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रोजगार, न्याय की भाषा बने हिंदी, तो ही उत्थान

Tue, 26 Apr 2016 02:23 AM IST
अमर उजाला आगरा
अमर उजाला आगरा Updated Tue, 26 Apr 2016 02:23 AM IST
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Employment, justice, became the language of Hindi, then the regeneration
रोजगार, न्याय की भाषा बने हिंदी, तो ही उत्थान - फोटो : अमर उजाला
सुप्रसिद्ध कवि और आलोचक प्रो. अरुण कमल का मानना है कि संगोष्ठी, सेमिनार अपनी जगह, हिंदी को रोजगार और न्यायपालिका की भाषा बनाए बिना इसका उत्थान संभव नहीं है। विश्वविद्यालय परिसर स्थित जुबली हाल में हिंदी के राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य विषय पर विद्वानों ने व्याख्यान दिया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेशों में हिंदी में भाषण देने की सराहना की। सात दिवसीय संगोष्ठी के पहले दिन सोमवार को मुख्य अतिथि लालबहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ के कुलपति प्रो. रमेश पांडे ने कहा कि डा. भीम राव अंबेडकर संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाने के पक्षधर थे। मुख्य वक्ता प्रो. त्रिभुवन नाथ शुक्ल ने विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार में सिनेमा की भूमिका को उल्लेखनीय बताया। अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मोहम्मद मुजम्मिल ने कहा कि हिंदी सर्वग्राही और सर्वस्पर्शी है। अनुमान है कि 61 हजार आप्रवासी भारतीयों की आपसी बोलचाल की भाषा हिंदी है। केंद्रीय हिंदी संस्थान के निदेशक प्रो. नंदकिशोर पांडे और विशिष्ट अतिथि प्रो. हरीमोहन शर्मा ने हिंदी के बढ़ते प्रसार पर प्रकाश डाला। केएमआई निदेशक प्रो. प्रदीप श्रीधर ने अतिथियों का आभार जताया। संचालन प्रो. जय सिंह नीरद ने किया। डा. हरिवंश सिंह, डा. सुनीता रानी घोष, डा. देशबंधु, डा. नीलम यादव, डा. रीतेश कुमार, डा. रणजीत भारती रहे। 
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