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बागवानी : एटा के संतरे और मौसमी से महक रहे आंध्र-असम के बाग, पाकिस्तानी नींबू की विशेष मांग

Sat, 14 Aug 2021 10:09 AM IST
Abhishek Saxena न्यूज डेस्क, अमर उजाला, एटा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, एटा Published by: Abhishek Saxena Updated Sat, 14 Aug 2021 10:09 AM IST
सार

पौध तैयार होने के बाद इन्हें ट्रकों के जरिए प्रदेश के कुछ जिलों के अलावा आंध्र प्रदेश, असम, पंजाब में भेजा जाता है। गांव वाले बताते हैं कि मुख्य रूप से यह काम महाराष्ट्र में होता है, लेकिन वहां पौध महंगी होने की वजह से हमारे यहां मांग बढ़ी है।

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Andhra-Assam orchards smelling of orange and seasonal of Etah
पौध तैयार करते किसान - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भले ही एटा में संतरा और मौसमी जैसे फलों की पैदावार नहीं होती लेकिन यहां तैयार किए जा रहे पौधों की खुशबू से आंध्र प्रदेश, असम तक के बाग महक रहे हैं। जलेसर तहसील क्षेत्र के तीन गांव में नर्सरी फल-फूल रही है। जहां हिमाचल प्रदेश से बीज लाकर लोग पौध तैयार करते हैं जिन्हें प्रदेश के कुछ जिलों और अन्य प्रांतों में भेजा जाता है। 

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जलेसर क्षेत्र के गांव मनीगढ़ी, पायदापुर और कोठी में नर्सरी का यह कारोबार सैकड़ों बीघा खेतों में फैल गया है। करीब 60 नर्सरी संचालित की जा रही हैं, जिनसे सैकड़ों लोग जुड़े हुए हैं। ये लोग खट्टा का बीज हिमाचल प्रदेश से खरीदकर लाते हैं। जिसकी यहां पौध करने के बाद उस पर संतरा, मौसमी, किन्नू और नींबू की क्राफ्टिंग की जाती है। इस पौध को तैयार होने में दो से ढाई साल का वक्त लगता है। पौध तैयार होने के बाद इन्हें ट्रकों के जरिए प्रदेश के कुछ जिलों के अलावा आंध्र प्रदेश, असम, पंजाब में भेजा जाता है। गांव वाले बताते हैं कि मुख्य रूप से यह काम महाराष्ट्र में होता है, लेकिन वहां पौध महंगी होने की वजह से हमारे यहां मांग बढ़ी है।
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पाकिस्तानी नींबू की विशेष मांग
संतरा, मौसमी, किन्नू के अलावा यहां तैयार हो रहे पाकिस्तानी नींबू के पौधे की विशेष मांग है। बागवान कृपाल सिंह बताते हैं कि करीब तीन साल पहले यह काम शुरू किया। इस पौधे की खासियत यह है कि डेढ़-दो महीने में ही फल देना शुरू कर देता है। छोटे पौधे पर उत्पादन भी ज्यादा मिलता है। जबकि देसी पौधे पर फल आने में ढाई-तीन साल का समय लगता है।

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पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ रहा हुनर
नर्सरी के काम में जुटे गांव वालों को यह नहीं पता कि यह काम कब और कैसे शुरू हुआ। पीढ़ी दर पीढ़ी यह हुनर आगे बढ़ता जा रहा है। उन्होंने इसके लिए कोई प्रशिक्षण नहीं लिया। बाप-दादा के साथ काम में जुटकर सीख गए। अब अगली पीढ़ियों को सिखा रहे हैं।

बोले बागवान
पारंपरिक फसलों की खेती के मुकाबले नर्सरी तैयार करने में अधिक मुनाफा है। इनकी मांग कई जिलों और प्रदेशों में है। - कृपाल सिंह, मनीगढ़ी

लंबे समय से इस क्षेत्र में संतरा, मौसमी आदि फलों की पौध तैयार की जा रही है। बाहरी जिलों और प्रांतों को पौध भेजी जाती है।- सोनप्रताप, मनीगढ़ी

इस क्षेत्र में बलुई दोमट मिट्टी है, जो नींबू वर्गीय पौधों के लिए काफी अनुकूल है। साथ ही वहां पानी का अच्छा साधन उपलब्ध है। दशकों से इन गांव में नर्सरी का काम किया जा रहा है। -डॉ. वीरेंद्र सिंह, उद्यान विज्ञान विशेषज्ञ, कृषि विज्ञान केंद्र, अवागढ़

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