फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Agra News ›   Corona infected SDM mathura wrote poem during quarantine in isolation ward

एसडीएम ने कोरोना को दी मात, आइसोलेशन वार्ड में लिखी कविता, सोशल मीडिया पर वायरल

Sun, 05 Jul 2020 09:22 AM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा Published by: मुकेश कुमार Updated Sun, 05 Jul 2020 09:22 AM IST
सार

  • मथुरा के एसडीएम सदर क्रांतिशेखर सिंह कोरोना संक्रमित हो गए थे। उपचार और अपनी दृढ़शक्ति से उन्होंने कोरोना को हरा दिया। 

विज्ञापन
Corona infected SDM mathura wrote poem during quarantine in isolation ward
एसडीएम क्रांतिशेखर सिंह - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

‘मैं घिरा हुआ हूं कलयुग से तुम अपना द्वापर ले आओ, इन लाल पत्थरों की रंगत फिर से मुझको लौटाओ, कालिंदी खुद है डूब रही कुछ इसको भी तो सुलझाओ ब्रज तुम्हें बुलाता है फिर से ब्रजराज चले आओ, गोविंद चले आओ...’।  

विज्ञापन


यह कविता कोरोना संक्रमित होने पर मथुरा के एसडीएम सदर क्रांतिशेखर सिंह ने आइसोलेशन अवधि के दौरान केडी मेडिकल कॉलेज में रहते लाल पत्थर वाले गोविंद देव मंदिर के इतिहास पर लिखी है। यह सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। इसमें गोविंद देव मंदिर की खूबसूरती और नक्काशी का उल्लेख है। 
विज्ञापन


कविता के माध्यम से उन्होंने मंदिर की मान्यता को लेकर लिखा है कि गोविंद देव जी का विग्रह अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के कहने पर श्री कृष्ण के प्रपौत्र ब्रजनाभ ने बनवाया था। ब्रजनाभ जी द्वारा ब्रज में स्थापित होने के पश्चात यह विग्रह लुप्त हो गया, जिसे षड-गोस्वामियों में से एक श्री रूप गोस्वामी जी ने 16वीं शदी में पुन: प्रकट किया। 

विज्ञापन
विज्ञापन

गोविंद देव मंदिर का यह है इतिहास

गोविंद देव जी देवी योगमाया व देवी वृंदा के साथ वृंदावन में लाल पत्थरों वाले अद्भुत मंदिर में सुशोभित हुए। इस मंदिर के निर्माण के लिए सम्राट अकबर ने भूमि दान दी और 1590 में जयपुर के राजा मान सिंह ने इसे बनवाया। मंदिर के शिखर पर स्थित 50 मन घी से जलने वाले दीपक की लालिमा दिल्ली तक दिखती थी। 

कालांतर में सन 1670 में औरंगजेब द्वारा इसके शिखर और दीपक को तुड़वा दिया और गोविंद देव जी जयपुर चले गए। आज भी यह लाल पत्थरों वाला अद्भुत मंदिर अपने गौरव को बयां करता हुआ अपने जीर्णोद्धार और गोविंददेव जी की प्रतीक्षा में धैर्यपूर्वक खड़ा है।

यहां पढ़ें कविता

"गोविंद चले आओ" 

एक मधुर मनोहर मूरत थी,
साँवरी सी एक सूरत थी,
घुंघराली लट, कुंडल की लटक,
वह मोरपंख, नयनन की मटक,
जरी की पगड़ी थी सिर पर,
गले में सुंदर माला थी,
हाथ में अद्भुत वंशी ,
और साथ में एक ब्रज-बाला थी,
माधव को ना देख सका,
ब्रजनाभ को बड़ी निराशा थी,
उनसा एक विग्रह बना सकूँ,
उसकी ऐसी अभिलाषा थी,

मूर्तिकला और चित्रकला का,
सुंदर स्वप्न साकार हुआ,
गोविंद-देव के भव्य रुप का,
आलौकिक आकार हुआ,
देख उत्तरा हुई अचम्भित,
आँखों में अश्रु-धार हुआ,
गोविंद थे बिल्कुल ऐसे ही,
मन से उसके उदगार हुआ,

