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दौड़े जिंदगी के लिए, भेंट हुई मौत
Agra
Updated Mon, 26 May 2014 05:30 AM IST
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ऊंचे-नीचे टीलों पर आबाद गांव बसई गुर्जर में अग्निकांड से हर तरफ तबाही का मंजर है तो एक ही परिवार के छह लोगों की मौत से कोहराम। हीरालाल के घर में मरघट सा सन्नाटा। आंगन से कमरे तक गेहूं फैला हुआ था। गेहूं के ऊपर बिछी सूरजभान की पत्नी रामबेटी की चारपाई के सिर्फ पाये ही दिखाई दे रहे थे। आंगन में अनाज की बोरियों के ऊपर दीवार में गौरय्ये के घरौंदे भी आग से नहीं बचे। वह अपने घरौंदे के चक्कर लगाते नजर आई। एक ओर मिट्टी के चूल्हे के पास जले हुए बर्तन पड़े थे। घर के मुखिया सूरजभान बेसुध थे। अब उनके बुढ़ापे का सहारा छोटा बेटा नहना ही बचा है।
पिनाहट। मौत हीरालाल के परिवार को कमरे में खींच ले गई। आग की लपटों से घिरे घर में पक्के कमरे को सुरक्षित मानकर हीरालाल अपनी मां, पत्नी और तीन बच्चों को लेकर कमरे में बंद हो गया। उसने कुंडी लगा ली। बरामदे में रखी उसकी मोटरसाइकिल में आग लगी तो तेज आवाज के साथ टंकी में विस्फोट से टिनशेड भी टुकड़े-टुकड़े हो गए। इस पर तीनों बच्चों को उसने बेड के नीचे लिटा दिया, लेकिन तीनों मासूमों का धुएं से दम घुट गया। बचाव में लगे ग्रामीणों को भी पूरे परिवार के कमरे में बंद होने की जानकारी नहीं थी।
बसई गुर्जर में हीरालाल के पूरे घर में गेहूं बिखरे हुए थे। ग्रामीणों ने बताया कि घटना के वक्त रात तकरीबन साढ़े दस बजे हीरालाल, उसकी पत्नी बबीता और दोनों बच्चे नितिन व काजल, भांजी रेनू बाहर झोपड़ी में सोए हुए थे। तार टूटकर गिरने के बाद आग तेजी से फैलने लगी। आग सबसे पहले हीरालाल के आंगन में रखे गेहूं के बोरों में लगी। इसके बाद लपटें बरामदे तक पहुंच गईं। बरामदे में टिनशेड पड़ा था। यहां उसकी मां रामबेटी सो रही थीं। बरामदे में भी बोरियों में गेहूं रखा था। लपटें तेज होने पर हीरालाल मां को भी अंदर कमरे में ले गया। दरवाजे को बंद कर लिया। तभी तेज आवाज के साथ दरवाजे के पास ही खड़ी मोटरसाइकिल की टंकी में धमाका हुआ। इसके बाद आग तेजी से फैलने लगी। टिनशेड भी टुकड़ों में बंट गया। लपटें कमरे तक पहुंच गई। लोगों का कहना था कि आग की लपटों के बीच कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। उन्होंने समझा कि हीरालाल ने शायद बच्चों को बाहर निकाल दिया है, लेकिन हीरालाल परिवार को लेकर कमरे में बैठा था। बच्चों को बचाने के लिए उन्हें सिगिंल बेड के नीचे लिटा दिया, लेकिन मौत ने उन्हें यहां भी नहीं छोड़ा। आग की लपटों के साथ ही कमरे में धुआं भर गया। तीनों बच्चों के शरीर पर झुलसने के निशान नहीं थे। पुलिस का कहना है कि बच्चों की मौत दम घुटने से हुई, जबकि हीरालाल, उसकी पत्नी बबीता, मां रामबेटी झुलस गए थे।
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काश! हम बचा पाते
गांव के रामधनी, लोकमन, अशोक शर्मा सबकी जुबां पर एक ही बात थी, काश! हम हीरालाल के परिवार को बचा पाते। ग्रामीणों का कहना था कि लपटों ने एक के बाद कई घरों को चपेट में ले लिया। इससे ग्रामीण दहशत में आ गए थे। इसके बाद भी सबमर्सिबल पंप चलाकर आग बुझाने में लगे रहे थे। उन्हें जरा भी अहसास होता कि हीरालाल कमरे में बंद है तो सबसे पहले उन्हें निकालते। लेकिन जब तक दरवाजा तोड़ा तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
