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चकाचौंध लाइफ स्टाइल थी संजीव की पहचान
Updated Sat, 29 Jul 2017 12:39 AM IST
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दीपक जैन (फिरोजाबाद)। चूड़ी के गोदाम से कारखानों में साझदारी से लेकर रीयल स्टेट में संजीव गुप्ता के दखल ने उन्हें थोडे ही समय में उद्योपतियों की कतार में खड़ा कर दिया। संजीव गुप्ता की पहचान एक उद्योगपति से अधिक चकाचौंध वाली लाइफ स्टाइल की अधिक है। सोशल मीडिया पर सक्रियता ने अलग ही पहचान दिलाई।
महंगी गाडी, आलीशान बंगला, ब्रांडेड ज्वैलरी, महंगे कपडों के शौक के साथ संजीव गुप्ता जिस महफिल में कदम रखते लोगों की नजरें बस उन्हीं पर टिक जाती। पैसों के खेल में बीसी के धंधे में उन्होंने कदम रखा तो कारोबारियों के साथ-साथ शहर के प्रमुख चिकित्सक, व्यापारी भी उनसे जुड़ते चले गए।
उन्होंने जिले से बाहर आगरा, मथुरा और अलीगढ़ तक अपना नेटवर्क बना लिया। एक सत्संग कमेटी से उनके जुड़ाव ने और अलग पहचान दी। शिमला तक में उनके मित्र बन गए। पैसों से जब उनका खजाना भरा तो बीसी का काम रंग रूप बदल कर और आगे बढ़ गया। शहर के कई प्रोजेक्टों में वह साझीदार हो गए।
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शहर के एक प्रमुख स्कूल में भी अपरोक्ष रूप से वह साझीदार हैं। सागर रत्ना रेस्टोरेंट में वह साझीदार हैं। रीयल स्टेट के कई प्रोजेक्टों में वह साझीदार हैं। करोड़ों के इन प्रोजेक्टों पर मंदी का असर आया तो संजीव गुप्ता भी इसका शिकार होने लगे। प्रोजेक्टों में पैसा जितना फंसा उसका रिर्टन नहीं मिला लेकिन देश के महंगे शहरों के साथ विदेशों की सैर ने अमादनी कम खर्च अधिक वाली कहावत को सच साबित करते हुए उनके सामने संकट खडा कर दिया।
जानकार बताते हैं कि तीस करोड़ से अधिक की देनदारी उनके उपर है। स्थिति यह जहां से उन्होंने ऋृण ले रखा है उनकी किस्त देने में भी मुश्किल होने लगी।
अकेेले संजीव ही नहीं और भी कई हैं
शहर में बीसी का खेल बड़े पैमाने पर चल रहा है। अकेले संजीव गुप्ता ही नहीं शहर में तमाम लोग बीसी का खेल चला रहे हैं। नंबर दो के इस खेल में कोई लिखापढ़ी नहीं है। कई लोग रातों रात बीसी का लाखों रुपया बटोर कर शहर से फरार भी हो चुके हैं।
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महंगी गाडी, आलीशान बंगला, ब्रांडेड ज्वैलरी, महंगे कपडों के शौक के साथ संजीव गुप्ता जिस महफिल में कदम रखते लोगों की नजरें बस उन्हीं पर टिक जाती। पैसों के खेल में बीसी के धंधे में उन्होंने कदम रखा तो कारोबारियों के साथ-साथ शहर के प्रमुख चिकित्सक, व्यापारी भी उनसे जुड़ते चले गए।
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उन्होंने जिले से बाहर आगरा, मथुरा और अलीगढ़ तक अपना नेटवर्क बना लिया। एक सत्संग कमेटी से उनके जुड़ाव ने और अलग पहचान दी। शिमला तक में उनके मित्र बन गए। पैसों से जब उनका खजाना भरा तो बीसी का काम रंग रूप बदल कर और आगे बढ़ गया। शहर के कई प्रोजेक्टों में वह साझीदार हो गए।
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शहर के एक प्रमुख स्कूल में भी अपरोक्ष रूप से वह साझीदार हैं। सागर रत्ना रेस्टोरेंट में वह साझीदार हैं। रीयल स्टेट के कई प्रोजेक्टों में वह साझीदार हैं। करोड़ों के इन प्रोजेक्टों पर मंदी का असर आया तो संजीव गुप्ता भी इसका शिकार होने लगे। प्रोजेक्टों में पैसा जितना फंसा उसका रिर्टन नहीं मिला लेकिन देश के महंगे शहरों के साथ विदेशों की सैर ने अमादनी कम खर्च अधिक वाली कहावत को सच साबित करते हुए उनके सामने संकट खडा कर दिया।
जानकार बताते हैं कि तीस करोड़ से अधिक की देनदारी उनके उपर है। स्थिति यह जहां से उन्होंने ऋृण ले रखा है उनकी किस्त देने में भी मुश्किल होने लगी।
अकेेले संजीव ही नहीं और भी कई हैं
शहर में बीसी का खेल बड़े पैमाने पर चल रहा है। अकेले संजीव गुप्ता ही नहीं शहर में तमाम लोग बीसी का खेल चला रहे हैं। नंबर दो के इस खेल में कोई लिखापढ़ी नहीं है। कई लोग रातों रात बीसी का लाखों रुपया बटोर कर शहर से फरार भी हो चुके हैं।