{"_id":"5942c16e4f1c1b14758b45a8","slug":"41497547118-agra-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"पहली बार सोने के पालना में विराजे द्वारिकाधीश","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पहली बार सोने के पालना में विराजे द्वारिकाधीश
Updated Thu, 15 Jun 2017 11:38 PM IST
विज्ञापन
सोने का पालना
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
मथुरा। ठाकुर द्वारिकाधीश गुुरुवार को पहली बार सोने के पालने में विराजे। भक्तों ने तो खूब जय-जयकार की। दर्शनों को श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। शहनाई भी बजाई गई। अभी तक भगवान द्वारिकाधीश मंदिर में चांदी के पालना में दर्शन देते थे।
गुरुवार को मंदिर के सेवायत कांकरौली नरेश ब्रजेश कुमार और वागीश कुमार ने भगवान को सोने का पालना भेंट किया। पूरे विधि विधान के बीच ठाकुर जी पालने में विराजमान हुए। इस दौरान भजन कीर्तन होते रहे।
खूब जयकारे गूंजे। पुष्प वर्षा हुई। पालना मनोरथ कराया गया। गुरुवार सुबह 8:30 बजे ठाकुर द्वारिकाधीश ने सोने के पालने में विराज भक्तों को दर्शन दिए।
पुष्टमार्गीय शैली में बना है पालना
ठाकुर द्वारिकाधीश के लिए बनाया गया सोने का पलना पुष्टमार्गीय संप्रदाय शैली में बनाया गया है। पालना के चारों पायों पर हाथी, गाय, शेर और मोर के पैरों के निशान हैं।
विज्ञापन
कांकरौली नरेश ब्रजेश कुमार ने बताया कि पुष्टमार्गीय शैली में खटोला की आकृति में बने सोने के पालना में विशेष प्रकार की कारीगरी की गई है।
ग्वालियर के सेठ को खुदाई में मिला था विग्रह
द्वारिकाधीश प्रभु का विग्रह ग्वालियर निवासी सेठ पारिख को खोदाई में मिला था। अगले दिन सेठ को ठाकुर जी ने ब्रज में विराजमान होने की सपने में इच्छा जताई।
सेठ ठाकुर जी लेकर ब्रज में आए और राजपुर बांगर स्थित बगीचे में विराजमान करा दिया।
बाद में ठाकुर जी के लिए सेठ पारिख ने द्वारिकाधीश का मंदिर बनवाया। मीडिया प्रभारी राकेश तिवारी ने बताया कि मंदिर 250 साल पुराना है।
विज्ञापन
गुरुवार को मंदिर के सेवायत कांकरौली नरेश ब्रजेश कुमार और वागीश कुमार ने भगवान को सोने का पालना भेंट किया। पूरे विधि विधान के बीच ठाकुर जी पालने में विराजमान हुए। इस दौरान भजन कीर्तन होते रहे।
विज्ञापन
खूब जयकारे गूंजे। पुष्प वर्षा हुई। पालना मनोरथ कराया गया। गुरुवार सुबह 8:30 बजे ठाकुर द्वारिकाधीश ने सोने के पालने में विराज भक्तों को दर्शन दिए।
पुष्टमार्गीय शैली में बना है पालना
ठाकुर द्वारिकाधीश के लिए बनाया गया सोने का पलना पुष्टमार्गीय संप्रदाय शैली में बनाया गया है। पालना के चारों पायों पर हाथी, गाय, शेर और मोर के पैरों के निशान हैं।
विज्ञापन
कांकरौली नरेश ब्रजेश कुमार ने बताया कि पुष्टमार्गीय शैली में खटोला की आकृति में बने सोने के पालना में विशेष प्रकार की कारीगरी की गई है।
ग्वालियर के सेठ को खुदाई में मिला था विग्रह
द्वारिकाधीश प्रभु का विग्रह ग्वालियर निवासी सेठ पारिख को खोदाई में मिला था। अगले दिन सेठ को ठाकुर जी ने ब्रज में विराजमान होने की सपने में इच्छा जताई।
सेठ ठाकुर जी लेकर ब्रज में आए और राजपुर बांगर स्थित बगीचे में विराजमान करा दिया।
बाद में ठाकुर जी के लिए सेठ पारिख ने द्वारिकाधीश का मंदिर बनवाया। मीडिया प्रभारी राकेश तिवारी ने बताया कि मंदिर 250 साल पुराना है।