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लापरवाही से खतरे में पड़ीं सैकड़ों जानें
अमर उजाला आगरा
Updated Tue, 26 Jul 2016 12:53 AM IST
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जल निगम
- फोटो : अमर उजाला ब्यूूराो
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जलकल विभाग की लापरवाही से तमाम जिंदगियां खतरे में पड़ गई। पिछले 10 सालों से झाड़ियों में पड़े क्लोरीन के सिलेंडर की किसी ने सुध नहीं ली। बड़ी बात यह कि रिसाव को रोकने के लिए घंटों तक इंतजाम नहीं हो सके। आखिर में सिलेंडर को पानी के टैंक में डाला गया।
आवास विकास सेक्टर दो में सेंट्रल पार्क के पास स्थित पानी की टंकी को आवास विकास परिषद ने जलकल को अप्रैल 2006 में हैंडओवर किया था। तभी से यह सिलेंडर यहीं पड़ा हुआ था। यह किसी काम का नहीं था क्योंकि टंकियां सालों से प्रयोग में नहीं ली जा रहीं। बड़ी बात यह कि जलकल अधिकारियों के पास इससे समस्या के समाधान के उपाय नहीं थे।
पहले तय किया गया कि इस सिलेंडर को सेक्टर चार स्थित पानी के टैंक में डाला जाएगा। बाद में तय हुआ कि इसे परिसर में ही स्थित टैंक में डाला जाएगा। लेकिन क्रेन नहीं थी। कर्मचारियों के पास मास्क नहीं थे। यह तो गनीमत रही कि सिलेंडर में गैस काफी कम थी, नहीं तो जनहानि भी हो सकती थी।
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जलकल केमिकल ब्रांच के हेड डा. दीपक का कहना है कि अमूमन एक सिलेंडर में 900 किलो गैस आती है। मगर, खाली सिलेंडर में भी लगभग 15 किलो तक गैस रह जाती है। इस सिलेंडर में भी लगभग इतनी ही गैस थी।
जल शोधन में होता है क्लोरीन का प्रयोग
शहर में जल आपूर्ति के लिए जलकल यमुना के पानी के शोधन में क्लोरीन का प्रयोग करता है। जीवनी मंडी वाटर वर्क्स के अलावा जोनल पंपिंग स्टेशनों पर भी इसका स्टाक रखा जाता है।
सेवानिवृत्त कर्मचारियों का लेना पड़ा सहारा
इस समस्या के समाधान के लिए जलकल को अपने सेवानिवृत्त कर्मचारियों के अनुभव का सहारा लेना पड़ा। गैस के रिसाव को रोकने के उपायों पर मंथन के लिए सेवानिवृत्त ओपी शर्मा को बुलाया गया।
गंगाजल के लिए खाली पड़ी टंकियां
आवास विकास में पानी की चार बड़ी टंकियां हैं मगर इनमें से एक भी चालू नहीं है। इस पूरे क्षेत्र में सिकंदरा स्थित वाटर वर्क्स से सप्लाई की जाती है। सेक्टर दो, चार, नौ और 15 में टंकियां शोपीस बनी हुई हैं। बताया जा रहा है कि इन्हें गंगाजल प्रोजेक्ट में ट्रांसफर कर दिया गया है। यानी जब गंगाजल आएगा तब इनका प्रयोग होगा।
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आवास विकास सेक्टर दो में सेंट्रल पार्क के पास स्थित पानी की टंकी को आवास विकास परिषद ने जलकल को अप्रैल 2006 में हैंडओवर किया था। तभी से यह सिलेंडर यहीं पड़ा हुआ था। यह किसी काम का नहीं था क्योंकि टंकियां सालों से प्रयोग में नहीं ली जा रहीं। बड़ी बात यह कि जलकल अधिकारियों के पास इससे समस्या के समाधान के उपाय नहीं थे।
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पहले तय किया गया कि इस सिलेंडर को सेक्टर चार स्थित पानी के टैंक में डाला जाएगा। बाद में तय हुआ कि इसे परिसर में ही स्थित टैंक में डाला जाएगा। लेकिन क्रेन नहीं थी। कर्मचारियों के पास मास्क नहीं थे। यह तो गनीमत रही कि सिलेंडर में गैस काफी कम थी, नहीं तो जनहानि भी हो सकती थी।
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जलकल केमिकल ब्रांच के हेड डा. दीपक का कहना है कि अमूमन एक सिलेंडर में 900 किलो गैस आती है। मगर, खाली सिलेंडर में भी लगभग 15 किलो तक गैस रह जाती है। इस सिलेंडर में भी लगभग इतनी ही गैस थी।
जल शोधन में होता है क्लोरीन का प्रयोग
शहर में जल आपूर्ति के लिए जलकल यमुना के पानी के शोधन में क्लोरीन का प्रयोग करता है। जीवनी मंडी वाटर वर्क्स के अलावा जोनल पंपिंग स्टेशनों पर भी इसका स्टाक रखा जाता है।
सेवानिवृत्त कर्मचारियों का लेना पड़ा सहारा
इस समस्या के समाधान के लिए जलकल को अपने सेवानिवृत्त कर्मचारियों के अनुभव का सहारा लेना पड़ा। गैस के रिसाव को रोकने के उपायों पर मंथन के लिए सेवानिवृत्त ओपी शर्मा को बुलाया गया।
गंगाजल के लिए खाली पड़ी टंकियां
आवास विकास में पानी की चार बड़ी टंकियां हैं मगर इनमें से एक भी चालू नहीं है। इस पूरे क्षेत्र में सिकंदरा स्थित वाटर वर्क्स से सप्लाई की जाती है। सेक्टर दो, चार, नौ और 15 में टंकियां शोपीस बनी हुई हैं। बताया जा रहा है कि इन्हें गंगाजल प्रोजेक्ट में ट्रांसफर कर दिया गया है। यानी जब गंगाजल आएगा तब इनका प्रयोग होगा।