर ट्रेन और बसों में बैठाया। मंगलवार रात को फतेहपुर सीकरी के तीन परिवार भी अपना सब कुछ गंवाकर अपनों के बीच पहुंच गए हैं। नेपाल बार्डर क्षेत्र के युवकों लेने पहुंचे हाकिम सिंह ने फोन पर बताया कि गुरुवार को 43 और लोग आगरा पहुंच जाएंगे।
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- 32 वर्ष से काठमांडू के बसंतपुर इलाके में हसनी ज्वेल्स व साहिबा ज्वेल्स के नाम से हैंडीक्राफ्ट और नगीनों का कारोबार कर रहे सीकरी के रहीस व भूरा ने बताया कि भूकंप में नौ महल स्थित दुकान के साथ सब कुछ तबाह हो गया। परिवार के साथ बसंत चौक में तीन दिन गुजारे। एयरपोर्ट पर पानी की बोतलें तीन सौ रुपये की मिल रही थीं। छोटी-छोटी चीजों पर हजारों रुपये खर्च करने के बाद काठमांडू से सौनोली बार्डर, फिर गौरखपुर से लखनऊ आगरा होते हुए मंगलवार रात को फतेहपुर सीकरी पहुंचे हैं।
- आगरा वजीरपुरा के अफसर पिछले 18 सालों से काठमांडू में ज्वेलरी का शोरूम संचालित कर रहे थे। उन्होंने बताया कि जब भूकंप आया उस समय ग्राहक दुकान में थे। शोरूम में लगे कांच जोर-जोर से हिलने लगे। सामान गिरने लगा। बाहर भगदड़ मची हुई थी। कई दिनों तक तो हम अपने घर नहीं गए। बड़ी मुश्किल से जान बचाकर आगरा आए हैं।
- बनी इस्राइल निवासी हाजी सईद ने बताया कि वे 32 वर्ष से बसंत पुर इलाके में कादरी जैम्स नाम से कारोबार कर रहे हैं। शनिवार को जलजला आया तो मानों सामने कयामत का नजारा था। अपनी दुकान के साथ आसपास की बड़ी-बड़ी इमारतों को जमींदोज होते देखा है। राजमहल तक दरक गया।
- सईद का कहना है कि सब तबाह हो गया, हर भारतवासी को नेपाल की मदद में आगे आना चाहिए, वहां की सांस्कृतिक विरासत मिट्टी में मिल गई है। हमारा तो परिवार ही वहीं से चलता है। अब क्या होगा।
- शानू व्यापार के सिलसिले में आठ अप्रैल को नेपाल गए थे। उन्होंने बताया, काठमांडू में कई लोगों को मलबे से बाहर निकाला था। तीन दिन तक बसंतपुर चौक में ही रात गुजारी, खाने के लिये मंहगा सामान मिल रहा था।
- जूता कारीगर धनौली निवासी बबलू ने बताया कि नेपाल में 50-100 रुपये प्रति जोड़ी के हिसाब मेहनताना मिल जाता था। भाई केशव के साथ डेढ़ माह पहले नेपाल गए थे। तबाही में फैक्ट्री तहसनहस हो गई।
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नेपाल में आए विनाशकारी भूकंप के बाद से शहर की भी नींदें उड़ी हुई हैं। रिश्तेदारों के वहां फंसे होने से सैकड़ों परिवारों में कोहराम मचा है। वहीं, जो लोग रोजी रोटी की तलाश में नेपाल गए थे वह अपने साथ दर्द का दरिया लेकर लौट रहे हैं। त्रासदी का खौफ उनके चेहरे पर साफ है। कई दिन जिंदगी की जद्दोजहद के बाद अपनों के बीच पहुंचे तो आंखों में आंसू नहीं रुके। बुधवार को 88 लोग नेपाल बार्डर से गोरखपुर डिपो की बस से आगरा पहुंचे हैं। इनमें 11 राजस्थान के, चार दिल्ली के और एक गुजरात का व्यक्ति है।
