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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Agra News ›   120-Foot Ravan in Agra to Laugh, Move His Eyes and Release Nectar-Like Water

दशहरा 2026: नाभि में तीर लगते ही निकलेगा अमृत जल, 120 फीट का रावण करेगा अट्टहास; हिलेंगी आंखें और हाथ

Tue, 13 Oct 2026 10:16 AM IST
Dhirendra Singh अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा Published by: Dhirendra Singh Updated Tue, 13 Oct 2026 10:16 AM IST
सार

आगरा की ऐतिहासिक रामलीला में इस बार 120 फीट ऊंचे रावण के पुतले का दहन होगा। आधुनिक तकनीक से तैयार हो रहे पुतले की आंखें और हाथ हिलेंगे, वह अट्टहास करेगा और नाभि में तीर लगते ही अमृत जल निकलेगा।
 

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120-Foot Ravan in Agra to Laugh, Move His Eyes and Release Nectar-Like Water
रावण का पुतला - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

बुराई पर अच्छाई की विजय का पर्व विजयादशमी इस बार आगरा की ऐतिहासिक रामलीला में 120 फीट ऊंचे रावण के विशाल पुतले का दहन किया जाएगा। परंपरागत विधि और आधुनिक तकनीक के समागम से बन रहा यह दशानन न केवल अट्टहास करेगा बल्कि इसकी आंखों का पुतलियां और हाथ भी हिलते हुए नजर आएंगे। राम का तीर नाभि में लगते ही अमृत जल की धारा फूटेगी। सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश करते हुए इसको गढ़ने की जिम्मेदारी मथुरा का एक मुस्लिम परिवार निभा रहा है। 82 वर्षीय बुजुर्ग कारीगर जफर अली और उनके सहयोगी आमिर सहित दर्जनों कारीगर रात-दिन मेहनत कर इसे मूर्त रूप दे रहे हैं।
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कारीगर आमिर ने बताया कि 120 फीट ऊंचे रावण का पुतला तैयार करने में करीब 600 बांसों को चीरकर उसकी पतली-पतली खपच्चियां तैयार की गईं है। इसे आकार देने और तैयार करने में करीब 125 किलोग्राम रद्दी कागज और दो क्विंटल लेई लगेगी। कई दिनों की मेहनत के बाद रावण का विशाल पुतला तैयार होता है। इसके साथ र 70 फीट का कुंभकर्ण और 35 फीट ऊंचा मेघनाद का पुतला भी बनाया जा रहा है। आमिर ने बताया कि इस बार रावण के पुतले में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। रावण की आंखें और मुंह हिलेंगे। वह अट्टहास करेगा और उसके हाथ भी चलेंगे। श्रीराम का तीर रावण की नाभि में लगते ही वहां से अमृत जल निकलेगा।
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विरासत में मिला है पुतला बनाने का हुनर
मथुरा का यह मुस्लिम परिवार पांच पीढ़ियों से रामलीला के लिए रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले बनाता आ रहा है। 82 वर्षीय जफर अली अपने कारीगरों के साथ इस काम में जुटे हैं। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा धार्मिक आयोजनों में आपसी सद्भाव और साझा सांस्कृतिक विरासत की मिसाल है।
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