{"_id":"5f4e62a28ebc3e53b21a1868","slug":"hindi-hain-hum-we-speak-english-and-urdu-not-hindi-said-in-samvad","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"#हिंदीहैंहमः अस्तित्व के लिए लड़ रही हिंदी, आजादी के बाद नहीं मिला गौरव, चिंतन करने की आवश्यकता","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
#हिंदीहैंहमः अस्तित्व के लिए लड़ रही हिंदी, आजादी के बाद नहीं मिला गौरव, चिंतन करने की आवश्यकता
Tue, 01 Sep 2020 08:33 PM IST
Abhishek Saxena
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा
Published by: Abhishek Saxena
Updated Tue, 01 Sep 2020 08:33 PM IST
सार
आज हिंदी के उन्नयन के लिए तमाम काव्य गोष्ठी, सम्मेलन, बैठकें आयोजित की जा रही हैं, लेकिन स्थिति जस की तस है। इसका कारण कथनी और करनी में अंतर है। आवश्यकता हैं इस पर चिंतन करने की।
विज्ञापन
हिंदी हैं हम
- फोटो : Amar Ujala
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
आज हम न केवल अपनी बोलचाल की भाषा में अपितु साहित्यिक भाषा में भी अंग्रेजी, उर्दू शब्दावली का प्रयोग करते हैं। क्या हमारी भाषा में शब्द भंडार कम हैं या स्वयं को हर भाषा का ज्ञाता सिद्ध कराना चाहते हैं। आखिर ऐसा हम क्यों करते हैं। आज हिंदी के उन्नयन के लिए तमाम काव्य गोष्ठी, सम्मेलन, बैठकें आयोजित की जा रही हैं, लेकिन स्थिति जस की तस है। इसका कारण कथनी और करनी में अंतर है। आवश्यकता हैं इस पर चिंतन करने की।
आज तक अस्तित्व के लिए लड़ रही है हिंदी
‘निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा ज्ञान के मिटै न हिए को शूल’ भाषा के निहितार्थ ये पंक्तियां पूर्णत: सटीक व सार्थक हैं। भाषा व्यक्ति की अभिव्यक्ति का एकमात्र और संपूर्ण साधन है। व्यक्ति अपनी निज भाषा में ही अपने मन की, विचारों की पूर्ण अभिव्यक्ति कर सकता है अन्य भाषा में नहीं।
हमें अपनी हिंदी भाषा पर गर्व होना चाहिए, किंतु ये हिंदी का दुर्भाग्य है कि वह आज तक अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। 14 सितंबर 1945 को दर्जा तो दिया, किंतु अंग्रेजी भाषा को भी कुछ समय तक समानांतर चलने का अवसर भी प्रदान किया, जिसका प्रतिफल ये हुआ कि अंग्रेजी आज भी हिंदी के बराबर या उससे आगे निकल जाती है। डॉ. नीतू गोस्वामी, आरसीए डिग्री कॉलेज
विज्ञापन
विज्ञापन
आज तक अस्तित्व के लिए लड़ रही है हिंदी
‘निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा ज्ञान के मिटै न हिए को शूल’ भाषा के निहितार्थ ये पंक्तियां पूर्णत: सटीक व सार्थक हैं। भाषा व्यक्ति की अभिव्यक्ति का एकमात्र और संपूर्ण साधन है। व्यक्ति अपनी निज भाषा में ही अपने मन की, विचारों की पूर्ण अभिव्यक्ति कर सकता है अन्य भाषा में नहीं।
विज्ञापन
हमें अपनी हिंदी भाषा पर गर्व होना चाहिए, किंतु ये हिंदी का दुर्भाग्य है कि वह आज तक अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। 14 सितंबर 1945 को दर्जा तो दिया, किंतु अंग्रेजी भाषा को भी कुछ समय तक समानांतर चलने का अवसर भी प्रदान किया, जिसका प्रतिफल ये हुआ कि अंग्रेजी आज भी हिंदी के बराबर या उससे आगे निकल जाती है। डॉ. नीतू गोस्वामी, आरसीए डिग्री कॉलेज
विज्ञापन
#हिंदीहैंहम: संवाद में शामिल वक्ताओं ने रखे अपने विचार
- फोटो : अमर उजाला
आजादी के बाद हिंदी को नहीं मिला गौरवपूर्ण
भाषा के द्वारा मनुष्य अपने विचारों को आदान-प्रदान करता है। जब मनुष्य इस पृथ्वी पर आकर होश संभालता है, तब उसके माता-पिता उसे अपनी भाषा में बोलना सिखाते हैं। भारत में अनेक राज्य हैं। उन राज्यों की अपनी अलग-अलग भाषाएं हैं। इस प्रकार भारत एक बहुभाषी राष्ट्र है, लेकिन उसकी अपनी एक राष्ट्रभाषा हिंदी है। संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया है।
आजादी के इतने वर्ष बाद भी हिंदी को जो गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त होना चाहिए था वह उसे नहीं मिला। हम वार्तालाप करते समय अंग्रेजी का प्रयोग करने में गौरव समझते हैं, भले ही अशुद्ध अंग्रेजी हो। हमें इस मानसिकता का परित्याग करना चाहिए। - रागिनी गांधी, अधिवक्ता, वरिष्ठ प्रदेश महामंत्री न्यायिक मानवाधिकार परिषद
