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होली: सर्वार्थ सिद्धि-अमृत योग में होली का त्योहार, बन रहे विशेष ज्योतिषीय संयोग, ऐसे करें दहन
Wed, 17 Mar 2021 12:10 AM IST
Abhishek Saxena
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
Published by: Abhishek Saxena
Updated Wed, 17 Mar 2021 12:10 AM IST
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होलिका दहन
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होली नवाहन्नेष्टि यज्ञ पर्व है, जो वैदिक सोमयज्ञ भी है। वैदिककाल में सोमलता का रस निचोड़कर यज्ञ संपन्न होते थे जो सोमयज्ञ के नाम से प्रसिद्ध है। सोमरस शक्तिवर्द्धक है जो अमरता की अनुभूति प्रदान करता है। वैदिक ऋषियों ने भी इसे अनुभूत किया। धीरे धीरे इसका स्वरूप होलिका दहन में परिवर्तित होता गया। जो होली के नाम से जाना जाने लगा।
भारद्वाज ज्योतिष व आध्यात्मिक संस्थान के शोध निदेशक आचार्य पंडित रामचंद्र शर्मा वैदिक ने बताया कि इस वर्ष यह पर्व सर्वार्थ सिद्धि, अमृत सिद्धि व अमृत योग में मनेगा। रविवार को पूर्णिमा तिथि रात्रि 12 बजकर 18 मिनट तक रहेगी। उत्तरा फाल्गुनी व हस्त नक्षत्र, वृद्धि योग, बुध प्रधान कन्या राशि का चन्द्रमा, गुरु प्रधान मीन राशि का सूर्य और शनि प्रधान मकर राशि के बृहस्पति में प्रदोष काल में होलिका का दहन होगा। ऐसे में होली पर विशेष ज्योतिषीय संयोग निर्मित हो रहे हैं।
होलिकादहन पर भद्रा का साया नहीं
आचार्य पंडित रामचंद्र शर्मा वैदिक ने बताया कि 28 मार्च रविवार को भद्रा दोपहर 1 बजकर 51 मिनट तक रहेगी। सामान्यतः होलिका दहन प्रदोष काल में किया जाता है। धर्मशास्त्रों की स्पष्ट मान्यता है कि फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में होलिका का दहन शुभ होता है।
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भारद्वाज ज्योतिष व आध्यात्मिक संस्थान के शोध निदेशक आचार्य पंडित रामचंद्र शर्मा वैदिक ने बताया कि इस वर्ष यह पर्व सर्वार्थ सिद्धि, अमृत सिद्धि व अमृत योग में मनेगा। रविवार को पूर्णिमा तिथि रात्रि 12 बजकर 18 मिनट तक रहेगी। उत्तरा फाल्गुनी व हस्त नक्षत्र, वृद्धि योग, बुध प्रधान कन्या राशि का चन्द्रमा, गुरु प्रधान मीन राशि का सूर्य और शनि प्रधान मकर राशि के बृहस्पति में प्रदोष काल में होलिका का दहन होगा। ऐसे में होली पर विशेष ज्योतिषीय संयोग निर्मित हो रहे हैं।
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होलिकादहन पर भद्रा का साया नहीं
आचार्य पंडित रामचंद्र शर्मा वैदिक ने बताया कि 28 मार्च रविवार को भद्रा दोपहर 1 बजकर 51 मिनट तक रहेगी। सामान्यतः होलिका दहन प्रदोष काल में किया जाता है। धर्मशास्त्रों की स्पष्ट मान्यता है कि फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में होलिका का दहन शुभ होता है।
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प्रदोष काल क्या है
सूर्यास्त के बाद कि छह घड़ी अर्थात 2 घंटा 24 मिनट का काल प्रदोषकाल कहलाता है। आचार्य पंडित शर्मा वैदिक ने बताया कि होलिका दहन विज्ञान सम्मत है। प्रज्वलित अग्नि से मानव शरीर व भूमंडल पर परमाणुओं में स्थित कफजनक कीटाणुओं का विनाश होता है। यही कफ जनक कीटाणु ही वैश्विक महामारी कोरोना को बढ़ावा देते है और उसका कारण भी है।
होलिका की पूजा का विशेष महत्व
प्रदोषकाल में दहन के पूर्व विविध पूजा उपचारों से होलिका की सविधि पूजा करना चाहिए। पूजा में साबुत नारियल, पीली सरसों व कालीमिर्च दहन के समय अवश्य डालनी चाहिए। इससे आरोग्यता बनी रहती है। संहिता ग्रंथों व शकुन शास्त्रों की मानें तो होलिका दहन समय के वायु प्रवाह से भविष्य, शुभाशुभ भी जाना जा सकता है।
दिन में नहीं करें होलिका दहन
होली दीपन के समय पूर्व दिशा का प्रभाव शुभ, आग्नेय कोण का आगजनी कारक, दक्षिण का दुर्भिक्ष व पीड़ाकारक, नैऋत्य का फसलों के लिए हानिकारक, पश्चिम का सामान्य व मिश्रित, वायव्य कोण का चक्रवार, पवनवेग व आंधी कारक, उत्तर व ईशान कोण का मेघ गर्जना सूचक होता है। यदि होलिका दहन के समय वायु प्रवाह चतुष्कोणीय हो तो राष्ट्र संकट कारक होता है। इस प्रकार होलिका दहन के दिन वायु प्रवाह से शुभाशुभ की जानकारी भी प्राप्त होती है। दिन में होलिका दहन भूल कर भी नहीं करें।
सूर्यास्त के बाद कि छह घड़ी अर्थात 2 घंटा 24 मिनट का काल प्रदोषकाल कहलाता है। आचार्य पंडित शर्मा वैदिक ने बताया कि होलिका दहन विज्ञान सम्मत है। प्रज्वलित अग्नि से मानव शरीर व भूमंडल पर परमाणुओं में स्थित कफजनक कीटाणुओं का विनाश होता है। यही कफ जनक कीटाणु ही वैश्विक महामारी कोरोना को बढ़ावा देते है और उसका कारण भी है।
होलिका की पूजा का विशेष महत्व
प्रदोषकाल में दहन के पूर्व विविध पूजा उपचारों से होलिका की सविधि पूजा करना चाहिए। पूजा में साबुत नारियल, पीली सरसों व कालीमिर्च दहन के समय अवश्य डालनी चाहिए। इससे आरोग्यता बनी रहती है। संहिता ग्रंथों व शकुन शास्त्रों की मानें तो होलिका दहन समय के वायु प्रवाह से भविष्य, शुभाशुभ भी जाना जा सकता है।
दिन में नहीं करें होलिका दहन
होली दीपन के समय पूर्व दिशा का प्रभाव शुभ, आग्नेय कोण का आगजनी कारक, दक्षिण का दुर्भिक्ष व पीड़ाकारक, नैऋत्य का फसलों के लिए हानिकारक, पश्चिम का सामान्य व मिश्रित, वायव्य कोण का चक्रवार, पवनवेग व आंधी कारक, उत्तर व ईशान कोण का मेघ गर्जना सूचक होता है। यदि होलिका दहन के समय वायु प्रवाह चतुष्कोणीय हो तो राष्ट्र संकट कारक होता है। इस प्रकार होलिका दहन के दिन वायु प्रवाह से शुभाशुभ की जानकारी भी प्राप्त होती है। दिन में होलिका दहन भूल कर भी नहीं करें।