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बुधवार दोपहर को गोरखपुर डिपो की बस 88 लोगों को लेकर आगरा पहुंची। इसमें धनौली, अजीज, टपरा और शहर के अन्य इलाकों के करीब 70 लोग थे। वहीं 11 लोग धौलपुर, चार दिल्ली और एक गुजरात के थे। सभी को यमुनापार में मंडी समिति परिसर में ठहराया गया। एडीएम वित्त एवं राजस्व राजकुमार और एसडीएम एत्मादपुर के नेतृत्व में पहुंची टीम ने राजस्थान, दिल्ली और गुजरात के लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था की। सभी को किराया देकर ट्रेन और बसों में बैठाया। मंगलवार रात को फतेहपुर सीकरी के तीन परिवार भी अपना सब कुछ गंवाकर अपनों के बीच पहुंच गए हैं। नेपाल बार्डर क्षेत्र के युवकों लेने पहुंचे हाकिम सिंह ने फोन पर बताया कि गुरुवार को 43 और लोग आगरा पहुंच जाएंगे।
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- 32 वर्ष से काठमांडू के बसंतपुर इलाके में हसनी ज्वेल्स व साहिबा ज्वेल्स के नाम से हैंडीक्राफ्ट और नगीनों का कारोबार कर रहे सीकरी के रहीस व भूरा ने बताया कि भूकंप में नौ महल स्थित दुकान के साथ सब कुछ तबाह हो गया। परिवार के साथ बसंत चौक में तीन दिन गुजारे। एयरपोर्ट पर पानी की बोतलें तीन सौ रुपये की मिल रही थीं। छोटी-छोटी चीजों पर हजारों रुपये खर्च करने के बाद काठमांडू से सौनोली बार्डर, फिर गौरखपुर से लखनऊ आगरा होते हुए मंगलवार रात को फतेहपुर सीकरी पहुंचे हैं।
- आगरा वजीरपुरा के अफसर पिछले 18 सालों से काठमांडू में ज्वेलरी का शोरूम संचालित कर रहे थे। उन्होंने बताया कि जब भूकंप आया उस समय ग्राहक दुकान में थे। शोरूम में लगे कांच जोर-जोर से हिलने लगे। सामान गिरने लगा। बाहर भगदड़ मची हुई थी। कई दिनों तक तो हम अपने घर नहीं गए। बड़ी मुश्किल से जान बचाकर आगरा आए हैं।
- बनी इस्राइल निवासी हाजी सईद ने बताया कि वे 32 वर्ष से बसंत पुर इलाके में कादरी जैम्स नाम से कारोबार कर रहे हैं। शनिवार को जलजला आया तो मानों सामने कयामत का नजारा था। अपनी दुकान के साथ आसपास की बड़ी-बड़ी इमारतों को जमींदोज होते देखा है। राजमहल तक दरक गया।
- सईद का कहना है कि सब तबाह हो गया, हर भारतवासी को नेपाल की मदद में आगे आना चाहिए, वहां की सांस्कृतिक विरासत मिट्टी में मिल गई है। हमारा तो परिवार ही वहीं से चलता है। अब क्या होगा।
- शानू व्यापार के सिलसिले में आठ अप्रैल को नेपाल गए थे। उन्होंने बताया, काठमांडू में कई लोगों को मलबे से बाहर निकाला था। तीन दिन तक बसंतपुर चौक में ही रात गुजारी, खाने के लिये मंहगा सामान मिल रहा था।
- जूता कारीगर धनौली निवासी बबलू ने बताया कि नेपाल में 50-100 रुपये प्रति जोड़ी के हिसाब मेहनताना मिल जाता था। भाई केशव के साथ डेढ़ माह पहले नेपाल गए थे। तबाही में फैक्ट्री तहसनहस हो गई।