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मथुरा: 29 मार्च से शुरू होगा रंगजी मंदिर का ब्रह्मोत्सव
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वृंदावन श्री रंगजी मंदिर के 10 दिवसीय ब्रह्मोत्सव के बारे में जानकारी देते प्रबंध समिति के पदाधि?
- फोटो : VRINDAVAN
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वृंदावन (मथुरा)। उत्तर भारत में दक्षिणात्य शैली के सबसे विशाल देवालय श्री रंगनाथ मंदिर दिव्यदेश का दस दिवसीय ब्रह्मोत्सव 29 मार्च से विविध धार्मिक व सांस्कृतिक अनुष्ठानों के साथ प्रारंभ होने जा रहा है। इस दस दिवसीय आयोजन का मुख्य आकर्षण 4 अप्रैल को रथ का मेला रहेगा। इसकी तैयारियां मंदिर प्रशासन ने शुरू कर दी हैं।
मंदिर की मुख्य अधिशासी अधिकारी अनघा श्रीनिवासन ने बताया कि यह उत्सव ब्रह्मा का बनाया उत्सव है। इसीलिए इसे ब्रह्मोत्सव कहते हैं। इस उत्सव में भगवान भक्तों के बीच जा कर दर्शन देते हैं। इस बार ब्रह्मोत्सव (रथ का मेला) 29 मार्च से शुरू हो रहा है। इसमें प्रात: और शाम को भगवान रंगनाथ विभिन्न वाहनों पर विराजमान हो कर मंदिर से बैंडबाजा के साथ निकलेंगे। इस उत्सव में 3 अप्रैल को होली, 4 अप्रैल को रथयात्रा और 5 अप्रैल को बड़ी आतिशबाजी प्रमुख रूप से रहेगी। इसके साथ ही कोविड-19 के सभी नियमों का पालन किया जाएगा।
रघुनाथ आचार्य ने बताया कि ब्रह्मोत्सव का शुभारंभ वैदिक परंपरानुसार ध्वजारोहण से होगा। इसके अंतर्गत अखिल ब्रह्मांड नायक को आमंत्रित करने के लिए गरुड़ जी का आह्वान कर उन्हें स्वर्ण स्तंभ पर आरूढ़ किया जाता है। इसी क्रम में देव आह्वान व आचार्य परंपरा को स्थापित किया जाता है। राकेश दुबे, तिरुपति, आनंद राव, हरस्वरूप, श्रीनिवास आदि उपस्थित रहे।
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मंदिर की मुख्य अधिशासी अधिकारी अनघा श्रीनिवासन ने बताया कि यह उत्सव ब्रह्मा का बनाया उत्सव है। इसीलिए इसे ब्रह्मोत्सव कहते हैं। इस उत्सव में भगवान भक्तों के बीच जा कर दर्शन देते हैं। इस बार ब्रह्मोत्सव (रथ का मेला) 29 मार्च से शुरू हो रहा है। इसमें प्रात: और शाम को भगवान रंगनाथ विभिन्न वाहनों पर विराजमान हो कर मंदिर से बैंडबाजा के साथ निकलेंगे। इस उत्सव में 3 अप्रैल को होली, 4 अप्रैल को रथयात्रा और 5 अप्रैल को बड़ी आतिशबाजी प्रमुख रूप से रहेगी। इसके साथ ही कोविड-19 के सभी नियमों का पालन किया जाएगा।
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रघुनाथ आचार्य ने बताया कि ब्रह्मोत्सव का शुभारंभ वैदिक परंपरानुसार ध्वजारोहण से होगा। इसके अंतर्गत अखिल ब्रह्मांड नायक को आमंत्रित करने के लिए गरुड़ जी का आह्वान कर उन्हें स्वर्ण स्तंभ पर आरूढ़ किया जाता है। इसी क्रम में देव आह्वान व आचार्य परंपरा को स्थापित किया जाता है। राकेश दुबे, तिरुपति, आनंद राव, हरस्वरूप, श्रीनिवास आदि उपस्थित रहे।
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