गोविंद देव को साथ लिए,
ब्रजनाभ उठे ब्रजधाम चले,
उस जमुना के पावन तट पर,
जहां राधा से कभी श्याम मिले,
बृज-धूल लपेटे कलेवर में,
जहां देव सभी मिल जाते हैं,
धेनु चरावत वेणु बजावत,
जहाँ ब्रह्म सहज दिख जाते हैं,
गोविंद प्रतिष्ठित हुए वहीं,
जहां शिव भी गोपी-ग्वाल बने,
ब्रम्हा की सत्ता टिके नहीं,
और ब्रम्ह फिरें गोपाल बने,
सदियों तक गुप्त विराजे संग,
बहती जमुना के पानी के,
पुनः प्रकट हुए भक्ति से,
ब्रज के रूप गोस्वामी के,

दिल्ली में मुगल सल्तनत थी,
ब्रज में सत्ता योगेश्वर की,
थी देश में पूजा शक्ति की, 
यहां भक्ति थी परमेश्वर की,
गोविंद देव की महिमा का,
जब अकबर को संज्ञान हुआ,
सन था पन्द्रह सौ नब्बे वह,
जब उसका एक फरमान हुआ,
ढाई सौ बीघे भूमि का,
गोविंद देव को दान हुआ,
निर्माण का इसके केंद्र बिंदु,
जयपुर का राजा 'मान'हुआ,
और बनी इमारत भव्य एक,
जिस पर ब्रज को अभिमान हुआ

मैं लाल पत्थरों वाला था,
मद में अपने मतवाला था,
इस पूरे उत्तर भारत में,
कोई ना टिकने वाला था,
गोविंद देव थे मध्य भवन में,
पार्श्व में देवी वृंदा थी,
योगमाया की मधुर मूर्ति भी,
प्रांगण में मेरे जिंदा थी,
भित्ति-कला और शिल्प-कला का,
मैं आलौकिक संगम था,
मुझ जैसी दूजी वास्तुकला,
भारत में मिलना दुर्गम था,
मेरे शिखर के दीपक से,
आकाश लाल हो जाता था,
दिल्ली में बैठे आलमगीर का,
अभिमान चूर हो जाता था,

सन था सोलह सौ सत्तर वह,
औरंगजेब का पैगाम हुआ,
मंदिरों को तोड़े जाने का,
उसका अद्भुत फरमान हुआ,
मेरे सुंदर भव्य महल का,
देश में जब गुणगान हुआ,
दिल्ली के शासक को मुझसे,
खुद ही अपना अपमान हुआ,
कई प्रहार हुए मुझ पर,
मेरे निशान मिटाने को,
शिखर को मेरे तोड़ दिया,
मेरा अभिमान झुकाने को,
गोविंद चले गए ब्रज से,
भक्तों का मान निभाने को,
जयपुर के उस राजमहल में,
उनका सम्मान बढ़ाने को,

मैं डटा रहा, मैं टिका रहा,
अब भी खुद पर इतराता हूँ,
हाँ शिखर है मेरा तोड़ दिया,
पर अपनी गौरव गाथा हूँ,
कई शताब्दियाँ बीत गईं,
एक छोटी सी अभिलाषा में,
कोई तो मुझे सँवारेगा,
ऐसी ही एक आशा में,
कब गोविंद यहां फिर आएंगे,
मनभावन वेणु बजाने को,
बरसाने वाली राधा संग,
फिर से रस बरसाने को,
इन लाल पत्थरों की भाषा,
जग को फिर से समझाने को,
इन महलों की यशगाथा को,
फिर से जीवंत बनाने को,

रसराज कहो, ब्रजराज कहो,
हे रसिकों के सरताज कहो,
मैं आज मांगता हूं उत्तर,
हे जयपुर के महाराज कहो,
कब मेरे मस्तक पर चमकेगा,
दीपक का फिर ताज कहो,
कब मेरे भव्य शिखर पर होगा,
भारत को फिर नाज कहो,

मैं घिरा हुआ हूँ कलयुग से,
तुम अपना द्वापर ले आओ,
इन लाल पत्थरों की रंगत,
फिर से मुझको लौटाओ,
कालिंदी खुद है डूब रही,
कुछ इसको भी तो सुलझाओ,
ब्रज तुम्हें बुलाता है फिर से,
ब्रजराज चले आओ,
हे मुरलीधर माधव,
आनन्द चले आओ,
गोपाल चले आओ फिर से,
..गोविंद चले आओ..
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed