{"_id":"598211844f1c1b8f1a8b45ef","slug":"11501696388-agra-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"क्रांतिकारी संगठन मातृवेदी का मुख्यालय था जिला","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
क्रांतिकारी संगठन मातृवेदी का मुख्यालय था जिला
Updated Wed, 02 Aug 2017 11:29 PM IST
विज्ञापन
सिद्ध गोपाल चतुर्वेदी
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
मैनपुरी। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर देश को आजादी मिलने तक जिले में अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति की आग धधकती रही थी। तब देश की आजादी के लिए महान क्रांतिकारी गेंदालाल दीक्षित द्वारा गठित मातृवेदी संस्था का मैनपुरी मुख्यालय रहा था। आर्य समाज मंदिर उस समय क्रांतिकारियों का प्रमुख केंद्र था। सिद्धगोपाल चतुर्वेदी और शिवकृष्ण ने भी मातृवेदी से जुड़कर अंग्रेजों के खिलाफ जंग छेड़ी थी।
बरनाहल क्षेत्र के ग्राम चंदीकरा में वर्ष 1897 में जन्मे सिद्धगोपाल चतुर्वेदी के मन में विद्यार्थी जीवन से ही देश प्रेम की हिलोरें लेने लगी थीं। वर्ष 1915 में मिशन स्कूल के छात्रों को संगठित कर उन्होंने एक क्रांतिकारी संगठन खड़ा किया। मिशन स्कूल में जब कुछ छात्रों द्वारा मस्तक पर चंदन का टीका लगाकर आने पर शिक्षकों ने आपत्ति जताकर छात्रों की पिटाई की तो सिद्धगोपाल चतुर्वेदी ने इसका विरोध किया और पढ़ाई का बहिष्कार कराया। उनके नेतृत्व में मिशन स्कूल अंग्रेज विरोधी क्रांतिकारियों का मुख्य केंद्र बन गया था। जबकि आर्य समाज मंदिर में बैठक कर देश को आजाद कराने की रणनीति बनाई जाती थी। सिद्धगोपाल और उनके साथी मातृवेदी संगठन से जुड़ गए। मैनपुरी षड्यंत्र का भंडाफोड़ होने के बाद सिद्धगोपाल चतुर्वेदी भी अन्य छात्र क्रांतिकारियों के साथ गिरफ्तार कर लिए गए। उन्हें पांच साल की सख्त सजा सुनाई गई।
बरनाहल में वर्ष 1896 में जन्मे शिवकृष्ण मिशन स्कूल में पढ़ने के दौरान पंडित राम प्रसाद विस्मिल, गेंदालाल दीक्षित, दम्मीलाल, प्रताप सिंह राणा, कढ़ोरीलाल गुप्ता जैसे क्रांतिकारियों के संपर्क में आए। इसके बाद वह देश की आजादी के लिए गठित संगठन मातृवेदी से जुड़ गए। शिवकृष्ण गुप्तचर और भेष बदलने में माहिर थे। मातृवेदी संगठन का सदस्य दलपति अंग्रेजों का मुखबिर बन गया और उसने दिसंबर 1918 में संगठन का भंडाफोड़ कर कई क्रांतिकारियों को गिरफ्तार करवा दिया। शिवकृष्ण को भी रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
विज्ञापन
अंग्रेज जज किश की अदालत में मुकद्दमा चलाने की तैयारी चल ही रही थी कि शिवकृष्ण ने किसी प्रकार लोहे की आरी मंगा ली। आरी से जेल के जंगले काटकर वह फरार हो गए। उनकी तलाश में कई जगह छापे मारे गए लेकिन वह पकड़ में नहीं आए। अंग्रेज अधिकारियों ने उन्हें जिंदा या मुर्दा लाने वाले को 500 रुपये देने की घोषणा कर दी। इतिहास विद श्रीकृष्ण मिश्र ने बताया कि जेल से निकल जाने के बाद से अभी तक शिवकृष्ण का कोई अता-पता नहीं चला।
कई क्रांतिकारी आए थे मैनपुरी
क्रांतिकारी संगठन मातृवेदी के अध्यक्ष गेंदालाल दीक्षित से मिलने और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई की योजना बनाने के लिए देश के कई क्रांतिकारी मैनपुरी आए। पंडित रामप्रसाद विस्मिल, अस्फाकउल्ला खां, मुकुंदीलाल जैसे कई क्रांतिकारी अंग्रेजों के खिलाफ जंग की रणनीति बनाने यहां कई बार आए।
विज्ञापन
बरनाहल क्षेत्र के ग्राम चंदीकरा में वर्ष 1897 में जन्मे सिद्धगोपाल चतुर्वेदी के मन में विद्यार्थी जीवन से ही देश प्रेम की हिलोरें लेने लगी थीं। वर्ष 1915 में मिशन स्कूल के छात्रों को संगठित कर उन्होंने एक क्रांतिकारी संगठन खड़ा किया। मिशन स्कूल में जब कुछ छात्रों द्वारा मस्तक पर चंदन का टीका लगाकर आने पर शिक्षकों ने आपत्ति जताकर छात्रों की पिटाई की तो सिद्धगोपाल चतुर्वेदी ने इसका विरोध किया और पढ़ाई का बहिष्कार कराया। उनके नेतृत्व में मिशन स्कूल अंग्रेज विरोधी क्रांतिकारियों का मुख्य केंद्र बन गया था। जबकि आर्य समाज मंदिर में बैठक कर देश को आजाद कराने की रणनीति बनाई जाती थी। सिद्धगोपाल और उनके साथी मातृवेदी संगठन से जुड़ गए। मैनपुरी षड्यंत्र का भंडाफोड़ होने के बाद सिद्धगोपाल चतुर्वेदी भी अन्य छात्र क्रांतिकारियों के साथ गिरफ्तार कर लिए गए। उन्हें पांच साल की सख्त सजा सुनाई गई।
विज्ञापन
बरनाहल में वर्ष 1896 में जन्मे शिवकृष्ण मिशन स्कूल में पढ़ने के दौरान पंडित राम प्रसाद विस्मिल, गेंदालाल दीक्षित, दम्मीलाल, प्रताप सिंह राणा, कढ़ोरीलाल गुप्ता जैसे क्रांतिकारियों के संपर्क में आए। इसके बाद वह देश की आजादी के लिए गठित संगठन मातृवेदी से जुड़ गए। शिवकृष्ण गुप्तचर और भेष बदलने में माहिर थे। मातृवेदी संगठन का सदस्य दलपति अंग्रेजों का मुखबिर बन गया और उसने दिसंबर 1918 में संगठन का भंडाफोड़ कर कई क्रांतिकारियों को गिरफ्तार करवा दिया। शिवकृष्ण को भी रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
विज्ञापन
अंग्रेज जज किश की अदालत में मुकद्दमा चलाने की तैयारी चल ही रही थी कि शिवकृष्ण ने किसी प्रकार लोहे की आरी मंगा ली। आरी से जेल के जंगले काटकर वह फरार हो गए। उनकी तलाश में कई जगह छापे मारे गए लेकिन वह पकड़ में नहीं आए। अंग्रेज अधिकारियों ने उन्हें जिंदा या मुर्दा लाने वाले को 500 रुपये देने की घोषणा कर दी। इतिहास विद श्रीकृष्ण मिश्र ने बताया कि जेल से निकल जाने के बाद से अभी तक शिवकृष्ण का कोई अता-पता नहीं चला।
कई क्रांतिकारी आए थे मैनपुरी
क्रांतिकारी संगठन मातृवेदी के अध्यक्ष गेंदालाल दीक्षित से मिलने और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई की योजना बनाने के लिए देश के कई क्रांतिकारी मैनपुरी आए। पंडित रामप्रसाद विस्मिल, अस्फाकउल्ला खां, मुकुंदीलाल जैसे कई क्रांतिकारी अंग्रेजों के खिलाफ जंग की रणनीति बनाने यहां कई बार आए।