बोलने वालों के लिए स्वाभिमान की भाषा है हिंदी
निरंतर प्रगति पथ पर बढ़ रही है हमारी हिंदी भाषा। हिंदी भाषा संपूर्ण भारतवर्ष को एकरूपता प्रदान करने वाली भाषा है। हिंदी बोलने वालों की स्वाभिमान की भाषा है। हिंदी काव्य महाआकाश में अंबर मणि सूर्य की तरह की तरह देदीप्यमान है। हमारी हिंदी भाषा इसका संस्कृत भाषा से उद्भव हुआ है, निरंतर विकास की ओर बढ़ रही है। भारत वासियों के गौरव की भाषा हिंदी है। भाषा के बहुत से ऐसे शब्द है जो संस्कृत के शब्दों से मिले हुए हैं और निरंतर प्रयोग में लिए जा रहे हैं। हिंदी भाषा बोलने वालों की संख्या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निरंतर बढ़ रही है। - कामेश्वर चतुर्वेदी, साहित्याचार्य ज्योतिषाचार्य व पूर्व प्रधानाचार्य मथुरा
भाषा के द्वारा मनुष्य अपने विचारों को आदान-प्रदान करता है। जब मनुष्य इस पृथ्वी पर आकर होश संभालता है, तब उसके माता-पिता उसे अपनी भाषा में बोलना सिखाते हैं। भारत में अनेक राज्य हैं। उन राज्यों की अपनी अलग-अलग भाषाएं हैं। इस प्रकार भारत एक बहुभाषी राष्ट्र है, लेकिन उसकी अपनी एक राष्ट्रभाषा हिंदी है। संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया है।
आजादी के इतने वर्ष बाद भी हिंदी को जो गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त होना चाहिए था वह उसे नहीं मिला। हम वार्तालाप करते समय अंग्रेजी का प्रयोग करने में गौरव समझते हैं, भले ही अशुद्ध अंग्रेजी हो। हमें इस मानसिकता का परित्याग करना चाहिए। - रागिनी गांधी, अधिवक्ता, वरिष्ठ प्रदेश महामंत्री न्यायिक मानवाधिकार परिषद
बोलने वालों के लिए स्वाभिमान की भाषा है हिंदी
निरंतर प्रगति पथ पर बढ़ रही है हमारी हिंदी भाषा। हिंदी भाषा संपूर्ण भारतवर्ष को एकरूपता प्रदान करने वाली भाषा है। हिंदी बोलने वालों की स्वाभिमान की भाषा है। हिंदी काव्य महाआकाश में अंबर मणि सूर्य की तरह की तरह देदीप्यमान है। हमारी हिंदी भाषा इसका संस्कृत भाषा से उद्भव हुआ है, निरंतर विकास की ओर बढ़ रही है। भारत वासियों के गौरव की भाषा हिंदी है। भाषा के बहुत से ऐसे शब्द है जो संस्कृत के शब्दों से मिले हुए हैं और निरंतर प्रयोग में लिए जा रहे हैं। हिंदी भाषा बोलने वालों की संख्या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निरंतर बढ़ रही है। - कामेश्वर चतुर्वेदी, साहित्याचार्य ज्योतिषाचार्य व पूर्व प्रधानाचार्य मथुरा
हिंदी का मान रखना हम सभी की जिम्मेदारी
हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा ही नहीं, हमारा जन्मसिद्ध अधिकार भी है। इसका मान रखना हम सभी की जिम्मेदारी है। हिंदी को बढ़ावा देने के लिए और इसे विश्वव्यापी बनाने के लिए हम सबके योगदान और पहल की नितांत आवश्यकता है।
हिंदी राष्ट्र भाषा होने के साथ ही सभी की मातृभाषा भी है। पुलिस विभाग में सारे कार्य हिंदी में ही होते हैं। अपनी राष्ट्र भाषा का मान और सम्मान बढ़ाने के लिए सभी देशवासियों को आगे आना चाहिए और इसका गौरव बरकरार रखने के लिए यथा संभव हो अपना दैनिक कार्य हिंदी भाषा के माध्यम से करने चाहिए। - जितेंद्र कुमार सिंह, पीपीएस।
हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा ही नहीं, हमारा जन्मसिद्ध अधिकार भी है। इसका मान रखना हम सभी की जिम्मेदारी है। हिंदी को बढ़ावा देने के लिए और इसे विश्वव्यापी बनाने के लिए हम सबके योगदान और पहल की नितांत आवश्यकता है।
हिंदी राष्ट्र भाषा होने के साथ ही सभी की मातृभाषा भी है। पुलिस विभाग में सारे कार्य हिंदी में ही होते हैं। अपनी राष्ट्र भाषा का मान और सम्मान बढ़ाने के लिए सभी देशवासियों को आगे आना चाहिए और इसका गौरव बरकरार रखने के लिए यथा संभव हो अपना दैनिक कार्य हिंदी भाषा के माध्यम से करने चाहिए। - जितेंद्र कुमार सिंह, पीपीएस।