जलने से बचा मंदिर
हीरालाल के कमरे में टांड़ और लोहे की अलमारी पर रखे बिस्तर भी जल गए। लेकिन कमरे के बीच में बना भगवान का मंदिर सुरक्षित था। इस मंदिर के आले में रखीं भगवान की कागज की तस्वीरें भी सुरक्षित थीं।
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पिनाहट। मौत हीरालाल के परिवार को कमरे में खींच ले गई। आग की लपटों से घिरे घर में पक्के कमरे को सुरक्षित मानकर हीरालाल अपनी मां, पत्नी और तीन बच्चों को लेकर कमरे में बंद हो गया। उसने कुंडी लगा ली। बरामदे में रखी उसकी मोटरसाइकिल में आग लगी तो तेज आवाज के साथ टंकी में विस्फोट से टिनशेड भी टुकड़े-टुकड़े हो गए। इस पर तीनों बच्चों को उसने बेड के नीचे लिटा दिया, लेकिन तीनों मासूमों का धुएं से दम घुट गया। बचाव में लगे ग्रामीणों को भी पूरे परिवार के कमरे में बंद होने की जानकारी नहीं थी।
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बसई गुर्जर में हीरालाल के पूरे घर में गेहूं बिखरे हुए थे। ग्रामीणों ने बताया कि घटना के वक्त रात तकरीबन साढ़े दस बजे हीरालाल, उसकी पत्नी बबीता और दोनों बच्चे नितिन व काजल, भांजी रेनू बाहर झोपड़ी में सोए हुए थे। तार टूटकर गिरने के बाद आग तेजी से फैलने लगी। आग सबसे पहले हीरालाल के आंगन में रखे गेहूं के बोरों में लगी। इसके बाद लपटें बरामदे तक पहुंच गईं। बरामदे में टिनशेड पड़ा था। यहां उसकी मां रामबेटी सो रही थीं। बरामदे में भी बोरियों में गेहूं रखा था। लपटें तेज होने पर हीरालाल मां को भी अंदर कमरे में ले गया। दरवाजे को बंद कर लिया। तभी तेज आवाज के साथ दरवाजे के पास ही खड़ी मोटरसाइकिल की टंकी में धमाका हुआ। इसके बाद आग तेजी से फैलने लगी। टिनशेड भी टुकड़ों में बंट गया। लपटें कमरे तक पहुंच गई। लोगों का कहना था कि आग की लपटों के बीच कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। उन्होंने समझा कि हीरालाल ने शायद बच्चों को बाहर निकाल दिया है, लेकिन हीरालाल परिवार को लेकर कमरे में बैठा था। बच्चों को बचाने के लिए उन्हें सिगिंल बेड के नीचे लिटा दिया, लेकिन मौत ने उन्हें यहां भी नहीं छोड़ा। आग की लपटों के साथ ही कमरे में धुआं भर गया। तीनों बच्चों के शरीर पर झुलसने के निशान नहीं थे। पुलिस का कहना है कि बच्चों की मौत दम घुटने से हुई, जबकि हीरालाल, उसकी पत्नी बबीता, मां रामबेटी झुलस गए थे।
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काश! हम बचा पाते
गांव के रामधनी, लोकमन, अशोक शर्मा सबकी जुबां पर एक ही बात थी, काश! हम हीरालाल के परिवार को बचा पाते। ग्रामीणों का कहना था कि लपटों ने एक के बाद कई घरों को चपेट में ले लिया। इससे ग्रामीण दहशत में आ गए थे। इसके बाद भी सबमर्सिबल पंप चलाकर आग बुझाने में लगे रहे थे। उन्हें जरा भी अहसास होता कि हीरालाल कमरे में बंद है तो सबसे पहले उन्हें निकालते। लेकिन जब तक दरवाजा तोड़ा तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
जलने से बचा मंदिर
हीरालाल के कमरे में टांड़ और लोहे की अलमारी पर रखे बिस्तर भी जल गए। लेकिन कमरे के बीच में बना भगवान का मंदिर सुरक्षित था। इस मंदिर के आले में रखीं भगवान की कागज की तस्वीरें भी सुरक्षित थीं।