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दिल बहलाने के लिए फिंगर प्रिंट का ख्याल अच्छा है
दिल बहलाने के लिए फिंगर प्रिंट का ख्याल अच्छा है
Updated Wed, 11 May 2016 01:51 AM IST
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जांच
- फोटो : demopic
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किसी सनसनीखेज वारदात के बाद घटनास्थल पर जैसे ही फील्ड यूनिट की टीम पहुंचकर हैंडलेंस से देखते हुए फिंगर प्रिंट लेती है, तो हर किसी को उम्मीद जग जाती है कि अपराधी तक पहुंचने का एक रास्ता तो मिल गया। लेकिन क्या आप जानते हैं कि बाद में इन फिंगर प्रिंट का क्या होता है? गुनहगार की अंगुलियों के निशान से उसके हाथों में हथकड़ी डालने का ख्याल दिल तो बहला सकता है लेकिन हकीकत में ऐसा होता नहीं।
आंकड़े गवाह हैं कि फिंगर प्रिंट के जरिए गुत्थी सुलझने का प्रतिशत एक से कम है। 40 प्रतिशत मामलों में तो फिंगर प्रिंट स्पष्ट ही नहीं होते हैं। रिंग रोड पर गंगेश्वर कैंपस में कारोबारी विनय गर्ग की मां मुन्नी देवी गर्ग की हत्या कर लाखों की लूट के मामले में भी फिंगर प्रिंट लिए गए। लेकिन ये स्पष्ट नहीं बताए जा रहे हैं। अगर ये साफ होते भी तो किस काम के थे? जब पुलिस के पास कोई ऐसा संदिग्ध ही नहीं है, जिस पर केस खुलने की उम्मीद हो। पुलिस अफसरों के पास बताने के लिए एक भी ऐसा हाईप्रोफाइल या चर्चित केस नहीं है, जो फिंगर प्रिंट की बदौलत खुला हो।
वर्ष - फिंगर प्रिंट
2011 - 485
2012 - 1049
2013 - 565
2014 - 812
2015 - 950
2016 में
जनवरी - 19
फरवरी - 25
मार्च - 67
अप्रैल - 27
कहीं लैब में लटकी रिपोर्ट
- ग्रोवर दंपति हत्याकांड में लिए गए फिंगर प्रिंट को संदिग्धों के फिंगर प्रिंट से मिलान के लिए लखनऊ लैब भेजा गया, रिपोर्ट अभी तक नहीं आई। खंदारी में ही मां-बेटी की हत्या के मामले में फिंगर प्रिंट लिए गए, आरोपी के फिंगर प्रिंट के साथ इनके मिलान के लिए लखनऊ भेजा, लेकिन रिपोर्ट नहीं आई।
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कहीं थानों पर पड़े फिंगर प्रिंट
- पिछले दो साल में चोरी के 150 मामलों में संदिग्धों के फिंगर प्रिंट न होने के चलते मौके से मिले प्रिंट जांच के लिए विधि विज्ञान प्रयोगशाला नहीं भेजे गए। लूट और हत्या के 80 फीसदी अनसुलझे मामलों में कोई संदिग्ध न होने के चलते फिंगर प्रिंट किसी काम नहीं आए हैं। अपराधी पकडे़ जाने पर इन्हें साक्ष्य बनाया जा सकता है लेकिन केस खुलने पर पुलिस इस ओर ध्यान नहीं देती।
- कहीं स्पष्ट निशान मिले ही नहीं
राष्ट्रदीप पेट्रोल पंप के मालिक एवं आर्मी के रिटायर्ड कैप्टन अनेक सिंह सिकरवार की हत्या में मौका-ए-वारदात से फिंगर प्रिंट नहीं मिले थे। फील्ड यूनिट के सूत्रों की मानें तो सिर्फ 60 फीसदी मामलों में ही स्पष्ट फिंगर प्रिंट मिल पा रहे हैं। ज्यादातर मामलों में फिंगर प्रिंट ओवरलेप कर जाते हैं। अगर कहीं पहले से फिंगर प्रिंट मौजूद हों, तो ऐसा होता है।
- मौके से मिले फिंगर प्रिंट से केस तभी खुल सकता है, जब अपराधी के फिंगर प्रिंट भी मौजूद हों, वरना मिलान कैसे होगा?
