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पुराने पन्नों से: पहला आम चुनाव... जाति के नाम पर खुलेआम मांगे गए थे वोट; कुछ ऐसे हो गए थे हालात
Tue, 12 Mar 2024 11:37 AM IST
शाहरुख खान
अशोक सिंह, अमर उजाला, आगरा
अशोक सिंह, अमर उजाला, आगरा
Published by: शाहरुख खान
Updated Tue, 12 Mar 2024 11:37 AM IST
सार
पहले आम चुनाव में जाति के नाम पर खुलेआम वोट मांगे गए थे। हालात कुछ ऐसे हो गए थे कि राजनीतिक हत्याओं की आशंका पैदा हो गई थी। आम चुनाव में उत्तर प्रदेश में खासतौर से ग्रामीण इलाकों में दलितों के खिलाफ जहरीला प्रचार किया गया था।
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सांकेतिक तस्वीर।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
देश का विभाजन 1947 में भले ही धर्म के आधार पर हुआ था लेकिन स्वतंत्र भारत में पहला चुनाव जाति के आधार पर लड़ा गया। 1951-52 में हुए आजाद भारत के पहले चुनाव में जातिवाद का खूब इस्तेमाल हुआ। चुनाव में प्रत्याशियों ने जाति के नाम पर खुलेआम वोट मांगे।
उस समय लोग जाति के नाम पर विभाजित भी थे। यही कारण था कि उस वक्त चुनाव में जाति के नाम पर खुलेआम वोट मांगने में नेताओं को दिक्कत नहीं थी। हांलाकि 25 जनवरी, 1950 को भारत में निर्वाचन आयोग आस्तित्व में आ गया था लेकिन राजनीतिक दलों पर इसका नियंत्रण बहुत ज्यादा नहीं था।
इससे पहले हालांकि महात्मा गांधी ने हिंदू धर्म में ऊंच-नीच का भेद मिटाने की पूरी कोशिश की थी। जाति का भेदभाव मिटाने के लिए उन्होंने दलितों के साथ भोजन भी किया था। डॉ भीमराव आंबेडकर भी दलितों के उत्थान में लगे हुए थे लेकिन पहले आम चुनाव में उत्तर प्रदेश में खासतौर से ग्रामीण इलाकों में दलितों के खिलाफ जहरीला प्रचार किया गया।
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अमर उजाला में इस तरह की खबर 14 अक्तूबर, 1951 को पेज चार पर लखनऊ से छपी, आम चुनाव जीतने के लिए यूपी में गंदा प्रचार शुरू। खबर के अनुसार, उत्तर प्रदेश में जिला बोर्ड और गांव पंचायत चुनाव में भी जातिवाद का खूब इस्तेमाल हुआ था, ऐसा ही हथकंडा अब विपक्षी दल इस चुनाव में भी अपनाना चाहते हैं। चुनाव को जातिवाद ने इतना जहरीला बना दिया था कि राजनीतिक हत्याओं की आशंका पैदा हो गई थी। इसका उल्लेख भी खबर में किया गया है।
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उस समय लोग जाति के नाम पर विभाजित भी थे। यही कारण था कि उस वक्त चुनाव में जाति के नाम पर खुलेआम वोट मांगने में नेताओं को दिक्कत नहीं थी। हांलाकि 25 जनवरी, 1950 को भारत में निर्वाचन आयोग आस्तित्व में आ गया था लेकिन राजनीतिक दलों पर इसका नियंत्रण बहुत ज्यादा नहीं था।
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इससे पहले हालांकि महात्मा गांधी ने हिंदू धर्म में ऊंच-नीच का भेद मिटाने की पूरी कोशिश की थी। जाति का भेदभाव मिटाने के लिए उन्होंने दलितों के साथ भोजन भी किया था। डॉ भीमराव आंबेडकर भी दलितों के उत्थान में लगे हुए थे लेकिन पहले आम चुनाव में उत्तर प्रदेश में खासतौर से ग्रामीण इलाकों में दलितों के खिलाफ जहरीला प्रचार किया गया।
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अमर उजाला में इस तरह की खबर 14 अक्तूबर, 1951 को पेज चार पर लखनऊ से छपी, आम चुनाव जीतने के लिए यूपी में गंदा प्रचार शुरू। खबर के अनुसार, उत्तर प्रदेश में जिला बोर्ड और गांव पंचायत चुनाव में भी जातिवाद का खूब इस्तेमाल हुआ था, ऐसा ही हथकंडा अब विपक्षी दल इस चुनाव में भी अपनाना चाहते हैं। चुनाव को जातिवाद ने इतना जहरीला बना दिया था कि राजनीतिक हत्याओं की आशंका पैदा हो गई थी। इसका उल्लेख भी खबर में किया गया है।
पूर्वांचल की उपेक्षा का मुद्दा उठा
जातिवाद के अलावा उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल और पश्चिमांचल कार्ड का भी कांग्रेस विरोधी पार्टियों ने इस्तेमाल किया। राजनीतिक दलों ने चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस पर आरोप लगाया कि पश्चिमी जिलों में विकास हो रहा है जबकि पूर्वी जिलों की उपेक्षा हो रही है। राजनीतिक दलों ने पूर्वांचल में यह कह कर प्रचार किया कि अगर उनकी सरकार बनी तो उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिलों का विकास किया जाएगा।
पूर्वी जिलों में सड़कों की खराब हालत का मसला भी उठाया गया। राजनीतिक दलों ने किसानों के बीच जाकर हर साल आने वाली बाढ़ को भी मुद्दा बनाया। कहा गया कि बाढ़ से फसलें नष्ट हो जाती है। बाढ़ के कारण बीमारियां भी फैलती हैं। कांग्रेस के विपक्षी दलों का कहना है हम अगर जीते तो 13 पूर्वी जिलों को खुशहाल बना देंगे। अभी की सरकार का ध्यान केवल पश्चिमी जिलों पर है।