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558 वर्ष पूर्व सूकर क्षेत्र की यात्रा पर आए थे चैतन्य महाप्रभु
Updated Thu, 31 Aug 2017 11:41 PM IST
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सोरों में स्थित चैतन्य महाप्रभु की चरण पादुका।
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सोरों।
558 वर्ष पूर्व संवत 1516 में चैतन्य महाप्रभु ने सूकर क्षेत्र की यात्रा करके भगवान वराह की अराधना की और उनके दिव्य स्वरूप के दर्शन प्राप्त किए। उन्होंने सूकर क्षेत्र में वैष्णव धर्म के उद्देश्य देकर सूकर क्षेत्र के श्रद्धालुओं के कल्याण की कामना की।
सूकर क्षेत्र के पौराणिक इतिहास में उनकी यात्रा के संदर्भ दर्ज हैं। चैतन्य महाप्रभु ने एक माह तक यहां निवास किया। गंगा स्नान करके वे नित्य प्रति संकीर्तन करते थे और बड़ी संख्या में श्रद्धालु उनके कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे। चैतन्य महाप्रभु की अलौकिक क्षमता से प्रभावित होकर सूकर क्षेत्र के ही एक बिजली खान नामक पठान ने वैष्णव धर्म की दीक्षा ली। जिस स्थान पर चैतन्य प्रभु ने प्रवास किया एवं प्रवचन दिए उस स्थान पर गौडीय संप्रदाय के संतों ने श्याम वराह मंदिर स्थापित किया।
इस मंदिर में श्याम वराह की अलौकिक मूर्ति एवं देवी लक्ष्मी, योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण,भगवान नरसिंह की सुंदर प्रतिमाएं स्थापित हैं। मंदिर परिसर में ही चैतन्य महाप्रभु के चरणपादुका चिन्ह हैं। गौडीय संप्रदाय से जुड़े संतों का यहां आवागमन रहता है। इस मंदिर में देश के विभिन्न राज्यों के संतों का आवागमन रहता है। ये संत नित्य प्रति संकीर्तन, नृत्य करते हैं। मार्गशीर्ष मास की द्वादशी को भगवान वराह की भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। इसमें संत जनों के अलावा श्रद्धालु हिस्सा लेते हैं। चैतन्य महाप्रभु के सोरों आगमन का इतिहास चैतन्य चरित्रामृत में दर्ज है। इसमें सोरों के महत्व की उल्लेखनीय चर्चा है।
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558 वर्ष पूर्व संवत 1516 में चैतन्य महाप्रभु ने सूकर क्षेत्र की यात्रा करके भगवान वराह की अराधना की और उनके दिव्य स्वरूप के दर्शन प्राप्त किए। उन्होंने सूकर क्षेत्र में वैष्णव धर्म के उद्देश्य देकर सूकर क्षेत्र के श्रद्धालुओं के कल्याण की कामना की।
सूकर क्षेत्र के पौराणिक इतिहास में उनकी यात्रा के संदर्भ दर्ज हैं। चैतन्य महाप्रभु ने एक माह तक यहां निवास किया। गंगा स्नान करके वे नित्य प्रति संकीर्तन करते थे और बड़ी संख्या में श्रद्धालु उनके कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे। चैतन्य महाप्रभु की अलौकिक क्षमता से प्रभावित होकर सूकर क्षेत्र के ही एक बिजली खान नामक पठान ने वैष्णव धर्म की दीक्षा ली। जिस स्थान पर चैतन्य प्रभु ने प्रवास किया एवं प्रवचन दिए उस स्थान पर गौडीय संप्रदाय के संतों ने श्याम वराह मंदिर स्थापित किया।
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इस मंदिर में श्याम वराह की अलौकिक मूर्ति एवं देवी लक्ष्मी, योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण,भगवान नरसिंह की सुंदर प्रतिमाएं स्थापित हैं। मंदिर परिसर में ही चैतन्य महाप्रभु के चरणपादुका चिन्ह हैं। गौडीय संप्रदाय से जुड़े संतों का यहां आवागमन रहता है। इस मंदिर में देश के विभिन्न राज्यों के संतों का आवागमन रहता है। ये संत नित्य प्रति संकीर्तन, नृत्य करते हैं। मार्गशीर्ष मास की द्वादशी को भगवान वराह की भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। इसमें संत जनों के अलावा श्रद्धालु हिस्सा लेते हैं। चैतन्य महाप्रभु के सोरों आगमन का इतिहास चैतन्य चरित्रामृत में दर्ज है। इसमें सोरों के महत्व की उल्लेखनीय चर्चा है।
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