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यूपी: फर्जी फैसले से बरी कराने के मामले में नया मोड़, लिपिक समेत पांच की सजा निरस्त; दोबारा चलेगा मुकदमा

Fri, 16 Oct 2026 11:24 AM IST
Dhirendra Singh अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा Published by: Dhirendra Singh Updated Fri, 16 Oct 2026 11:24 AM IST
सार

आगरा में कथित फर्जी फैसले की नकल लगाकर चार आरोपियों को बरी कराने के मामले में सत्र न्यायालय ने तत्कालीन लिपिक समेत पांच लोगों की पांच-पांच साल की सजा निरस्त कर दी है। अभियोजन की जांच और साक्ष्यों में गंभीर कमियां पाते हुए अदालत ने मुकदमे की दोबारा सुनवाई के आदेश दिए हैं।
 

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Agra Court Sets Aside Sentences of Five in Fake Judgment Case, Orders Retrial
court new - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अदालत के रिकॉर्ड में फर्जी फैसले की नकल लगाकर आरोपियों को बरी कराने के मामले में लिपिक सहित पांच लोगों को हुई सजा को सत्र न्यायालय एडीजे-4 पवन कुमार श्रीवास्तव ने निरस्त कर दिया। अभियोजन की जांच और साक्ष्य जुटाने में गंभीर कमियां पाते हुए मुकदमे की फिर सुनवाई के आदेश दिए गए हैं।
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शाहगंज क्षेत्र के पथौली निवासी कुशल सिंह खिरवार ने आरोप लगाया कि उनके पिता ने वर्ष 2004 में अशोक सिंह, लवकेश सिंह, मीरा देवी और आशा देवी के खिलाफ मारपीट का मामला दर्ज कराया था। सजा होने की आशंका के चलते चारों ने न्यायालय के तत्कालीन लिपिक पवन अग्रवाल के साथ मिलकर 11 अप्रैल 2013 का कथित फर्जी फैसला तैयार कराया, जिसमें उन्हें बरी दिखाया गया।
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शिकायत के बाद विभागीय जांच हुई और पवन अग्रवाल को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। इसके बाद न्यू आगरा थाने में वर्ष 2015 में प्राथमिकी दर्ज हुई। जिसमें एसीजेएम-2 ने धोखाधड़ी व अन्य आरोपों 12 अगस्त, 2024 को सभी को 5-5 साल की सजा सुनाई। आरोपियों ने आदेश के खिलाफ सत्र न्यायालय में अपील की।
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अभियोजन की कमियों पर उठे सवाल
अपर सत्र न्यायालय ने पाया कि कथित फर्जी फैसले पर हस्ताक्षरों की जांच के लिए हस्तलेख विशेषज्ञ या विधि विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल) की मदद नहीं ली गई। कथित फर्जी फैसले का मूल दस्तावेज भी विचारण न्यायालय में पेश नहीं किया गया। अभियोजन ने मुख्य रूप से विभागीय जांच रिपोर्ट पर भरोसा किया, जबकि विभागीय जांच में बयान देने वाले संबंधित गवाहों को आपराधिक मुकदमे में प्रस्तुत नहीं किया गया। न्यायालय के स्टेनोग्राफर अनिल कुमार शर्मा ने गवाही में कहा था कि कथित फैसला न तो उन्होंने टाइप किया था और न ही वह उनके कंप्यूटर के प्रारूप में था। उन्होंने यह नहीं बताया कि फैसला किसने तैयार किया था। अभियोजन के किसी गवाह ने भी आरोपियों को कथित फर्जी फैसला तैयार करते हुए देखने की बात नहीं कही।


दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त साक्ष्य जरूरी
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल विभागीय जांच रिपोर्ट या न्यायालय के रिकॉर्ड की जिम्मेदारी होने से किसी व्यक्ति का आपराधिक अपराध सिद्ध नहीं हो जाता। अभियोजन को आरोपों को साबित करने के लिए विधिसम्मत और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे। निचली अदालत ने पांचों आरोपियों को धोखाधड़ी, कूटरचना और आपराधिक साजिश समेत विभिन्न धाराओं में दोषी ठहराकर सजा सुनाई थी।
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