{"_id":"5ab263fb4f1c1b8f778b6b2d","slug":"91521640443-agra-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"कंस का महल हुआ करता था कंस किला","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
कंस का महल हुआ करता था कंस किला
Updated Wed, 21 Mar 2018 07:37 PM IST
विज्ञापन
कंस का किला
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
मथुरा। कहते हैं कि यमुना के उत्तरी तट स्थित कंस किला ही कंस का महल हुआ करता था। इसी किले की विशाल दीवारें यमुना जल की लहरों से शहर को बचाती थीं। बाद में कंस किले पर ही महाराजा सवाई जयसिंह ने ग्रह-नक्षत्रों का अध्ययन करने के लिए वेधशाला का निर्माण कराया था। खंडहर हो चुका यह किला आज भी शहर की पहचान है।
कहते हैं कि मथुरा में यमुना नदी के उत्तरी तट पर बने कंस किले में सभी प्रकार की सुख सुविधाएं मौजूद थीं। किले का स्वरूप बताता है कि कभी यह भव्य और विशाल हुआ करता था। विशाल क्षेत्र में फैले इस किले की दीवार काफी लंबी और चौड़ी हैं। दीवारें इतनी मजबूत थीं कि इन्हें तोड़ पाना संभव नहीं था। सुरक्षा के लिहाज से कई रास्ते इस तरह से बनाए गए जो भूमिगत होकर यमुना में निकल जाते हैं। माना जा रहा है कि इन्हीं रास्तों का प्रयोग कंस और कंस के परिवार वाले यमुना तक पहुंचने में किया करते होंगे।
राजकीय संग्रहालय के डिप्टी डायरेक्टर एसपी सिंह बताते हैं कि इस किले पर बनी आकृतियां हिंदू और मुस्लिम शासकों के प्रभाव को भी प्रदर्शित करती हैं। वास्तुकला का यह बेहतरीन नमूना है। इसका वर्तमान स्वरूप 16वीं शताब्दी में राजा मान सिंह ने तैयार कराया था। महाराजा सवाई जयसिंह ने इसी किले में ग्रह-नक्षत्रों के अध्ययन के लिए वेधशाला (जंतर-मंतर) का निर्माण कराया। जिसके अब यहां चंद अवशेष ही मौजूद हैं। यह वेधशालाएं मथुरा के अलावा अजमेर, कांशी, जयपुर, दिल्ली में बनवाई गई थीं। इसमें से अब सिर्फ जयपुर और दिल्ली में ही मौजूद हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
कहते हैं कि मथुरा में यमुना नदी के उत्तरी तट पर बने कंस किले में सभी प्रकार की सुख सुविधाएं मौजूद थीं। किले का स्वरूप बताता है कि कभी यह भव्य और विशाल हुआ करता था। विशाल क्षेत्र में फैले इस किले की दीवार काफी लंबी और चौड़ी हैं। दीवारें इतनी मजबूत थीं कि इन्हें तोड़ पाना संभव नहीं था। सुरक्षा के लिहाज से कई रास्ते इस तरह से बनाए गए जो भूमिगत होकर यमुना में निकल जाते हैं। माना जा रहा है कि इन्हीं रास्तों का प्रयोग कंस और कंस के परिवार वाले यमुना तक पहुंचने में किया करते होंगे।
विज्ञापन
राजकीय संग्रहालय के डिप्टी डायरेक्टर एसपी सिंह बताते हैं कि इस किले पर बनी आकृतियां हिंदू और मुस्लिम शासकों के प्रभाव को भी प्रदर्शित करती हैं। वास्तुकला का यह बेहतरीन नमूना है। इसका वर्तमान स्वरूप 16वीं शताब्दी में राजा मान सिंह ने तैयार कराया था। महाराजा सवाई जयसिंह ने इसी किले में ग्रह-नक्षत्रों के अध्ययन के लिए वेधशाला (जंतर-मंतर) का निर्माण कराया। जिसके अब यहां चंद अवशेष ही मौजूद हैं। यह वेधशालाएं मथुरा के अलावा अजमेर, कांशी, जयपुर, दिल्ली में बनवाई गई थीं। इसमें से अब सिर्फ जयपुर और दिल्ली में ही मौजूद हैं।
विज्ञापन