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सिस्टम से मिले दर्द को बढ़ा रही पार्किंग
अमर उजाला आगरा
Updated Fri, 03 Jun 2016 01:39 AM IST
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सिस्टम से मिले दर्द को बढ़ा रही पार्किंग
- फोटो : Amar Ujala
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फरियाद बाद में सुनाना पहले 20 रुपए निकालो
कलेक्ट्रेट में पार्किंग शुल्क के नाम फरियादियों की काटी जा रही जेब
साइकिल सवार गरीबों, वृद्ध पीड़ितों की भी नहीं सुनता पार्किंग ठेकेदार
सरकारी कार्यालयों में वाहनों को व्यवस्थित तरीके से पार्क कराना व्यवस्था का पार्ट हो सकता है लेकिन इसके नाम पर गरीब, पीड़ित फरियादियों से पार्किंग शुल्क लेना कहां तक तार्किक है। हैरत की बात यह है वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और जिलाधिकारी के कार्यालय में वाहनों की सुरक्षा के नाम पर पैसे लिए जा रहे हैं। सिस्टम से शिकायत वाले लोगों के लिए पार्किंग पीर बन गई है।
प्रशासन ने कलेक्ट्रेट की पार्किंग का ठेका पिछले कुछ वर्षों से ही उठाना शुरू किया है। करीब दो लाख रुपये से शुरू हुआ यह ठेका अब लगभग 12.40 लाख रुपए तक पहुंच गया है। जाहिर कि ठेकेदार को बड़ा मुनाफा होता है और ठेका पाने के लिए बोली लगती है। प्रशासन को ठेका राशि अदा करने और अपना मुनाफा कमाने के लिए साइकिल के 10 रुपये, स्कूटर, बाइक के 20 और कार के 30 रुपए लिए जाते हैं। ठेकेदार और उसके कारिंदे कलेक्ट्रेट में आने वालों से पार्किंग का पैसा लेने के लिए मर्यादा की हर सीमा लांघ जाते हैं। किसी काम के लिए अगर आपको एक बार कलेक्ट्रेट से बाहर जाना पड़ा और दोबारा आना पड़ा तो फिर से पार्किंग शुल्क देना होगा। यह कहां का न्याय कि सिस्टम से पीड़ित व्यक्ति अपनी फरियाद लेकर वरिष्ठ अधिकारियों के पास आता है और उसे वहां फरियाद सुनाने से पहले साइकिल या मोटरसाइकिल की सुरक्षा के लिए पैसा खर्च करना पड़ता है।
विकास भवन और कमिश्नरी में नहीं है पार्किंग
अधिकारी कहते हैं कि वाहनों को व्यवस्थित तरीके पार्क करने और सुरक्षा के लिए यह शुल्क लिया जाता है तो विकास भवन में और कमिश्नरी में पार्किंग शुल्क क्यों नहीं है। वहां भी तो वाहन व्यवस्थित तरीके से ही लगते हैं। विकास भवन और मंडलायुक्त कार्यालय में तैनात गार्ड वाहन चालकों को इशारा करते हैं और चालक खुद वाहन को पार्किंग में व्यवस्थित तरीके से खड़ा कर देता है। कलेक्ट्रेट आने वाले लोगों का कहना है कि यहां भी ऐसी ही व्यवस्था होनी चाहिए।
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‘कलेक्ट्रेट में वाहन बेतरतीब खड़े होते थे, उन्हें व्यवस्थित और सुरक्षित करने को पार्किंग की व्यवस्था की गई है। इस सुविधा के नाम पर नाममात्र का शुल्क लिया जा रहा है। सरकारी कार्यालयों में कैंटीन और पार्किंग जैसी सुविधा के नाम शुल्क लेने का गजट तो अंग्रेजों के समय से चल रहा है।’
राजेश कुमार श्रीवास्तव, एडीएम सिटी
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कलेक्ट्रेट में पार्किंग शुल्क के नाम फरियादियों की काटी जा रही जेब
साइकिल सवार गरीबों, वृद्ध पीड़ितों की भी नहीं सुनता पार्किंग ठेकेदार
सरकारी कार्यालयों में वाहनों को व्यवस्थित तरीके से पार्क कराना व्यवस्था का पार्ट हो सकता है लेकिन इसके नाम पर गरीब, पीड़ित फरियादियों से पार्किंग शुल्क लेना कहां तक तार्किक है। हैरत की बात यह है वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और जिलाधिकारी के कार्यालय में वाहनों की सुरक्षा के नाम पर पैसे लिए जा रहे हैं। सिस्टम से शिकायत वाले लोगों के लिए पार्किंग पीर बन गई है।
प्रशासन ने कलेक्ट्रेट की पार्किंग का ठेका पिछले कुछ वर्षों से ही उठाना शुरू किया है। करीब दो लाख रुपये से शुरू हुआ यह ठेका अब लगभग 12.40 लाख रुपए तक पहुंच गया है। जाहिर कि ठेकेदार को बड़ा मुनाफा होता है और ठेका पाने के लिए बोली लगती है। प्रशासन को ठेका राशि अदा करने और अपना मुनाफा कमाने के लिए साइकिल के 10 रुपये, स्कूटर, बाइक के 20 और कार के 30 रुपए लिए जाते हैं। ठेकेदार और उसके कारिंदे कलेक्ट्रेट में आने वालों से पार्किंग का पैसा लेने के लिए मर्यादा की हर सीमा लांघ जाते हैं। किसी काम के लिए अगर आपको एक बार कलेक्ट्रेट से बाहर जाना पड़ा और दोबारा आना पड़ा तो फिर से पार्किंग शुल्क देना होगा। यह कहां का न्याय कि सिस्टम से पीड़ित व्यक्ति अपनी फरियाद लेकर वरिष्ठ अधिकारियों के पास आता है और उसे वहां फरियाद सुनाने से पहले साइकिल या मोटरसाइकिल की सुरक्षा के लिए पैसा खर्च करना पड़ता है।
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विकास भवन और कमिश्नरी में नहीं है पार्किंग
अधिकारी कहते हैं कि वाहनों को व्यवस्थित तरीके पार्क करने और सुरक्षा के लिए यह शुल्क लिया जाता है तो विकास भवन में और कमिश्नरी में पार्किंग शुल्क क्यों नहीं है। वहां भी तो वाहन व्यवस्थित तरीके से ही लगते हैं। विकास भवन और मंडलायुक्त कार्यालय में तैनात गार्ड वाहन चालकों को इशारा करते हैं और चालक खुद वाहन को पार्किंग में व्यवस्थित तरीके से खड़ा कर देता है। कलेक्ट्रेट आने वाले लोगों का कहना है कि यहां भी ऐसी ही व्यवस्था होनी चाहिए।
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‘कलेक्ट्रेट में वाहन बेतरतीब खड़े होते थे, उन्हें व्यवस्थित और सुरक्षित करने को पार्किंग की व्यवस्था की गई है। इस सुविधा के नाम पर नाममात्र का शुल्क लिया जा रहा है। सरकारी कार्यालयों में कैंटीन और पार्किंग जैसी सुविधा के नाम शुल्क लेने का गजट तो अंग्रेजों के समय से चल रहा है।’
राजेश कुमार श्रीवास्तव, एडीएम सिटी