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संसाधनों के अभाव में बढ़ रहा मौतों का ग्राफ
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घायलों को ले जाती एंबुलेंस
- फोटो : अमर उजाला
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एटा। मां बनना हर महिला की तमन्ना होती है। हर महिला चाहती है कि उसके आंगन में किलकारियां गूंजे, लेकिन जिले में सैकड़ों महिलाएं मां बनने से पहले ही अपनी जान गवां देती हैं। जिले में दो महीने में नौ महिलाएं प्रसव के दौरान दम तोड़ चुकी हैं। जबकि पिछले साल 71 महिलाओं की जिंदगी असुरक्षित प्रसव के चलते खत्म हो गई। स्वास्थ्य विभाग के इंतजामों का आलम यह है कि महिलाओं को प्रसव के दौरान पूरा इलाज नहीं मिल पाता और वह मौत का शिकार होती हैं।
जिले में आए दिन प्रसव के दौरान महिलाओं की मौतें हो रही हैं। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह झोलाछापों की बाढ़ और संसाधनों का अभाव है। हर वर्ष संतान सुख पाने की चाहत में माताओं की जिंदगीं खतरे में पड़ रही है। स्वास्थ्य विभाग का दावा है कि वह मातृ मृत्यु दर को कम करने के भरसक प्रयास कर रहा है, लेकिन विभाग की नीतियां धरातल पर नहीं दिखाई देतीं। अगर जिले में बीती वर्ष हुई मौतों की बात करें तो रोकथाम की कवायदें फेल नजर आती हैं।
वर्ष 2018 में जिले भर में 71 माताओं ने संतान सुख की लालसा में जिंदगी छोड़ दी। अधिकारियों का कहना है कि 2018 में कम मौतें हुई हैं। एक वर्ष में 30 महिलाओं की मौत में गिरावट आई हैं, लेकिन महज दलीलों से किसी की जिंदगी वापस नहीं लौटती।
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विभाग की उदासीनता बड़ा कारण
मातृ मृत्यु दर बढ़ने के पीछे का बड़ा कारण विभागीय उदासीनता है। सभी स्वास्थ्य केंद्रों पर प्रशिक्षित और कुशल डाक्टर नहीं हैं। साथ ही तमाम केंद्रों पर प्रसव के इंतजाम नहीं हैं। इसके साथ ही लोगों को जागरूक करने के प्रयास भी ठंडे पड़े हैं।
झोलाछापों के यहां प्रसव की बाढ़
जिले मेें झोलाछापों के यहां प्रसव की बाढ़ हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो मई में गैर प्राधिकृत चिकित्सालयों में कुल 6029 प्रसव हुए हैं। जबकि सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर महज 2030 प्रसव ही हो सके। ऐसे में साफ है कि झोलाछापों के आगे स्वास्थ्य विभाग फेल है।
कहते हैं आंकड़े
09 प्रसूताओं की मौत हुई दो महीने में
71 प्रसूताओं की मौत हुई साल 2018 में
101 प्रसूताओं की मौत हुई 2017 में
115 प्रसूताओं की मौत हुई 2016 में
6029 प्रसव हुए झोलाछापों के यहां
182 स्वास्थ्य उपकेंद्र हैं जिले में
इनका कहना है
मातृ मृत्यु दर को कम करने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। हर स्वास्थ्य उपकेंद्र पर प्रसव सुविधा और संसाधनों को दुरुस्त किया जा रहा है। माताओं की मौत को लेकर स्वास्थ्य विभाग बेहद संजीदा है। जल्द ही मृत्यु दर में कमी आएगी।
डा. एके अग्रवाल, सीएमओ एटा
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जिले में आए दिन प्रसव के दौरान महिलाओं की मौतें हो रही हैं। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह झोलाछापों की बाढ़ और संसाधनों का अभाव है। हर वर्ष संतान सुख पाने की चाहत में माताओं की जिंदगीं खतरे में पड़ रही है। स्वास्थ्य विभाग का दावा है कि वह मातृ मृत्यु दर को कम करने के भरसक प्रयास कर रहा है, लेकिन विभाग की नीतियां धरातल पर नहीं दिखाई देतीं। अगर जिले में बीती वर्ष हुई मौतों की बात करें तो रोकथाम की कवायदें फेल नजर आती हैं।
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वर्ष 2018 में जिले भर में 71 माताओं ने संतान सुख की लालसा में जिंदगी छोड़ दी। अधिकारियों का कहना है कि 2018 में कम मौतें हुई हैं। एक वर्ष में 30 महिलाओं की मौत में गिरावट आई हैं, लेकिन महज दलीलों से किसी की जिंदगी वापस नहीं लौटती।
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विभाग की उदासीनता बड़ा कारण
मातृ मृत्यु दर बढ़ने के पीछे का बड़ा कारण विभागीय उदासीनता है। सभी स्वास्थ्य केंद्रों पर प्रशिक्षित और कुशल डाक्टर नहीं हैं। साथ ही तमाम केंद्रों पर प्रसव के इंतजाम नहीं हैं। इसके साथ ही लोगों को जागरूक करने के प्रयास भी ठंडे पड़े हैं।
झोलाछापों के यहां प्रसव की बाढ़
जिले मेें झोलाछापों के यहां प्रसव की बाढ़ हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो मई में गैर प्राधिकृत चिकित्सालयों में कुल 6029 प्रसव हुए हैं। जबकि सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर महज 2030 प्रसव ही हो सके। ऐसे में साफ है कि झोलाछापों के आगे स्वास्थ्य विभाग फेल है।
कहते हैं आंकड़े
09 प्रसूताओं की मौत हुई दो महीने में
71 प्रसूताओं की मौत हुई साल 2018 में
101 प्रसूताओं की मौत हुई 2017 में
115 प्रसूताओं की मौत हुई 2016 में
6029 प्रसव हुए झोलाछापों के यहां
182 स्वास्थ्य उपकेंद्र हैं जिले में
इनका कहना है
मातृ मृत्यु दर को कम करने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। हर स्वास्थ्य उपकेंद्र पर प्रसव सुविधा और संसाधनों को दुरुस्त किया जा रहा है। माताओं की मौत को लेकर स्वास्थ्य विभाग बेहद संजीदा है। जल्द ही मृत्यु दर में कमी आएगी।
डा. एके अग्रवाल, सीएमओ एटा