{"_id":"124-62927","slug":"Lucknow-62927-124","type":"story","status":"publish","title_hn":"यूपी: लखनऊ में लिफ्ट लेकर कहां गए थे प्राण?","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
यूपी: लखनऊ में लिफ्ट लेकर कहां गए थे प्राण?
Lucknow
Updated Sat, 13 Jul 2013 10:15 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कलेजे के भीतर तक उतरती हुई आंखों के अंदाज वाले अभिनेता प्राण का लखनऊ आना एक नहीं दो बार हुआ है।
विज्ञापन
सन् 1982 में आयोजित एक फिल्म समारोह में उन्हें पहुंचना था लेकिन, अरसे पहले मिले निमंत्रण के जरिए वो भूल चुके थे कि उन्हें कहां पहुंचना है।
हालांकि, यारी और बात के पक्के प्राण साहब आयोजकों को बिना किसी पूर्व सूचना के वे अमौसी एअरपोर्ट पर शाम को पहुंचे और एक सज्जन से लिफ्ट लेकर बस इतना ही बोले कि ‘मुझे लखनऊ में कहीं हो रहे एक फिल्म अवार्ड फंक्शन में जाना है।’
उसके बाद वो थोड़ी देर बाद रवीन्द्रालय में शुरू होने वाले समारोह में पहुंच चुके थे। वो भी बिना किसी तामझाम के। ऐसे सादे आदमी थे प्राण साहब।
लगभग 31 साल पहले इस संस्मरण को याद करते हुए उप्र फिल्म पत्रकार संघ के संस्थापक-अध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार रामकृष्ण बताते हैं कि प्राण पहली बार लखनऊ 1968 में दिसंबर महीने में रवीन्द्रालय में आयोजित पुरस्कार समर्पण समारोह में आए थे।
विज्ञापन
तब उन्हें छठे वार्षिक पुरस्कार समर्पण समारोह में हिस्सा लेना था। उनके साथ अन्य दो दर्जन से अधिक कलाकार जिनमें चेतन आनंद, सुनील दत्त, नूतन, कामिनी कौशल, केदार शर्मा, सुबोध मुकर्जी, मदन पुरी, हसरत जयपुरी, बैम्बी, स्नेहलता, चन्द्रशेखर और आखरी खत के बाल कलाकार बंटी भी शामिल थे।
विज्ञापन
समारोह की अध्यक्षता सूबे के तत्कालीन राज्यपाल डॉ. बी. गोपाल रेड्डी ने की थी। समारोह आठ दिसंबर को हुआ था और अगले ही दिन 9 दिसंबर को उन्हें फिल्म हीर-रांझा की शूटिंग के लिए चेतन आनंद, कामिनी कौशल के साथ बम्बई वापस पहुंचना था।
चूंकि, उन दिनों लखनऊ से बम्बई की कोई सीधी वायुयान सेवा नहीं थी, इसलिए समय पर बम्बई पहुंचने का एक ही रास्ता था कि लोग रात को 9 बजे लखनऊ से जाने वाली मेल गाड़ी से दिल्ली जाएं और वहां से फ्लाइट पकड़ कर बम्बई। उस दौरान वो आयोजन बहुत ही आर्थिक अभावों में हुआ था।
रामकृष्ण बताते हैं कि यहां तक कि रिक्शे पर आने-जाने का पैसा भी नहीं था। तब उन तीनों के लिए दिल्ली का वातानुकूलित टिकट खरीदने के लिये मुझे लखनऊ के एक नामी-गिरामी सेठ से सादे कागज पर पुरनोट लिखकर तीन सौ रुपये उधार लेने पड़े।
आयोजन के बाद किसी तरह मैंने अतिथियों को डिब्बे तक पहुंचाया और अपने दोनों हाथ जोड़ लिए। लेकिन इसके पहले कि मेरे हाथ नीचे आते पाया कि प्राण मेरे कोट की जेब में अपने हाथ डाल चुके थे। उसमें से कुछ निकालने का सवाल तो था ही नहीं, बल्कि प्राण उसमें कुछ डाल चुके थे।
गाड़ी रवाना होने के बाद जब मैंने जेब में हाथ डाला तो ऐसा लगा कि प्राण की जेब में उस समय जो भी धनराशि थी वो सबकी सब मेरी जेब में आ गई थी। फिल्मी दुनिया के रवैये को देखते हुए प्राण का ये अंदाज आज भी याद है।
उस दिन प्राण शाम को छह बजे आये थे और रात नौ बजे लौट गये।
अमृतलाल नागर भी थे कायल
प्राण की अदाकारी और उनके स्वभाव के साहित्यकार अमृतलाल नागर भी कायल थे। एक समारोह में प्राण का अभिनंदन करते उन्होंने कहा था कि प्राण किसी एक व्यक्ति या अभिनेता का नाम नहीं है, इस नाम के पीछे भारत की फिल्मों का पूरा युग छिपा हुआ है।
जिसके माध्यम से हम अपनी फिल्मों के इतिहास की जीती-जागती, चलती-फिरती प्रतिच्छवि को देख सकते हैं।