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अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस: मुसीबतों में भी न टूटा हाैसला, खुशी ने विज्ञान और दीक्षा ने खेल में पाया मुकाम

Sun, 11 Oct 2026 01:58 PM IST
Arun Parashar सलोनी पांडे, संवाद न्यूज एजेंसी, आगरा
सलोनी पांडे, संवाद न्यूज एजेंसी, आगरा Published by: Arun Parashar Updated Sun, 11 Oct 2026 01:58 PM IST
सार

खुशी ने राष्ट्रीय आविष्कार अभियान के तहत जिला स्तरीय विज्ञान मॉडल प्रतियोगिता में पहला स्थान हासिल किया। खुशी ने पंचर डिटेक्टर सिस्टम पर आधारित मॉडल तैयार किया था। इस उपलब्धि के बाद उसे इसरो की चार दिवसीय यात्रा पर जाने का अवसर मिला।

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International Day of Girl Child Special Khushi achieves success in science and Diksha in sports
खुशी और दीक्षा। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

जब हौसले बुलंद हों तो अभाव और मुसीबतें भी मंजिल का रास्ता नहीं रोक पातीं। आगरा की दो बेटियों- खुशी अली और दीक्षा शर्मा की कहानियां इस बात की जीवंत मिसाल हैं। पिता का साया उठने के बाद खेतों में मजदूरी कर परिवार का पेट पालने वाली 15 वर्षीय खुशी ने अपने वैज्ञानिक कौशल से इसरो तक का सफर तय किया, वहीं दूसरी ओर परिवार पर आए आर्थिक संकट के बीच कपड़े की दुकान पर काम करते हुए दीक्षा ने खेल के मैदान में राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक जीतकर शहर और प्रदेश का नाम रोशन किया। इन दोनों बेटियों ने अपनी मेहनत और दृढ़ संकल्प से संघर्ष को ही अपनी ताकत बना लिया है।
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डॉक्टर बनने का सपना
रैपुरा अहीर की रहने वाली 15 वर्षीय खुशी अली वर्तमान में सूर स्मारक इंटर कॉलेज में कक्षा नौ की छात्रा हैं। वर्ष 2016 में पिता बहादुर अली की मृत्यु के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर हो गई कि खुशी को निजी स्कूल की पढ़ाई छोड़नी पड़ी। घर चलाने के लिए मां और बच्चे दूसरों के खेतों में मजदूरी करने लगे। इसी दौरान उच्च प्राथमिक विद्यालय रैपुरा अहीर की शिक्षिका सीमा ने परिवार को खुशी का दाखिला सरकारी स्कूल में कराने के लिए प्रेरित किया। कक्षा छह में दाखिले के बाद खुशी की पढ़ाई फिर शुरू हुई। शिक्षिका ने उसकी प्रतिभा को पहचाना और आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। कक्षा आठ में पढ़ते हुए इसी साल मार्च में उसने राष्ट्रीय आविष्कार अभियान के तहत जिला स्तरीय विज्ञान मॉडल प्रतियोगिता में पहला स्थान हासिल किया। खुशी ने पंचर डिटेक्टर सिस्टम पर आधारित मॉडल तैयार किया था। इस उपलब्धि के बाद उसे इसरो की 4 दिवसीय यात्रा पर जाने का अवसर मिला। खुशी ने मुख्यमंत्री के समक्ष भी अपना विज्ञान मॉडल प्रस्तुत किया। खुशी का सपना बड़ा होकर डॉक्टर बनने का है।
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खेल के मैदान में किए दो-दो हाथ
बल्केश्वर निवासी 21 वर्षीय दीक्षा शर्मा की कहानी भी संघर्ष की मिसाल है। विश्वविद्यालय में बीपीएड की पढ़ाई कर रहीं दीक्षा को बचपन से ही खेलों में रुचि थी। दसवीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान पिता को दिल का दौरा पड़ा। परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ने और जिम्मेदारियां बढ़ने के कारण दीक्षा को खेल छोड़ना पड़ा। दसवीं से बारहवीं तक उन्होंने किसी प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं लिया। वर्ष 2025 में पिता की मृत्यु के बाद परिवार पर संकट और गहरा गया। चार भाई-बहनों में तीसरे नंबर की दीक्षा ने परिवार की मदद के लिए कपड़े की दुकान पर काम करना शुरू किया। वहां से मिलने वाले तीन हजार रुपये महीने वह घर के खर्च के लिए देती थीं। इन परिस्थितियों में भी उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और दोबारा खेलों में वापसी की। मार्शल आर्ट में दो बार राष्ट्रीय प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं। विश्वविद्यालय खेल प्रतियोगिताओं में दो बार कांस्य पदक हासिल कर चुकी हैं और खेलो इंडिया में भी प्रतिभाग कर चुकी हैं। दीक्षा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करना चाहती हैं।
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