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होली: बस्ती का नाम ही पड़ गया 'बड़ी होली', दिलचस्प है कासगंज के इस मोहल्ले का किस्सा

Thu, 18 Mar 2021 12:02 AM IST
Abhishek Saxena न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कासगंज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कासगंज Published by: Abhishek Saxena Updated Thu, 18 Mar 2021 12:02 AM IST
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Holi 2021: Kasganj Badi Holi Mohalla Name History
कासगंज का बड़ी होली मोहल्ला - फोटो : अमर उजाला
मोहल्ला जय जयराम की एक बस्ती का नाम बड़ी होली है। नाम का किस्सा दिलचस्प है। यहां पिछले सौ साल से होली रखी जा रही है। परंपरा है कि यहां पर होलिका दहन होने के बाद ही अन्य स्थलों पर होली जलाई जाती है। यहां की होली सबसे ऊंची भी होती है।
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समय के साथ कासगंज में होली का रंग हल्का पड़ा है। न आलू के ठप्पे बनाकर लोगों के लगाते बच्चों की टोली नजर आती है न चंदा एकत्रित करने के लिए युवाओं की टोली। बड़ी होली के नाम से मशहूर बस्ती का स्वरूप भी काफी बदल चुका है। ऊंचे-ऊंचे भवन बन चुके हैं। लेकिन होली की परंपरा आज भी वही है।
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शहर बढ़ने के साथ ही अब कई स्थानों पर होली रखी जाने लगी है, लेकिन आग सबसे पहले बड़ी होली में जलाई जाती है। इसके बाद ही शहर के अन्य हिस्सों में होली जलती है। बड़ी होली से आग ले जाकर ही अधिकांश घरों में होली जलाई जाती है।
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बड़ी होली का रसिया दंगल
बड़ी होली में रसिया दंगल को सुनने के लिए शहर के अलावा आसपास के क्षेत्रों से भी लोग आते हैं। पार्टियों के बीच जोरदार मुकाबला होता है। दंगल रातभर चलता है। बड़ी होली के निवासी विश्वनाथ पचौरी ने बताया कि पचास साल पहले रसिया दंगल का पहला मुकाबला हुआ था। बाद में यह परंपरा में शामिल हो गया। अब यह होली से दो दिन पहले होता है।

वसंत पंचमी पर भगवान वराह संग होली
वसंत पंचमी पर भगवान वराह के संग होली खेलने की परंपरा है। वराह मंदिर सोरों के महंत विदेहानंद गिरी ने बताया कि भक्त वसंत पंचमी पर भक्त भगवान को गुलाल लगाते हैं। आपस में गुलाल खेलते हैं। मंदिर में कीर्तन होता है। पान को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। राधा कृष्ण मंदिर, रघुनाथ मंदिर, द्वारिकाधीश मंदिर में भी इस दिन होली खेली जाती है।

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बड़ी होली में सौ साल पुरानी परंपरा
बड़ी होली में होली रखने की परंपरा सौ साल से अधिक पुरानी है। पहले यहीं होली जलाई जाती है। शहर के तमाम हिस्सों से लोग यहां आकर पूजा अर्चना करते हैं। यहां से आग ले जाकर अपने घरों में होली जलाते है। - प्रेम चंद्र मिश्रा एडवोकेट, निवासी बड़ी होली

कांटे से टोपी खींच मांगते थे चंदा
होली का हुड़दंग कम हुआ है। हम आलू के ठप्पे बनाकर होली खेलते थे। कांटे से टोपी खींचकर चंदा एकत्रित किया जाता था और इससे होली रखने के लिए लकड़ी खरीदी जाती थी। अब यह नजर नहीं आता। - शशिकांत गर्ग, निवासी सूत की मंडी

‘रंग मत डारे रे होली में, मेरे लग जाएगी’
मथुरा के रसिया गायक सीपी शर्मा का रसिया ‘रंग मत डारे रे होली में, मेरे लग जाएगी’ को होली पर लोग गुनगुनाते नजर आते हैं। एसबी स्टूडियो के संचालक श्यामवीर ने बताया कि हाथरस के रसिया कलाकार रामदेव का रसिया गीत ‘बृषभान की छोरी...’ भी सुनने की फरमाइश की जाती है। 
 
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