लॉकडाउन: पैदल चलते-चलते पांव में पड़ गए छाले, घर लौटे मजदूरों को अब रोटियों के लाले
- जिस रोटी के लिए सैकड़ों किमी पैदल चलकर आए, अब उसके लिए संघर्ष
- वहां दाने-दाने को मोहताज थे, यहां भी राशन का इंतजाम नहीं
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
आगरा में अपने घर लौटे ऐसे ही मजदूर बता रहे हैं कि वहां दाने-दाने को मोहताज थे और यहां भी राशन का इंतजाम नहीं है, क्योंकि काम-धंधों पर यहां भी ताला लगा है। जगदीशपुरा से तपती दोपहरी में छह किमी पैदल चलकर पेट भरने के लिए आगरा-दिल्ली हाईवे स्थित गुरुद्वारा गुरु का ताल पहुंचे मजदूरों ने अपना दर्द बयां किया।
सबकी अपनी-अपनी कहानी
मध्य प्रदेश से लौटे संजय ने बताया कि वो ग्वालियर, इंदौर और उज्जैन आदि जगहों पर मेलों में खेल तमाशे की दुकान लगाता था। लॉकडाउन होते ही मेला बंद हो गया, इसलिए घर चला आया। सोचा था, आगरा में और कुछ न सही, किराए पर लेकर ऑटो तो चला ही लेगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
जगदीशपुरा में शांति टॉकीज के पास रहने वाला राजेश गाजियाबाद में बेलदारी करता था। लॉकडाउन होने के बाद 30 मार्च को घर लौट आया। कई साल से बाहर रह रहा था, इसलिए राशन कार्ड ब्लॉक हो गया। जिन अपनों के बीच वो आया, अब उनके चूल्हे भी ठंडे पड़े हैं। राजेश ने बताया कि बस इतनी राहत है कि परिवार के साथ हैं, वरना रोटी का इंतजाम वहां भी नहीं था, यहां भी नहीं है।
यहां अकेलापन महसूस नहीं होता
जगदीशपुरा के विनोद ने बताया कि वो दिल्ली में जूता फैक्टरी में काम करता था। वो बंद हो गई। सब चले गए तो वो भी चला आया। वहां डर लग रहा था, पता नहीं क्या होगा, बड़ी आपदा हैं। अब घर में है, खाली बैठा है। रोटी का इंतजाम नहीं। पर परिवार के साथ रहने से अकेलापन महसूस नहीं होता।