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पाकिस्तान की जेल में बंद 54 सैनिकों को क्यों नहीं लाया जा रहा भारत
Updated Tue, 24 Apr 2018 11:23 PM IST
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मैनपुरी। देश के 54 सैनिक पाकिस्तान की जेल में बंद हैं। देश में अब तक बनने वाली किसी भी सरकार ने उन्हें भारत वापस लाने की कोशिश क्यों नहीं की। सरकार और विपक्ष दोनों को इन सैनिकों को भारत वापस लाना चाहिए। उनके साथ पाकिस्तान की जेल में अत्याचार हो रहा है। यह विचार जिले में आए राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय साइकिलिस्ट हीरालाल यादव ने व्यक्त किए। वो मैनपुरी में संवेदना जाग्रति अभियान के तहत बेटी बचाओ, नशा मुक्ति और सलाम सैनिक का संदेश देने पहुंचे थे।
हीरालाल ने कहा कि 1971 युद्ध के दौरान भारत के 54 सैनिकों को पाकिस्तान ने बंदी बना लिया। उन्हें पाकिस्तान की जेल में डाल दिया। भारत ने इस युद्ध की विजय के बाद पाकिस्तान के एक लाख सैनिकों को रिहा कर दिया, लेकिन अपने 54 सैनिकों की कोई परवाह नहीं की। उन्होंनेे बताया कि वर्ष 2005-06 में उन्होंने सलाम सैनिक अभियान शुरू किया। इस दौरान युद्धबंदी सैनिकों के घरों की यात्रा भी की। यात्रा के दौरान उन्हें कई सबूत मिले जो इस बात को सिद्ध करते हैं कि भारत के सैनिक पाकिस्तान की जेल में बंद हैं।
उन्होंने बताया कि युद्ध बंदी का सबसे बड़ा सबूत वर्ष 1975 में मिला। जब करांची जेल से फरीदाबाद निवासी युद्धबंदी सैनिक अशोक शूरी ने अपने पिता रामस्वरूप शूरी के लिए एक पत्र भिजवाया था। इसमें युद्ध बंदियों की पूरी दास्तां का जिक्र है। इसके अतिरिक्त पाकिस्तान में संचालित अखबार रावल पिंडी ने भारत के युद्धबंदी पाकिस्तान की जेल में बंद होने की पुष्टि की। इसकी प्रति युद्धबंदी सैनिक विजय बसंत तांबे की पत्नी दमयंती तांबे ने तत्कालीन प्रधानमंत्री को सौंपी और राष्ट्रीय परिषद से अपने पति को वापस लाए जाने की मांग की।
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हीरालाल ने कहा कि 1971 युद्ध के दौरान भारत के 54 सैनिकों को पाकिस्तान ने बंदी बना लिया। उन्हें पाकिस्तान की जेल में डाल दिया। भारत ने इस युद्ध की विजय के बाद पाकिस्तान के एक लाख सैनिकों को रिहा कर दिया, लेकिन अपने 54 सैनिकों की कोई परवाह नहीं की। उन्होंनेे बताया कि वर्ष 2005-06 में उन्होंने सलाम सैनिक अभियान शुरू किया। इस दौरान युद्धबंदी सैनिकों के घरों की यात्रा भी की। यात्रा के दौरान उन्हें कई सबूत मिले जो इस बात को सिद्ध करते हैं कि भारत के सैनिक पाकिस्तान की जेल में बंद हैं।
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उन्होंने बताया कि युद्ध बंदी का सबसे बड़ा सबूत वर्ष 1975 में मिला। जब करांची जेल से फरीदाबाद निवासी युद्धबंदी सैनिक अशोक शूरी ने अपने पिता रामस्वरूप शूरी के लिए एक पत्र भिजवाया था। इसमें युद्ध बंदियों की पूरी दास्तां का जिक्र है। इसके अतिरिक्त पाकिस्तान में संचालित अखबार रावल पिंडी ने भारत के युद्धबंदी पाकिस्तान की जेल में बंद होने की पुष्टि की। इसकी प्रति युद्धबंदी सैनिक विजय बसंत तांबे की पत्नी दमयंती तांबे ने तत्कालीन प्रधानमंत्री को सौंपी और राष्ट्रीय परिषद से अपने पति को वापस लाए जाने की मांग की।
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