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स्कूलों में पढ़ाया जाए ‘गिरमिटिया’ का संघर्ष
ब्यूरो अमर उजाला, आगरा
Updated Wed, 06 Jan 2016 02:12 AM IST
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ब्रिटिश हुकूमत में दूसरे देशों को मजदूरी के लिए जबरन भेजे गए लोगों ने जो संघर्ष किया, वह नई पीढ़ी को स्कूलों में पढ़ाया जाए। गिरमिटिया मजदूरों के संघर्ष और मेहनत से पाए मुकाम को नई पीढ़ी को जानने की जरूरत है।
गिरमिटिया मजदूरों के बच्चों को उत्तर प्रदेश के स्थानीय निवासियों की तरह की सुविधाएं देते हुए स्कूलों, कालेजों में एडमिशन दिया जाए और फिजी, कैरेबियाई देशों समेत सीधी फ्लाइट हो।
होटल आईटीसी मुगल में प्रवासी सम्मेलन के दूसरे दिन गिरमिटिया पर हुए सत्र में वक्ताओं ने यह मांगें उठाईं। मारीशस के राजदूत जे गोवर्धन ने हिंदी में संबोधन दिया। कहा कि यूपी ने भोजपुरी एकेडमी खोलकर नया रास्ता दिखाया है। दुनिया भर के 20 करोड़ भोजपुरीभाषी लोगों को अपने वतन के लिए काम करना चाहिए। भोजपुरी भाषी लोग मारीशस को बना सकते हैं तो अपना राज्य क्यों नहीं संवार सकते। जहां गाय है, वहां गरीबी नहीं हो सकती। गुजरात, तमिल की तरह अपने बच्चों को भोजपुरी पढ़ाएं। इग्नू के प्रो. कपिल कुमार ने कहा कि 50 हजार सिपाहियों को गिरमिटिया बनाकर भेजा गया। इतिहासकारों ने इस पर कुछ नहीं लिखा। ट्रिनिडाड एंड टोबेगो के पूर्व प्रधानमंत्री बासदेव पांडेय ने कहा कि वह अपने गांव में लड़कियों के लिए स्कूल खोलना चाहते हैं। आस्ट्रेलिया के सतीश चंद्र राय ने कहा कि वह गिरमिटिया के शोषण पर फिल्म बना रहे हैं।
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प्रमुख सचिव संजीव शरन ने कहा कि दूसरे देश जाकर अपना मुकाम बनाने वाले गिरमिटिया के साथ सांस्कृतिक आदान प्रदान कराने का प्रयास होगा।
पूर्व प्रधानमंत्री बीच सत्र में किए शामिल
आगरा। ट्रिनिडाड एंड टोबेगो के पूर्व प्रधानमंत्री बासदेव पांडेय गिरमिटिया मजदूरों पर हुए सत्र में मंच पर नहीं थे। यहां तक कि पैनल में भी उनका नाम नहीं था। दर्शक दीर्घा में बैठे होने पर उन्हें बीच सत्र में मंच पर जगह दी गई।
कौन हैं गिरमिटिया
अंग्रेजी हुकूमत में गरीब लोगों को गुलामी की शर्त पर विदेश भेजा गया। 1820 से 1917 तक अंग्रेजों ने मजदूरों को एग्रीमेंट करके विदेश भेजा। इसी एग्रीमेंट शब्द का अपभ्रंश होकर गिरमिटिया हो गया। दक्षिण अफ्रीका, फिजी, ब्रिटिश गुयाना, ट्रिनिडाड एंड टोबेगो, नटाल में हजारों गिरमिटिया मजदूर भेजे गए। महात्मा गांधी के आंदोलन के बाद 1917 में इसे निषेध किया गया।
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गिरमिटिया मजदूरों के बच्चों को उत्तर प्रदेश के स्थानीय निवासियों की तरह की सुविधाएं देते हुए स्कूलों, कालेजों में एडमिशन दिया जाए और फिजी, कैरेबियाई देशों समेत सीधी फ्लाइट हो।
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होटल आईटीसी मुगल में प्रवासी सम्मेलन के दूसरे दिन गिरमिटिया पर हुए सत्र में वक्ताओं ने यह मांगें उठाईं। मारीशस के राजदूत जे गोवर्धन ने हिंदी में संबोधन दिया। कहा कि यूपी ने भोजपुरी एकेडमी खोलकर नया रास्ता दिखाया है। दुनिया भर के 20 करोड़ भोजपुरीभाषी लोगों को अपने वतन के लिए काम करना चाहिए। भोजपुरी भाषी लोग मारीशस को बना सकते हैं तो अपना राज्य क्यों नहीं संवार सकते। जहां गाय है, वहां गरीबी नहीं हो सकती। गुजरात, तमिल की तरह अपने बच्चों को भोजपुरी पढ़ाएं। इग्नू के प्रो. कपिल कुमार ने कहा कि 50 हजार सिपाहियों को गिरमिटिया बनाकर भेजा गया। इतिहासकारों ने इस पर कुछ नहीं लिखा। ट्रिनिडाड एंड टोबेगो के पूर्व प्रधानमंत्री बासदेव पांडेय ने कहा कि वह अपने गांव में लड़कियों के लिए स्कूल खोलना चाहते हैं। आस्ट्रेलिया के सतीश चंद्र राय ने कहा कि वह गिरमिटिया के शोषण पर फिल्म बना रहे हैं।
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प्रमुख सचिव संजीव शरन ने कहा कि दूसरे देश जाकर अपना मुकाम बनाने वाले गिरमिटिया के साथ सांस्कृतिक आदान प्रदान कराने का प्रयास होगा।
पूर्व प्रधानमंत्री बीच सत्र में किए शामिल
आगरा। ट्रिनिडाड एंड टोबेगो के पूर्व प्रधानमंत्री बासदेव पांडेय गिरमिटिया मजदूरों पर हुए सत्र में मंच पर नहीं थे। यहां तक कि पैनल में भी उनका नाम नहीं था। दर्शक दीर्घा में बैठे होने पर उन्हें बीच सत्र में मंच पर जगह दी गई।
कौन हैं गिरमिटिया
अंग्रेजी हुकूमत में गरीब लोगों को गुलामी की शर्त पर विदेश भेजा गया। 1820 से 1917 तक अंग्रेजों ने मजदूरों को एग्रीमेंट करके विदेश भेजा। इसी एग्रीमेंट शब्द का अपभ्रंश होकर गिरमिटिया हो गया। दक्षिण अफ्रीका, फिजी, ब्रिटिश गुयाना, ट्रिनिडाड एंड टोबेगो, नटाल में हजारों गिरमिटिया मजदूर भेजे गए। महात्मा गांधी के आंदोलन के बाद 1917 में इसे निषेध किया गया।