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अनिल यादव को बचाने में बुरी फंसी पुलिस

Thu, 19 Nov 2015 01:53 AM IST
ब्यूरो अमर उजाला, आगरा
ब्यूरो अमर उजाला, आगरा Updated Thu, 19 Nov 2015 01:53 AM IST
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police trap to escape anil yadav
उत्तर प्रदेश लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष पद से बर्खास्त किए गए अनिल यादव के जुर्म के काले चिट्ठे के साथ पुलिस की करतूत भी सामने आ गई है। जांच शुरू होते ही शीशे की तरह साफ हो गया है कि पुलिस ने अनिल को बचाने के लिए उसके गुनाहों पर अपनी कारस्तानी का पर्दा डाल रखा था।
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यह भी पता चला है कि पुलिस उसके इशारों पर नाच रही थी। इसकी तस्दीक इस बात से होती है कि बगैर किसी आदेश के ही अनिल के अपराध के रिकार्ड के आगे से नाम मिटा दिया गया था। पुलिस सूत्रों की मानें तो यह पूरा खेल 2011 में हुआ।
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उस समय न्यू आगरा थाना पर तैनात पूरे स्टाफ के बारे में जानकारी की जा रही है। अनिल यादव कमला नगर निवासी है। उसके खिलाफ सबसे ज्यादा केस न्यू आगरा थाना पर दर्ज हैं।
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अभी यह मालूम होना बाकी है कि गुंडा एक्ट से लेकर हिस्ट्रीशीट तक के रिकार्ड को छुपाने में कौन-कौन पुलिसवाले शामिल रहे? यह खेल थाना स्तर पर हुआ या फिर अफसरों की भी भूमिका रही? वैसे लग तो यही रहा है कि पुलिस पर अधिकारी या नेता ने दबाव डाला होगा। इतना बड़ा जोखिम थाने के पुलिस वाले अपने दम पर नहीं ले सकते।
गौरतलब है कि पुलिस ने अनिल यादव का आपराधिक इतिहास शासन को भेजा है। इसमें बताया गया है कि उस पर मारपीट, बलवा, डकैती, चौथ वसूली समेत 10 केस दर्ज हैं।
इनके अलावा सात एनसीआर हैं। उसकी 1990 में न्यू आगरा थाना पर हिस्ट्रीशीट खोली गई। इससे पहले 1985 में उस पर गुण्डा एक्ट की कार्रवाई हुई थी। यह रिकार्ड थाना पर मौजूद था लेकिन मुकदमों के आगे से कई जगह अनिल यादव का नाम व्हाइटनर से मिटा दिया गया था। कई जगह लिख दिया था कि यह नष्ट करा दिया गया जबकि ऐसा कोई आदेश नहीं था।

पुलिस सूत्रों ने बताया कि इस मामले में डीआईजी लक्ष्मी सिंह ने भी एसएसपी से रिपोर्ट मांग रखी है। इमसें पूछा गया है कि अनिल यादव का आपराधिक रिकार्ड छुपाने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई?
मामला संज्ञान में है। इसकी विभागीय जांच चल रही है। जांच रिपोर्ट के आधार पर ही कार्रवाई की जाएगी - डा. प्रीतिंदर सिंह ( एसएसपी )
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