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जन्म दिया...फिर जान भी बचाई
अमर उजाला आगरा
Updated Sun, 08 May 2016 02:29 AM IST
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मदर्स डे
- फोटो : Amar Ujala
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मां की किडनी पर जिंदा है महावीर नगर का धनेश
मां...दुनिया का सबसे प्यारा और भरोसेमंद शब्द। बच्चे को जब भी चोट लगती, व्याकुल सबसे ज्यादा मां ही होती। मां जन्म तो देती ही है, अपने ‘खून’ पर जब भी विपदा आए तब भी सबसे पहले ढाल भी वही बनती है। शायर मुनव्वर राना भी तो मां की दुआओं का कुछ ऐसे ही बयान करते हैं, ‘भेजे गए फरिश्ते हमारे बचाव को/ जब हादसात मां की दुआओं से उलझ पड़े।’ मगर यहां तो मां खुद ही फरिश्ता भी बन गई।
ट्रांस यमुना कॉलोनी महावीर नगर की मुन्नी देवी (54) ऐसी ही एक मां हैं। 2009 में इनके बेटे धनेश चंद्र शर्मा (28) की दोनों किडनी हाई ब्लडप्रेशर की वजह से खराब हो गईं। डाक्टरों ने जान बचाने को एक ही विकल्प बताया। वो था किसी की किडनी मिलना। परिवार के अन्य सदस्य कोई निर्णय लेते ही, इससे पहले ही मुन्नी देवी झट बोल पड़ीं। कहा, चाहो तो मेरी दोनों किडनी ले लो, बेटे को कुछ नहीं होना चाहिए। इनकी हालत भी ठीक नहीं रहती, सो परिवारीजनों ने इनसे मना किया, कि कोई और घर का सदस्य किडनी दान दे देगा। लेकिन मुन्नी देवी नहीं मानी, सबकी अनसुनी कर किडनी दान की जिद पकड़ ली। ये देख परिवारीजनों ने भी हार मानी और उन्हें लेकर दिल्ली स्थित हास्पिटल पहुंचे। यहां इनकी चिकित्सकीय जांच बाद बेटे को एक किडनी ट्रांसप्लांट हुई और धनेश को नया जीवन मिला। सात साल बीत गए। बेटे को सामने देख लंबी सांस लेते हुए वो कहती हैं, संतान से बढ़कर मां के लिए और कुछ नहीं।
काश, सबको मिले ऐसी मैया
सिलाई कर दूसरे की बेटी को डाक्टर बनाना चाहती है बेबी
जरार की ज्योति के माता-पिता की बचपन में ही मौत हो गई। उसे कस्बे की ही बेबी ने अपना लिया। वे उसे सिलाई कर डाक्टर बनाना चाहती हैं। 12वीं की परीक्षा देने वाली ज्योति का कहना है कि सबको बेबी जैसी मां मिले।
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ज्योति के खेलने कूदने की उम्र में उसके माता-पिता ने खुदकुशी कर ली थी। अनाथ हुई ज्योति को जरार के मूलचंद्र की पत्नी बेबी ने अपना लिया। उसकी अच्छे से परवरिश की और पढ़ाया-लिखाया। सिलाई के दम पर बेबी अपने परिवार की गाड़ी खींच रही हैं साथ ही इस बेटी को इस साल 12वीं की परीक्षा दिलाई। ज्योति डाक्टर बनना चाहती है। वह चाहती है कि उसे अगले जन्म में भी बेेबी जैसी ही मां मिले। ज्योति का कहना है कि वह डाक्टर बनकर कोख में हो रही कन्याओं की हत्या पर रोक लगाने के भरसक प्रयास करेगी। एक कमरे के कच्चे घर में रहने वाली बेबी भी ज्योति को इसी रूप में देखना चाहती हैं। भूमिहीन परिवार से ताल्लुक रखने वाली इस मां को न तो सरकारी आवास, शौचालय की मदद मिल सकी है और न ही पेंशन का सहारा हासिल हो सका है।
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मां...दुनिया का सबसे प्यारा और भरोसेमंद शब्द। बच्चे को जब भी चोट लगती, व्याकुल सबसे ज्यादा मां ही होती। मां जन्म तो देती ही है, अपने ‘खून’ पर जब भी विपदा आए तब भी सबसे पहले ढाल भी वही बनती है। शायर मुनव्वर राना भी तो मां की दुआओं का कुछ ऐसे ही बयान करते हैं, ‘भेजे गए फरिश्ते हमारे बचाव को/ जब हादसात मां की दुआओं से उलझ पड़े।’ मगर यहां तो मां खुद ही फरिश्ता भी बन गई।
ट्रांस यमुना कॉलोनी महावीर नगर की मुन्नी देवी (54) ऐसी ही एक मां हैं। 2009 में इनके बेटे धनेश चंद्र शर्मा (28) की दोनों किडनी हाई ब्लडप्रेशर की वजह से खराब हो गईं। डाक्टरों ने जान बचाने को एक ही विकल्प बताया। वो था किसी की किडनी मिलना। परिवार के अन्य सदस्य कोई निर्णय लेते ही, इससे पहले ही मुन्नी देवी झट बोल पड़ीं। कहा, चाहो तो मेरी दोनों किडनी ले लो, बेटे को कुछ नहीं होना चाहिए। इनकी हालत भी ठीक नहीं रहती, सो परिवारीजनों ने इनसे मना किया, कि कोई और घर का सदस्य किडनी दान दे देगा। लेकिन मुन्नी देवी नहीं मानी, सबकी अनसुनी कर किडनी दान की जिद पकड़ ली। ये देख परिवारीजनों ने भी हार मानी और उन्हें लेकर दिल्ली स्थित हास्पिटल पहुंचे। यहां इनकी चिकित्सकीय जांच बाद बेटे को एक किडनी ट्रांसप्लांट हुई और धनेश को नया जीवन मिला। सात साल बीत गए। बेटे को सामने देख लंबी सांस लेते हुए वो कहती हैं, संतान से बढ़कर मां के लिए और कुछ नहीं।
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काश, सबको मिले ऐसी मैया
सिलाई कर दूसरे की बेटी को डाक्टर बनाना चाहती है बेबी
जरार की ज्योति के माता-पिता की बचपन में ही मौत हो गई। उसे कस्बे की ही बेबी ने अपना लिया। वे उसे सिलाई कर डाक्टर बनाना चाहती हैं। 12वीं की परीक्षा देने वाली ज्योति का कहना है कि सबको बेबी जैसी मां मिले।
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ज्योति के खेलने कूदने की उम्र में उसके माता-पिता ने खुदकुशी कर ली थी। अनाथ हुई ज्योति को जरार के मूलचंद्र की पत्नी बेबी ने अपना लिया। उसकी अच्छे से परवरिश की और पढ़ाया-लिखाया। सिलाई के दम पर बेबी अपने परिवार की गाड़ी खींच रही हैं साथ ही इस बेटी को इस साल 12वीं की परीक्षा दिलाई। ज्योति डाक्टर बनना चाहती है। वह चाहती है कि उसे अगले जन्म में भी बेेबी जैसी ही मां मिले। ज्योति का कहना है कि वह डाक्टर बनकर कोख में हो रही कन्याओं की हत्या पर रोक लगाने के भरसक प्रयास करेगी। एक कमरे के कच्चे घर में रहने वाली बेबी भी ज्योति को इसी रूप में देखना चाहती हैं। भूमिहीन परिवार से ताल्लुक रखने वाली इस मां को न तो सरकारी आवास, शौचालय की मदद मिल सकी है और न ही पेंशन का सहारा हासिल हो सका है।