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महाशिवरात्रि के दूसरे दिन होती है खप्पर पूजा, बिना इसके अधूरी है भगवान भोलेनाथ की आराधना
Tue, 05 Mar 2019 03:25 PM IST
मुकेश कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
Published by: मुकेश कुमार
Updated Tue, 05 Mar 2019 03:25 PM IST
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भूतेश्वर महादेव
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महाशिवरात्रि पर भगवान भोलेनाथ की पूजा के बाद मथुरा के शिव मंदिरों में मंगलवार को खप्पर पूजन का आयोजन किया गया है। खप्पर पूजा में साधु-संतों को महादेव का दूत मान दान किया जाता है। कहा जाता है कि द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण भी खप्पर पूजा विधिपूर्वक किया करते थे। यह विशेष पूजा आज भी ब्रज में प्रचलित है।
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खप्पर पूजा महाशिवरात्रि के बाद अमावस्या को होती है। माना जाता है कि महाशिवरात्रि पर भगवान भोले की आराधना खप्पर पूजा के बगैर अधूरी है। पौराणिक कथा के अनुसार महादेव का परिवार बहुत बड़ा है। उनके पास भांग के अलावा कुछ भी नहीं था। वे भस्म लगाकर श्मशान में रहते थे, लेकिन उनके परिवार में भूत-प्रेत, नंदी, सिंह, सर्प, मयूर व मूषक सभी भूख रहते थे।
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एक दिन इन सभी को भूखा देख भगवान शंकर मां अन्नपूर्णा के पास गए। भगवान शिव ने उसने भिक्षा मांगी। इस पर मां अन्नपूर्णा ने भगवान शंकर के पास जो खप्पर था, उसको अन्न से भर दिया। वो खप्पर आज तक खाली नहीं हुआ है। मान्यता है कि मां अन्नपूर्णां इसी खप्पर से सारी सृष्टि का पालन कर रही हैं।
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मथुरा की चारों दिशाओं में है शिव का वास
कान्हा की नगरी में मथुरा के चारों तरफ चार शिव मंदिर हैं। पूर्व में पिपलेश्वर, पश्चिम में भूतेश्वर, दक्षिण में रंगेश्वर महादेव और उत्तर में गोकर्णेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर स्थापित हैं। इनमें रंगेश्वर महादेव मंदिर में खप्पर एवं जेहर पूजा का विशेष महत्व है। जेहर पूजा महाशिवरात्रि के दिन नवविवाहिताएं पुत्र की प्राप्ति के लिए करती हैं।
कहा जाता है कि द्वापर युग में भगवान शिव कई बार ब्रज आए थे। गोकर्णेश्वर महादेव मंदिर को कृष्णकालीन बताया जाता है। इस मंदिर में विराजमान भगवान शिव की मूर्ति साक्षात महाकाल का रूप बताई जाती है। ये मंदिर एक टीले पर बना है। जिसे गोकर्णेश्वर अथवा कैलाश कहते हैं।
गोकर्ण महादेव का जिक्र भगवतगीता में भी मिलता है। चारों दिशाओं में स्थित होने के कारण भगवान शिव को मथुरा का कोतवाल कहते हैं। कहा जाता है कि गोकर्णेश्वर महादेव मंदिर में जो व्यक्ति लगातार 40 दिन तक भगवान को शिव स्त्रोत का पाठ और गन्ने के रस से अभिषेक करता है, उसके बीमारियां पास नहीं आतीं। धनलक्ष्मी हमेशा उसके यहां वास करती हैं।
कहा जाता है कि द्वापर युग में भगवान शिव कई बार ब्रज आए थे। गोकर्णेश्वर महादेव मंदिर को कृष्णकालीन बताया जाता है। इस मंदिर में विराजमान भगवान शिव की मूर्ति साक्षात महाकाल का रूप बताई जाती है। ये मंदिर एक टीले पर बना है। जिसे गोकर्णेश्वर अथवा कैलाश कहते हैं।
गोकर्ण महादेव का जिक्र भगवतगीता में भी मिलता है। चारों दिशाओं में स्थित होने के कारण भगवान शिव को मथुरा का कोतवाल कहते हैं। कहा जाता है कि गोकर्णेश्वर महादेव मंदिर में जो व्यक्ति लगातार 40 दिन तक भगवान को शिव स्त्रोत का पाठ और गन्ने के रस से अभिषेक करता है, उसके बीमारियां पास नहीं आतीं। धनलक्ष्मी हमेशा उसके यहां वास करती हैं।
मथुरा के दक्षिण में भूतेश्वर महादेव का मंदिर
भूतेश्वर महादेव का मंदिर कृष्ण जन्मभूमि के दक्षिण में है। इसमें ऐतिहासिक शिवलिंग एवं पाताल देवी के विग्रह हैं। भूतेश्वर महादेव का शिवलिंग नाग शासकों द्वारा स्थापित किया गया। श्री भूतेश्वर जी मथुरा के रक्षक सुप्रसिद्ध चार महादेवों में पश्चिम दिशा के क्षेत्रपाल माने जाते हैं। पिपलेश्वर महादेव बंगाली घाट के निकट स्थित हैं। इस प्राचीन मंदिर के बारे में मान्यता है कि यहां के महादेव प्रेतों पर नियंत्रण रखते हैं। इस मंदिर के निकट ही यमुना जी कलकल बहती हैं।
टीले पर बने गोकर्णेश्वर महादेव का मंदिर मसानी क्षेत्र में आकाशवाणी के पीछे स्थित है। शहर के उत्तर में यह मंदिर भगवान गोकर्णेश्वर को समर्पित किया गया था। शहर के उत्तर क्षेत्र में बसे लोगों के साथ ही सावन में यहां ग्रामीण अंचलों से भी श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं। मान्यता है कि भगवान का गाय के कर्ण से प्राकट्य हुआ था। इसीलिए गोकर्णेश्वर महादेव कहा जाता है।
टीले पर बने गोकर्णेश्वर महादेव का मंदिर मसानी क्षेत्र में आकाशवाणी के पीछे स्थित है। शहर के उत्तर में यह मंदिर भगवान गोकर्णेश्वर को समर्पित किया गया था। शहर के उत्तर क्षेत्र में बसे लोगों के साथ ही सावन में यहां ग्रामीण अंचलों से भी श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं। मान्यता है कि भगवान का गाय के कर्ण से प्राकट्य हुआ था। इसीलिए गोकर्णेश्वर महादेव कहा जाता है।