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आगरा में हादसा: पुलिस अधिकारियों से एक्सपर्ट बोले, सेप्टिक टैंक और कुएं में बनी है गैस, कई बार हो चुके हैं हादसे
Wed, 17 Mar 2021 10:42 AM IST
Abhishek Saxena
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
Published by: Abhishek Saxena
Updated Wed, 17 Mar 2021 10:42 AM IST
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पांच मौतों के बाद पीड़ित परिवार से बात करते डीएएम, एसएसपी व अन्य अधिकारी
- फोटो : अमर उजाला
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गांव परतापुरा में हुए हादसे में पांच लोगों की जान चली गई। इसकी वजह अधिकारी मीथेन गैस का बनना मान रहे हैं। एक्सपर्ट ने पुलिस अधिकारियों को बताया कि मीथेन गैस सेप्टिक टैंक और कुएं में बनती है। जो व्यक्ति इसके संपर्क में आता है, उसे यह कुछ पल में अचेत कर देती है। उपचार में देरी हो जाए तो जान भी चली जाती है। गांव में शहर की तरह टैंक नहीं बनाए जाते हैं। इनमें तली पक्की नहीं होती है, जबकि दीवार कर दी जाती है। वहीं गैस निकलने के लिए पाइप भी नहीं लगाया जाता है। यह जब खोला जाता है तो गैस निकलने लगती है।
एसएसपी बबलू कुमार ने बताया कि पूछताछ में पता चला है कि सुरेंद्र के घर में सेप्टिक टैंक तकरीबन 15 साल पहले बना था। यह भर गया था। इससे शौचालय में पानी भर रहा था। उन्होंने टैंक की सफाई की जगह नया बनाने का प्लान बनाया। इसके लिए उसके पास ही गड्ढा खुदवा रहे थे। यह चार फुट चोड़ा और आठ फुट गहरा बनाया था। इतना ही गहरा पुराना वाला भी था। पुराने वाले के पास ही होने की वजह से पानी का रिसाव हो गया।
एक्सपर्ट ने पुलिस को बताया कि ईंटों की चिनाई करके गांव में सेप्टिक टैंक बनाया जाता है। इसमें नीचे तली नहीं होती है। पानी ईंटों की जाली से निकल जाता है। गैस पाइप भी नहीं लगाया जाता। सुरेंद्र के पुराने टैंक में गैस पाइप नहीं था। जब सेप्टिक टैंक के बराबर में दूसरा बनाने के लिए गड्ढा खोदा गया तो पानी के साथ गैस का रिसाव हो गया। गैस बनने से ही पांचों की जान चली गई होगी। टैंक से निकलने वाली गैस मीथेन होती है। इस गैस से गला घुंटने लगता है। हाथ-पैर काम नहीं करते हैं। चंद घंटों में यह जान ले लेती है। इसके साथ ही कार्बन डाई आक्साइड भी हो सकती है। इससे आक्सीजन की कमी हो जाती है। यह गैस ज्यादातर कुएं और टैंक में ही बनती हैं। क्योंकि इनकी सफाई काफी दिन बाद होती है। इस वजह से कई बार हादसे हो चुके हैं। इसलिए सफाई पहले इंतजाम करते है। इसके बाद ही उतरते हैं।
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एसएसपी बबलू कुमार ने बताया कि पूछताछ में पता चला है कि सुरेंद्र के घर में सेप्टिक टैंक तकरीबन 15 साल पहले बना था। यह भर गया था। इससे शौचालय में पानी भर रहा था। उन्होंने टैंक की सफाई की जगह नया बनाने का प्लान बनाया। इसके लिए उसके पास ही गड्ढा खुदवा रहे थे। यह चार फुट चोड़ा और आठ फुट गहरा बनाया था। इतना ही गहरा पुराना वाला भी था। पुराने वाले के पास ही होने की वजह से पानी का रिसाव हो गया।
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एक्सपर्ट ने पुलिस को बताया कि ईंटों की चिनाई करके गांव में सेप्टिक टैंक बनाया जाता है। इसमें नीचे तली नहीं होती है। पानी ईंटों की जाली से निकल जाता है। गैस पाइप भी नहीं लगाया जाता। सुरेंद्र के पुराने टैंक में गैस पाइप नहीं था। जब सेप्टिक टैंक के बराबर में दूसरा बनाने के लिए गड्ढा खोदा गया तो पानी के साथ गैस का रिसाव हो गया। गैस बनने से ही पांचों की जान चली गई होगी। टैंक से निकलने वाली गैस मीथेन होती है। इस गैस से गला घुंटने लगता है। हाथ-पैर काम नहीं करते हैं। चंद घंटों में यह जान ले लेती है। इसके साथ ही कार्बन डाई आक्साइड भी हो सकती है। इससे आक्सीजन की कमी हो जाती है। यह गैस ज्यादातर कुएं और टैंक में ही बनती हैं। क्योंकि इनकी सफाई काफी दिन बाद होती है। इस वजह से कई बार हादसे हो चुके हैं। इसलिए सफाई पहले इंतजाम करते है। इसके बाद ही उतरते हैं।
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