- गीता रानी, प्रभारी, फील्ड यूनिट
- फिंगर प्रिंट मिलते हैं तो परीक्षण के लिए भेजे जाते हैं। हां, अगर किसी केस में कोई संदिग्ध ही न हो, तो अलग बात है। सुशील घुले, एसपी सिटी
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आंकड़े गवाह हैं कि फिंगर प्रिंट के जरिए गुत्थी सुलझने का प्रतिशत एक से कम है। 40 प्रतिशत मामलों में तो फिंगर प्रिंट स्पष्ट ही नहीं होते हैं। रिंग रोड पर गंगेश्वर कैंपस में कारोबारी विनय गर्ग की मां मुन्नी देवी गर्ग की हत्या कर लाखों की लूट के मामले में भी फिंगर प्रिंट लिए गए। लेकिन ये स्पष्ट नहीं बताए जा रहे हैं। अगर ये साफ होते भी तो किस काम के थे? जब पुलिस के पास कोई ऐसा संदिग्ध ही नहीं है, जिस पर केस खुलने की उम्मीद हो। पुलिस अफसरों के पास बताने के लिए एक भी ऐसा हाईप्रोफाइल या चर्चित केस नहीं है, जो फिंगर प्रिंट की बदौलत खुला हो।
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वर्ष - फिंगर प्रिंट
2011 - 485
2012 - 1049
2013 - 565
2014 - 812
2015 - 950
2016 में
जनवरी - 19
फरवरी - 25
मार्च - 67
अप्रैल - 27
कहीं लैब में लटकी रिपोर्ट
- ग्रोवर दंपति हत्याकांड में लिए गए फिंगर प्रिंट को संदिग्धों के फिंगर प्रिंट से मिलान के लिए लखनऊ लैब भेजा गया, रिपोर्ट अभी तक नहीं आई। खंदारी में ही मां-बेटी की हत्या के मामले में फिंगर प्रिंट लिए गए, आरोपी के फिंगर प्रिंट के साथ इनके मिलान के लिए लखनऊ भेजा, लेकिन रिपोर्ट नहीं आई।
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कहीं थानों पर पड़े फिंगर प्रिंट
- पिछले दो साल में चोरी के 150 मामलों में संदिग्धों के फिंगर प्रिंट न होने के चलते मौके से मिले प्रिंट जांच के लिए विधि विज्ञान प्रयोगशाला नहीं भेजे गए। लूट और हत्या के 80 फीसदी अनसुलझे मामलों में कोई संदिग्ध न होने के चलते फिंगर प्रिंट किसी काम नहीं आए हैं। अपराधी पकडे़ जाने पर इन्हें साक्ष्य बनाया जा सकता है लेकिन केस खुलने पर पुलिस इस ओर ध्यान नहीं देती।
- कहीं स्पष्ट निशान मिले ही नहीं
राष्ट्रदीप पेट्रोल पंप के मालिक एवं आर्मी के रिटायर्ड कैप्टन अनेक सिंह सिकरवार की हत्या में मौका-ए-वारदात से फिंगर प्रिंट नहीं मिले थे। फील्ड यूनिट के सूत्रों की मानें तो सिर्फ 60 फीसदी मामलों में ही स्पष्ट फिंगर प्रिंट मिल पा रहे हैं। ज्यादातर मामलों में फिंगर प्रिंट ओवरलेप कर जाते हैं। अगर कहीं पहले से फिंगर प्रिंट मौजूद हों, तो ऐसा होता है।
- मौके से मिले फिंगर प्रिंट से केस तभी खुल सकता है, जब अपराधी के फिंगर प्रिंट भी मौजूद हों, वरना मिलान कैसे होगा?
- गीता रानी, प्रभारी, फील्ड यूनिट
- फिंगर प्रिंट मिलते हैं तो परीक्षण के लिए भेजे जाते हैं। हां, अगर किसी केस में कोई संदिग्ध ही न हो, तो अलग बात है। सुशील घुले, एसपी सिटी